भगवद्गीता 13.15 — परमात्मा का रहस्य: सब इन्द्रियों के प्रकाशक होकर भी इन्द्रियरहित और निर्गुण
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १३.१५ ॥
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वह परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को प्रकाशित करने वाला है, फिर भी स्वयं सब इन्द्रियों से रहित है। वह आसक्ति-रहित होकर भी सबका धारण-पोषण करता है, और गुणों से रहित होकर भी गुणों का भोक्ता है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सर्वेन्द्रियगुणाभासम् | सब इन्द्रियों के विषयों और व्यापारों को प्रकाशित करने वाला |
| सर्वेन्द्रियविवर्जितम् | सब इन्द्रियों से रहित |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| असक्तम् | आसक्ति-रहित |
| सर्वभृत् | सबका धारण-पोषण करने वाला |
| च एव | और भी |
| निर्गुणम् | गुणों से रहित |
| गुणभोक्तृ | गुणों का भोक्ता, गुणों को अनुभव कराने वाला |
| च | और |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सर्वेन्द्रियगुणाभासम् | सब इन्द्रियों के विषयों और व्यापारों को प्रकाशित करने वाला | असक्तम् | आसक्ति-रहित |
| सर्वेन्द्रियविवर्जितम् | सब इन्द्रियों से रहित | सर्वभृत् | सबका धारण-पोषण करने वाला |
| च एव | और भी | ||
| निर्गुणम् | गुणों से रहित | ||
| गुणभोक्तृ | गुणों का भोक्ता, गुणों को अनुभव कराने वाला | ||
| च | और | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
पिछले श्लोक में परमात्मा को सब ओर हाथ, पैर, नेत्र और कानों से युक्त बताया गया था। इस श्लोक में भगवान उस वर्णन का रहस्य खोलते हैं: वह सब इंद्रियों के गुणों से प्रकाशित होता प्रतीत होता है, फिर भी स्वयं सब इंद्रियों से रहित है, और सबको धारण करते हुए भी पूर्णतः असंग है।
भावार्थ
एक प्रतीत होने वाला विरोधाभास
चौदहवें श्लोक को सुनकर मन में प्रश्न उठ सकता है कि यदि परमात्मा के सब ओर हाथ, पैर और आँखें हैं, तो क्या उसका भी हमारी तरह कोई शरीर है? भगवान तुरंत इस भ्रम को दूर करते हैं। वे दिखाते हैं कि परमात्मा में दो बातें एक साथ सत्य हैं, और यही उसकी विलक्षणता है।
सर्वेन्द्रियगुणाभासम् (सब इंद्रियों के गुणों में प्रकाशित): हमारी आँखों में देखने की, कानों में सुनने की और मन में सोचने की जो क्षमता है, वह उसी चेतना के प्रकाश से आती है। जैसे दर्पण में चेहरा दिखता है पर दर्पण स्वयं चेहरा नहीं होता, वैसे ही इंद्रियों में जो ज्ञान-शक्ति झलकती है, वह परमात्मा की सत्ता का प्रतिबिंब है।
सर्वेन्द्रियविवर्जितम् (सब इंद्रियों से रहित): फिर भी स्वयं परमात्मा के पास इंद्रियाँ नहीं हैं। बिजली से पंखा चलता है, बल्ब जलता है और हीटर तपता है, पर बिजली स्वयं न पंखा है, न बल्ब। इसी प्रकार चेतना सब इंद्रियों को सक्रिय करती है, पर उनसे बँधी नहीं है।
असक्तम् (पूर्णतः असंग): वह सबमें रहते हुए भी किसी से चिपका हुआ नहीं है। सूर्य सबको प्रकाश देता है, पर किसी के दोष से मैला नहीं होता।
सर्वभृत् चैव (फिर भी सबका पालन करने वाला): असंग होने का अर्थ उदासीन या निष्क्रिय होना नहीं है। वही सबका आधार है और सबको धारण किए हुए है। यहाँ पुनः दो विपरीत बातें साथ चलती हैं: न किसी से बँधा, फिर भी सबका आश्रय।
निर्गुणं गुणभोक्तृ च (गुणों से परे, फिर भी गुणों का अनुभवकर्ता): परमात्मा स्वयं सत्त्व, रज और तम गुणों से रहित है, फिर भी वह प्रकृति के गुणों को साक्षी भाव से भोगता और अनुभव करता है। यह भोग बंधन वाला भोग नहीं है, बल्कि जानना और साक्षी होना है।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
इस श्लोक की शिक्षा यह है कि ईश्वर को हमारी सीमित भाषा के किसी एक छोर पर नहीं रखा जा सकता। वह सबमें है और सबसे परे भी है। यही दृष्टि आगे साधक को सिखाती है कि संसार में रहकर भी भीतर से कैसे अलिप्त रहा जाए।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश (Involved yet Free)
कर्म करो, बँधो मत: परमात्मा जैसे सबका पालन करते हुए भी असंग रहता है, वैसे ही हम भी अपने कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाएँ, पर परिणामों की पकड़ ढीली रखें। यह कर्मयोग का ही सार है।
अनुभव करना, पर खो न जाना: जीवन के सुख-दुःख को पूरी तरह महसूस कीजिए, पर यह स्मरण रखिए कि जो देख रहा है वह उनसे अलग है। इससे भावनाओं की तीव्रता तो रहती है, पर उनका बोझ घट जाता है।
