भगवद्गीता 12.3 — निराकार अक्षर ब्रह्म की उपासना का स्वरूप

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ १२.३ ॥

परन्तु जो साधक अविनाशी, अनिर्देश्य (शब्दों से न कहे जाने योग्य), अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और नित्य ब्रह्म की उपासना करते हैं—(वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं, जैसा अगले श्लोक में कहा गया है)।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

ये तु अक्षरम् अनिर्देश्यम्
अव्यक्तम् पर्युपासते ।
सर्वत्रगम् अचिन्त्यम् च
कूटस्थम् अचलम् ध्रुवम् ॥

शब्दार्थ

पंक्ति 1
संस्कृत शब्द अर्थ
ये जो
तु परन्तु
अक्षरम् अविनाशी
अनिर्देश्यम् जिसे शब्दों से निर्दिष्ट न किया जा सके
अव्यक्तम् इन्द्रियों से अगोचर, अप्रकट
पर्युपासते भली-भाँति उपासना करते हैं
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
सर्वत्रगम् सर्वव्यापी
अचिन्त्यम् मन-बुद्धि की पहुँच से परे
च और
कूटस्थम् अपरिवर्तनशील, सदा एकरस रहने वाला
अचलम् अचल, स्थिर
ध्रुवम् नित्य, सदा रहने वाला
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
ये जो सर्वत्रगम् सर्वव्यापी
तु परन्तु अचिन्त्यम् मन-बुद्धि की पहुँच से परे
अक्षरम् अविनाशी च और
अनिर्देश्यम् जिसे शब्दों से निर्दिष्ट न किया जा सके कूटस्थम् अपरिवर्तनशील, सदा एकरस रहने वाला
अव्यक्तम् इन्द्रियों से अगोचर, अप्रकट अचलम् अचल, स्थिर
पर्युपासते भली-भाँति उपासना करते हैं ध्रुवम् नित्य, सदा रहने वाला

विस्तृत विवरण

परिचय

पिछले श्लोक में सगुण भक्तों की बात करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अब दूसरे मार्ग का वर्णन आरंभ करते हैं। इस श्लोक में वे उस निराकार, अक्षर तत्त्व के स्वरूप को बताते हैं जिसकी उपासना ज्ञान-मार्ग के साधक करते हैं।

भावार्थ

निर्गुण उपासना का स्वरूप

अर्जुन ने जिस 'अक्षर, अव्यक्त' तत्त्व के उपासकों के बारे में पूछा था, भगवान श्रीकृष्ण यहाँ उसी का विस्तृत परिचय देते हैं। ध्यान रहे कि यह श्लोक एक वाक्य का पहला भाग है। इस श्लोक में उपास्य तत्त्व के लक्षण बताए गए हैं, और उसका फल तथा साधक की योग्यताएँ अगले श्लोक में आएँगी।

उपास्य तत्त्व के आठ विशेषण

अक्षरम् (अविनाशी): वह तत्त्व जिसका कभी क्षय या नाश नहीं होता। संसार की हर वस्तु बदलती और मिटती है, पर यह तत्त्व सदा एक-सा रहता है।

अनिर्देश्यम् (जिसे इंगित करके बताया न जा सके): उसे हम 'यह' कहकर किसी वस्तु की तरह दिखा नहीं सकते। वाणी और शब्द उसकी ओर संकेत तो करते हैं, पर उसे पूरी तरह बाँध नहीं पाते।

अव्यक्तम् (इंद्रियों से अप्रकट): वह आँख से देखा, कान से सुना या हाथ से छुआ नहीं जा सकता। इंद्रियों की पहुँच के परे होने के कारण वह अव्यक्त है।

सर्वत्रगम् (सर्वव्यापी): वह किसी एक स्थान में सीमित नहीं है, बल्कि सब जगह और सब में समान रूप से विद्यमान है।

अचिन्त्यम् (मन की कल्पना से परे): मन अपने अनुभवों की सीमा में ही सोच पाता है, इसलिए वह उसे पूरी तरह अपने विचार में समेट नहीं सकता।

कूटस्थम् (कूट में स्थित, अपरिवर्तनशील): 'कूट' का एक अर्थ लोहार की निहाई है, जिस पर लगातार चोट पड़ती रहती है फिर भी वह जस की तस रहती है। इसी प्रकार संसार की सारी हलचल और परिवर्तन के बीच यह तत्त्व अडिग साक्षी की तरह स्थित रहता है।

अचलम् (अचल) और ध्रुवम् (स्थिर, निश्चित): वह न चलता है, न डगमगाता है, और उसमें कोई बदलाव नहीं होता। जिस प्रकार ध्रुव तारा दिशा का स्थिर आधार है, उसी प्रकार यह तत्त्व सत्य का अटल आधार है।

