भगवद्गीता 12.4 — निर्गुण उपासक भी इन्द्रिय-संयम, समभाव और सर्वभूतहित से भगवान् को पाते हैं

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ १२.४ ॥

जो साधक इन्द्रियों के समूह को भली-भाँति वश में करके, सब परिस्थितियों में समभाव रखते हुए और सभी प्राणियों के हित में लगे रहकर अक्षर, अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करते हैं, वे भी मुझको ही प्राप्त होते हैं।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

संनियम्य इन्द्रिय-ग्रामम्
सर्वत्र सम-बुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति माम् एव
सर्व-भूत-हिते रताः ॥

शब्दार्थ

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संस्कृत शब्द अर्थ
संनियम्य भली-भाँति वश में करके
इन्द्रियग्रामम् इन्द्रियों के समूह को
सर्वत्र सब जगह, सब परिस्थितियों में
समबुद्धयः समान बुद्धि वाले
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
ते वे
प्राप्नुवन्ति प्राप्त करते हैं
माम् एव मुझको ही
सर्वभूतहिते सभी प्राणियों के कल्याण में
रताः लगे हुए
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
संनियम्य भली-भाँति वश में करके ते वे
इन्द्रियग्रामम् इन्द्रियों के समूह को प्राप्नुवन्ति प्राप्त करते हैं
सर्वत्र सब जगह, सब परिस्थितियों में माम् एव मुझको ही
समबुद्धयः समान बुद्धि वाले सर्वभूतहिते सभी प्राणियों के कल्याण में
रताः लगे हुए

विस्तृत विवरण

परिचय

यह श्लोक पिछले श्लोक का ही उत्तरार्ध है। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि निराकार, अक्षर तत्त्व के उपासक को इंद्रियों का संयम, सबमें समबुद्धि और प्राणियों के हित में रति जैसे गुण अपनाने होते हैं, और ऐसे साधक भी अंततः उन्हें ही प्राप्त होते हैं।

भावार्थ

निर्गुण उपासक की तीन अनिवार्य योग्यताएँ

श्लोक 3 में उपास्य तत्त्व का स्वरूप बताया गया था। अब भगवान उस साधक के आचरण का वर्णन करते हैं जो उस मार्ग पर चलता है। ध्यान देने की बात है कि भगवान यहाँ इस मार्ग को अस्वीकार नहीं करते, बल्कि स्पष्ट कहते हैं कि वे भी 'मुझे ही' प्राप्त होते हैं। यानी साधना का नाम और रूप भले अलग हो, गंतव्य एक ही परमात्मा है।

संनियम्येन्द्रियग्रामम् (इंद्रिय-समूह को भलीभाँति वश में करके): 'ग्राम' का अर्थ समूह है। आँख, कान, जिह्वा, त्वचा और नासिका, ये सब बाहर की ओर दौड़ती रहती हैं। जिस साधक को ऐसे तत्त्व पर ध्यान लगाना है जो इंद्रियों से दिखता ही नहीं, उसके लिए इंद्रियों को भीतर समेटना पहली शर्त है।

सर्वत्र समबुद्धयः (सब परिस्थितियों और सब प्राणियों में समान दृष्टि): सुख-दुख, मान-अपमान और अपने-पराये के भेद से जिसकी बुद्धि डगमगाती नहीं, वही समबुद्धि है। जब साधक मानता है कि वही एक तत्त्व सर्वत्र है, तो उसके व्यवहार में भी भेदभाव घटने लगता है।

सर्वभूतहिते रताः (सभी प्राणियों के हित में लगे हुए): यह गुण बहुत महत्त्वपूर्ण है। निराकार की उपासना केवल भीतर की साधना बनकर नहीं रह जाती, वह करुणा और सेवा के रूप में बाहर भी प्रकट होती है। जो सबमें एक ही तत्त्व देखता है, वह किसी का अहित नहीं चाह सकता।

ते प्राप्नुवन्ति मामेव (वे मुझे ही प्राप्त करते हैं)