शक्ति का स्रोत भीतर है: जब हम कोई बड़ा कार्य सफलतापूर्वक करते हैं, तब यह स्मरण रहे कि हमारी इंद्रियों और बुद्धि को शक्ति देने वाली सत्ता हमसे बड़ी है। यह स्मरण अहंकार को घटाता और कृतज्ञता को बढ़ाता है।
एक प्रतीत होने वाला विरोधाभास
चौदहवें श्लोक को सुनकर मन में प्रश्न उठ सकता है कि यदि परमात्मा के सब ओर हाथ, पैर और आँखें हैं, तो क्या उसका भी हमारी तरह कोई शरीर है? भगवान तुरंत इस भ्रम को दूर करते हैं। वे दिखाते हैं कि परमात्मा में दो बातें एक साथ सत्य हैं, और यही उसकी विलक्षणता है।
सर्वेन्द्रियगुणाभासम् (सब इंद्रियों के गुणों में प्रकाशित): हमारी आँखों में देखने की, कानों में सुनने की और मन में सोचने की जो क्षमता है, वह उसी चेतना के प्रकाश से आती है। जैसे दर्पण में चेहरा दिखता है पर दर्पण स्वयं चेहरा नहीं होता, वैसे ही इंद्रियों में जो ज्ञान-शक्ति झलकती है, वह परमात्मा की सत्ता का प्रतिबिंब है।
सर्वेन्द्रियविवर्जितम् (सब इंद्रियों से रहित): फिर भी स्वयं परमात्मा के पास इंद्रियाँ नहीं हैं। बिजली से पंखा चलता है, बल्ब जलता है और हीटर तपता है, पर बिजली स्वयं न पंखा है, न बल्ब। इसी प्रकार चेतना सब इंद्रियों को सक्रिय करती है, पर उनसे बँधी नहीं है।
असक्तम् (पूर्णतः असंग): वह सबमें रहते हुए भी किसी से चिपका हुआ नहीं है। सूर्य सबको प्रकाश देता है, पर किसी के दोष से मैला नहीं होता।
सर्वभृत् चैव (फिर भी सबका पालन करने वाला): असंग होने का अर्थ उदासीन या निष्क्रिय होना नहीं है। वही सबका आधार है और सबको धारण किए हुए है। यहाँ पुनः दो विपरीत बातें साथ चलती हैं: न किसी से बँधा, फिर भी सबका आश्रय।
निर्गुणं गुणभोक्तृ च (गुणों से परे, फिर भी गुणों का अनुभवकर्ता): परमात्मा स्वयं सत्त्व, रज और तम गुणों से रहित है, फिर भी वह प्रकृति के गुणों को साक्षी भाव से भोगता और अनुभव करता है। यह भोग बंधन वाला भोग नहीं है, बल्कि जानना और साक्षी होना है।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
इस श्लोक की शिक्षा यह है कि ईश्वर को हमारी सीमित भाषा के किसी एक छोर पर नहीं रखा जा सकता। वह सबमें है और सबसे परे भी है। यही दृष्टि आगे साधक को सिखाती है कि संसार में रहकर भी भीतर से कैसे अलिप्त रहा जाए।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश (Involved yet Free)
कर्म करो, बँधो मत: परमात्मा जैसे सबका पालन करते हुए भी असंग रहता है, वैसे ही हम भी अपने कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाएँ, पर परिणामों की पकड़ ढीली रखें। यह कर्मयोग का ही सार है।
अनुभव करना, पर खो न जाना: जीवन के सुख-दुःख को पूरी तरह महसूस कीजिए, पर यह स्मरण रखिए कि जो देख रहा है वह उनसे अलग है। इससे भावनाओं की तीव्रता तो रहती है, पर उनका बोझ घट जाता है।
शक्ति का स्रोत भीतर है: जब हम कोई बड़ा कार्य सफलतापूर्वक करते हैं, तब यह स्मरण रहे कि हमारी इंद्रियों और बुद्धि को शक्ति देने वाली सत्ता हमसे बड़ी है। यह स्मरण अहंकार को घटाता और कृतज्ञता को बढ़ाता है।
आगे का विषय
भगवान ने परमात्मा के एक साथ सर्वव्यापी और असंग होने का रहस्य स्पष्ट किया। अब वे इसी तत्त्व के कुछ और विरोधी दिखने वाले गुण बताते हैं, जैसे कि वह भीतर भी है और बाहर भी, चल भी है और अचल भी, दूर भी है और निकट भी।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जो सबको प्रकाशित करता है, वह स्वयं प्रकाश है।
चेतना को इन्द्रियों की आवश्यकता नहीं, इन्द्रियों को चेतना की आवश्यकता है।
सबको धारण करके भी अलिप्त रहना परम तत्त्व का स्वभाव है।
जो सबको सँभालता है, वह स्वयं किसी पर निर्भर नहीं।
गुणों से परे होने पर भी वह गुणों के अनुभव का आधार है।
निर्गुण और सगुण परस्पर विरोधी नहीं, एक ही सत्य के दो पक्ष हैं।
इन्द्रियों के पीछे छिपे प्रकाश को पहचानना साधना का केन्द्र है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
परमात्मा इन्द्रियों के बिना भी सब कुछ कैसे जानता है?
'असक्तं सर्वभृत्' का क्या अर्थ है?
'निर्गुणं गुणभोक्तृ' में विरोध क्यों नहीं है?
'सर्वेन्द्रियगुणाभास' का क्या आशय है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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