इन्द्रिय निग्रह का अर्थ स्वाद, दृश्य, ध्वनि और स्पर्श जैसे आकर्षणों को पूरी तरह कुचल देना नहीं, बल्कि उनके आगे बहे बिना विवेक से चुनाव कर पाना है। आज फ़ोन, भोजन और मनोरंजन हर पल हमें खींचते हैं, और जब हम हर खिंचाव के पीछे चलते हैं तो ध्यान, स्वास्थ्य और समय बिखरने लगते हैं। गीता संयम को दमन नहीं, ऊँचे ध्येय से जुड़ी सहज अनुशासन की साधना बताती है।
गीता 2.58 की कछुए की उपमा आवश्यकता पड़ने पर इन्द्रियों को विषयों से समेट लेने की सामर्थ्य सिखाती है, और गीता 2.68 के अनुसार सब ओर से निगृहीत इन्द्रियों वाले की प्रज्ञा स्थिर होती है। गीता 2.61 कहती है कि संयम केवल अपने बल पर नहीं, ईश्वर-परायणता के सहारे सुदृढ़ होता है, और गीता 2.64 में राग-द्वेष से मुक्त रहकर विषयों का संयमित सेवन करने वाला आन्तरिक प्रसन्नता और शांति पाता है।
गीता 3.34 राग और द्वेष को इन्द्रिय-विषयों में स्थित शत्रु बताती है, इसलिए पसंद-नापसंद की प्रतिक्रिया को पहचानकर उसके आधार पर तुरंत निर्णय या व्यवहार करने से बचें। गीता 2.59 के अनुसार केवल बाहरी त्याग से आसक्ति नहीं मिटती, परम तत्त्व के अनुभव से भीतर का रस भी छूटता है, और गीता 3.41 सबसे अधिक भटकाने वाली इन्द्रिय-प्रवृत्तियों पर सबसे पहले नियंत्रण का अभ्यास सुझाती है। गीता 4.26 इन्द्रियों के अनुशासन को साधना की शक्ति बताती है।