गहरे भाव और आंतरिक संदेश

इन सभी विशेषणों को साथ पढ़ने पर एक बात स्पष्ट होती है कि निर्गुण उपासना का आधार मन और इंद्रियों से परे जाने की साधना है। जिस तत्त्व को देखा, छुआ या पूरी तरह सोचा नहीं जा सकता, उस पर ध्यान टिकाना एक सूक्ष्म और कठिन अभ्यास है। भगवान यहाँ इस मार्ग की निंदा नहीं कर रहे, वे केवल उसके स्वरूप का सटीक वर्णन कर रहे हैं। इसकी विशेष कठिनाई और उसका वास्तविक फल अगले श्लोकों में स्पष्ट होता है।

हमारे जीवन के लिए संदेश (परिवर्तन के बीच अचल केंद्र)

बदलते जीवन में स्थिर आधार: हमारे जीवन में परिस्थितियाँ, रिश्ते और भावनाएँ लगातार बदलती रहती हैं। इस श्लोक का 'कूटस्थ' भाव हमें याद दिलाता है कि हमारे भीतर एक ऐसा साक्षी-स्तर भी है जो हर बदलाव को देखता है, पर स्वयं नहीं बदलता।

व्यावहारिक तरीका: जब मन किसी चिंता या क्रोध की लहर में बहने लगे, तो कुछ क्षण रुककर स्वयं से कहें कि मैं इस विचार या भावना को देख रहा हूँ। यह साधारण-सा अभ्यास हमें भावनाओं से थोड़ा अलग खड़ा होना सिखाता है, और यही साक्षीभाव (Witness consciousness) की ओर पहला कदम है।

आगे का विषय

भगवान ने अक्षर, अव्यक्त तत्त्व के स्वरूप को विस्तार से बता दिया। अब अगले श्लोक में वे बताते हैं कि इस मार्ग के उपासक को अपनी इंद्रियों और बुद्धि के स्तर पर कौन-सी साधना करनी होती है और वह अंत में किसे प्राप्त होता है।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

ज्ञानयोग
अक्षर ब्रह्म निर्गुण उपासना
दार्शनिक
अनिर्देश्य अचिन्त्य कूटस्थ
आध्यात्मिक
सर्वव्यापकता नित्य सत्य
साधना-दृष्टि
सूक्ष्म ध्यान इन्द्रिय-निग्रह
मनोवैज्ञानिक
अमूर्त चिन्तन बौद्धिक धैर्य
जिज्ञासा-दृष्टि
ब्रह्म का स्वरूप
समन्वय-दृष्टि
निर्गुण और सगुण का सम्बन्ध
एकत्व-दृष्टि
सर्वत्र एक तत्त्व
प्रतीक-दृष्टि
कूटस्थ अचल ध्रुव
आत्मशुद्धि
अहं-विसर्जन वैराग्य
शैक्षिक
विशेषणों द्वारा ब्रह्म-बोध
नैतिक
संयम निष्ठा
व्यावहारिक
अमूर्त का अनुभव कठिन
आन्तरिक संन्यास
नाम-रूप से परे दृष्टि

सूत्र

जो नष्ट नहीं होता, वही परम सत्य का आधार है।

सत्य शब्दों से बड़ा है; शब्द उसकी ओर केवल संकेत करते हैं।

जो सर्वत्र है, उसे खोजने के लिए कहीं जाना आवश्यक नहीं।

बुद्धि जहाँ थक जाती है, वहाँ अनुभव का द्वार खुलता है।

परिवर्तन के बीच जो अचल रहता है, वही साक्षी है।

निराकार की साधना में इन्द्रियों और मन का संयम अनिवार्य है।

ध्रुव तत्त्व में टिकने वाला मन परिस्थितियों से विचलित नहीं होता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

‘अनिर्देश्य’ का क्या अर्थ है?
अनिर्देश्य का अर्थ है जिसे किसी नाम, रूप या गुण के द्वारा पूरी तरह बताया न जा सके, क्योंकि वह शब्दों की सीमा से परे है।
‘कूटस्थ’ शब्द क्या बताता है?
कूटस्थ का अर्थ है निहाई की तरह अपरिवर्तनशील रहना, यानी सब बदलावों के बीच जो स्वयं कभी नहीं बदलता।
इस श्लोक में ब्रह्म के लिए इतने विशेषण क्यों दिए गए हैं?
निराकार तत्त्व को सीधे दिखाया नहीं जा सकता, इसलिए उसके स्वरूप का संकेत देने के लिए अक्षर, सर्वत्रग, अचिन्त्य जैसे विशेषण प्रयुक्त हुए हैं।
क्या यह श्लोक पूरा हो जाता है या अगला श्लोक आवश्यक है?
यह वाक्य अगले श्लोक (१२.४) में पूरा होता है, जहाँ बताया गया है कि ऐसे उपासक, इन्द्रियों को वश में करके और सबमें समभाव रखकर, भगवान् को ही प्राप्त होते हैं।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
निराकार ब्रह्म की उपासना सम्भव है, पर वह सूक्ष्म बुद्धि, संयम और गहरे वैराग्य की माँग करती है।

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