अतीन्द्रिय अवस्था का अर्थ है इन्द्रियों और परिस्थितियों के प्रभाव से परे उस शांत, स्थिर और स्वतंत्र चेतना में स्थित होना, जहाँ सुख-दुःख का उतार-चढ़ाव मन को नहीं तोड़ता। हम रोज़ बाहरी घटनाओं से अपनी मनःस्थिति तय होने देते हैं, इसलिए यह अवस्था दूर और कठिन लगती है। गीता इसे अचानक मिलने वाला चमत्कार नहीं, बल्कि स्थिर बुद्धि, संयम और विनम्र साधना का फल बताती है।
गीता 14.20 कहती है कि देह से उत्पन्न तीनों गुणों को पार करने वाला जीव जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःखों से छूटकर अमरता का अनुभव करता है, और गीता 2.15 में जो द्वन्द्वों में विचलित नहीं होता तथा सुख-दुःख में सम रहता है, वही अमृतत्व का पात्र बनता है। गीता 2.53 बताती है कि सुनी-सुनाई अनेक बातों से विचलित बुद्धि जब परमात्मा में स्थिर हो जाती है, तभी योग की प्राप्ति होती है।
गीता 11.8 और 11.48 के अनुसार परमात्मा का दर्शन सामान्य इन्द्रियों, केवल वेद, यज्ञ, दान या कर्मकांड के बल पर नहीं, भगवान् की कृपा और भक्ति से संभव होता है, इसलिए साधना की उपलब्धियों को अहंकार का आधार न बनाएँ। गीता 15.6 परमधाम को स्वयंप्रकाश बताती है, गीता 13.15 परमात्मा को सबका आधार होकर भी किसी से बँधा न होने वाला कहती है, और गीता 18.37 के अनुसार सात्त्विक सुख आरंभ में कठिन और अंत में अमृत-सा लगता है।