भगवान का यह आश्वासन अर्जुन के प्रश्न का संतुलित उत्तर देता है। निर्गुण उपासना व्यर्थ नहीं है, उसका फल भी परमात्मा की प्राप्ति ही है। अंतर साधना की सहजता और कठिनाई का है, फल का नहीं। इसी अंतर को भगवान अगले श्लोक में स्पष्ट करेंगे।

हमारे जीवन के लिए संदेश (साधना और सेवा साथ-साथ)

ध्यान और करुणा का मेल: कोई साधना तब सच्ची है जब वह हमें दूसरों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाए। यदि ध्यान या ज्ञान के साथ हमारा व्यवहार कठोर और स्वार्थी बना रहता है, तो समझना चाहिए कि साधना अभी ऊपरी है।

व्यावहारिक तरीका: दिन में कुछ समय इंद्रियों को शांत करने के लिए रखें, जैसे मौन या ध्यान। साथ ही रोज़ किसी एक व्यक्ति के हित में बिना अपेक्षा के कोई छोटा काम करें। भीतर का संयम और बाहर की सेवा मिलकर साधना को संतुलित बनाते हैं।

आगे का विषय

भगवान ने स्पष्ट किया कि निर्गुण साधक भी अंततः उन्हीं को प्राप्त होता है। फिर भी इस मार्ग में एक विशेष कठिनाई है। अगले श्लोक में वे बताते हैं कि अव्यक्त में चित्त लगाने वालों के सामने कौन-सी बाधा आती है।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

ज्ञानयोग
निर्गुण उपासना समबुद्धि
साधना-दृष्टि
इन्द्रिय-संयम आत्मनियन्त्रण
आध्यात्मिक
परम प्राप्ति ईश्वर-प्राप्ति
नैतिक
सर्वभूतहित करुणा
सामाजिक
लोक-कल्याण सबके प्रति समान भाव
मनोवैज्ञानिक
समता भावनात्मक संतुलन
समन्वय-दृष्टि
सभी मार्ग एक लक्ष्य की ओर
एकत्व-दृष्टि
सबमें एक परमात्मा
कर्मयोग
सेवा लोकसंग्रह
मानवता
अहिंसा सहानुभूति
दार्शनिक
अव्यक्त से सर्वभूत-हित का सम्बन्ध
आत्मशुद्धि
राग-द्वेष का शमन
व्यावहारिक
संयम के साथ सेवा
भक्ति-दृष्टि
‘माम् एव’ — अन्ततः भगवान् की प्राप्ति

सूत्र

वश में की हुई इन्द्रियाँ ही साधना की पहली नींव हैं।

सुख-दुःख और मान-अपमान में समान रहना ही बुद्धि की परिपक्वता है।

जो सबका हित चाहता है, उसकी साधना स्वार्थ से मुक्त हो जाती है।

निराकार की उपासना भी करुणा के बिना अधूरी रहती है।

मार्ग कोई भी हो, अन्ततः प्राप्ति एक ही परमात्मा की होती है।

सबके हित में रमना भक्ति का ही एक रूप है।

बाहर की सेवा और भीतर का संयम, दोनों साथ चलने चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या निर्गुण उपासक भी भगवान् को प्राप्त होते हैं?
हाँ। इस श्लोक में भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि इन्द्रिय-संयम, समभाव और सर्वभूतहित के साथ अव्यक्त की उपासना करने वाले भी उन्हीं को प्राप्त होते हैं।
‘इन्द्रियग्राम’ का क्या अर्थ है?
इन्द्रियग्राम का अर्थ है इन्द्रियों का समूह—आँख, कान, नाक, जिह्वा, त्वचा आदि—जिन्हें वश में करना साधना के लिए आवश्यक है।
‘सर्वत्र समबुद्धयः’ से क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है सभी परिस्थितियों और सभी प्राणियों के प्रति समान दृष्टि रखना, चाहे अनुकूलता हो या प्रतिकूलता।
‘सर्वभूतहिते रताः’ का साधना से क्या सम्बन्ध है?
निराकार उपासना केवल ध्यान नहीं है; उसमें सभी प्राणियों के कल्याण की भावना भी जुड़ी है, जो अहंकार को घटाती है।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
इन्द्रियों को संयमित रखकर, सबमें समभाव और सबके हित की भावना से जीना भी परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग है।

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