अध्याय 3 कर्म योग

43 श्लोक

अनेक लोग मानते हैं कि शांति जिम्मेदारियों से दूर रहने में है, किन्तु श्रीकृष्ण बताते हैं कि वास्तविक उन्नति निःस्वार्थ कर्म में है। यह अध्याय सिखाता है कि जब कर्म फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्यभाव से किया जाता है, तब वही आत्मिक विकास का साधन बन जाता है। इस अध्याय से हमें यह सीखने को मिलता है कि आलस्य, स्वार्थ और निराशा से ऊपर उठकर अपने कर्मों को समाज, परिवार और व्यापक कल्याण से कैसे जोड़ा जा सकता है। कर्मयोग जीवन के प्रत्येक कार्य को साधना में परिवर्तित करने की कला है।

श्लोक सूची

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श्लोक 1 यदि ज्ञान श्रेष्ठ है, तो मुझे घोर कर्म में क्यों लगाते हैं? अर्जुन उवाच । ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ ३.१ ॥ अर्जुन ने कहा—हे जनार्दन! यदि आपको कर्म से ज्ञान (समत्वबुद्धि) श्रेष्ठ लगता है, तो हे केशव! फिर आप मुझे इस भयंकर युद्ध-कर्म में क्यों लगा रहे हैं? → श्लोक 2 अर्जुन की प्रार्थना: निश्चित कल्याणकारी मार्ग बताइए व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ ३.२ ॥ आप अपने मिले-जुले-से वचनों से मानो मेरी बुद्धि को मोहित कर रहे हैं। इसलिए निश्चय करके मुझे वह एक मार्ग बताइए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त कर सकूँ। → श्लोक 3 दो निष्ठाएँ: ज्ञानयोग और कर्मयोग श्रीभगवानुवाच । लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३.३ ॥ श्रीभगवान् ने कहा—हे निष्पाप अर्जुन! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मैंने पहले कही है: ज्ञानियों की ज्ञानयोग से और कर्मयोगियों की कर्मयोग से। → श्लोक 4 केवल कर्म न करने या संन्यास लेने से सिद्धि नहीं न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ३.४ ॥ मनुष्य कर्मों का आरम्भ न करने मात्र से निष्कर्मता (कर्मबन्धन से मुक्ति की स्थिति) को प्राप्त नहीं होता, और केवल बाहरी त्याग से भी सिद्धि को प्राप्त नहीं करता। → श्लोक 5 कोई भी क्षणभर भी कर्म के बिना नहीं रह सकता न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ३.५ ॥ निश्चय ही कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रहता, क्योंकि सभी प्राणी प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा विवश होकर कर्म में प्रवृत्त किए जाते हैं। → श्लोक 6 मन से विषयों का चिन्तन करने वाला मिथ्याचारी कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ३.६ ॥ जो मूढ़ बुद्धि वाला मनुष्य कर्मेन्द्रियों को रोककर बैठ जाता है, परन्तु मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी (पाखण्डी) कहा जाता है। → श्लोक 7 मन को संयत कर अनासक्त कर्म करने वाला श्रेष्ठ यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ३.७ ॥ परन्तु हे अर्जुन! जो मनुष्य मन से इन्द्रियों को संयत करके, आसक्ति से रहित होकर कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है। → श्लोक 8 नियत कर्म करो: कर्म अकर्म से श्रेष्ठ है नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥ ३.८ ॥ तुम अपने नियत (निर्धारित) कर्म को करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तो तुम्हारा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं हो सकेगा। → श्लोक 9 यज्ञ-भाव से कर्म: बन्धन से मुक्ति का मार्ग यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ३.९ ॥ यज्ञ (परमार्थ और कर्तव्य-भाव) के लिए किए गए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म इस लोक को बन्धन में डालते हैं। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! आसक्ति छोड़कर उसी यज्ञ-भाव से कर्म करो। → श्लोक 10 सृष्टि के आरम्भ में यज्ञ-सहित प्रजा की रचना सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ ३.१० ॥ सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ-सहित प्रजा की रचना करके कहा—इस यज्ञ के द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त करो और यह यज्ञ तुम्हारे लिए इच्छित कामनाओं की पूर्ति करने वाला हो। → श्लोक 11 देवताओं और मनुष्यों का परस्पर पोषण देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ३.११ ॥ तुम इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को संवर्धित करो और वे देवता तुम्हें संवर्धित करें। इस प्रकार एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे। → श्लोक 12 यज्ञ के बिना भोग करने वाला चोर इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥ ३.१२ ॥ यज्ञ से तृप्त हुए देवता तुम्हें इच्छित भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिए हुए भोगों को जो उन्हें अर्पित किए बिना स्वयं भोगता है, वह निश्चय ही चोर है। → श्लोक 13 यज्ञ से बचा हुआ खाने वाले पापमुक्त, केवल स्वयं के लिए पकाने वाले पापी यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ ३.१३ ॥ यज्ञ के बाद बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ जन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं, परन्तु जो पापी लोग केवल अपने लिए पकाते हैं, वे तो पाप ही खाते हैं। → श्लोक 14 अन्न, वर्षा, यज्ञ और कर्म का सृष्टि-चक्र अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ ३.१४ ॥ सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते (पोषित होते) हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है। → श्लोक 15 कर्म, वेद और परमात्मा का सम्बन्ध: यज्ञ में प्रतिष्ठित ब्रह्म कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ ३.१५ ॥ कर्म को वेद से उत्पन्न जानो और वेद को अविनाशी परमात्मा से प्रकट हुआ जानो। इसलिए सर्वव्यापी परमात्मा सदा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में प्रतिष्ठित है। → श्लोक 16 सृष्टि-चक्र का पालन न करने वाला जीवन व्यर्थ एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ ३.१६ ॥ हे पार्थ! इस प्रकार चलाए गए सृष्टि-चक्र का जो मनुष्य इस लोक में अनुसरण नहीं करता, वह पापमय जीवन वाला, इन्द्रियों में ही रमने वाला मनुष्य व्यर्थ ही जीता है। → श्लोक 17 आत्मा में रमने वाले के लिए कोई बाध्य कर्तव्य नहीं यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ ३.१७ ॥ परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला, आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही सन्तुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। → श्लोक 18 मुक्त पुरुष का किसी कर्म या प्राणी पर निर्भर न होना नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ ३.१८ ॥ उस महापुरुष का इस संसार में न कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्म न करने से। सम्पूर्ण प्राणियों में भी उसका किसी के साथ स्वार्थ का आश्रय-सम्बन्ध नहीं रहता। → श्लोक 19 आसक्ति-रहित होकर कर्तव्य-कर्म करने से परम की प्राप्ति तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ ३.१९ ॥ इसलिए तुम आसक्ति से रहित होकर निरन्तर अपने कर्तव्य-कर्म को भली-भाँति करो, क्योंकि आसक्ति-रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। → श्लोक 20 जनक आदि ने कर्म से सिद्धि पाई: लोकसंग्रह की दृष्टि कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ ३.२० ॥ राजा जनक आदि ज्ञानीजन भी कर्म के द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसलिए लोक-कल्याण को देखते हुए भी तुम्हें कर्म करना ही उचित है। → श्लोक 21 श्रेष्ठ जन जैसा आचरण करते हैं, लोग उसी का अनुसरण करते हैं यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ३.२१ ॥ श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वही-वही करते हैं। वह जिसे प्रमाण या आदर्श मान लेता है, सारा संसार उसी का अनुसरण करता है। → श्लोक 22 भगवान् के लिए कोई कर्तव्य नहीं, फिर भी वे कर्म में लगे हैं न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ ३.२२ ॥ हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरे लिए कोई भी कर्तव्य नहीं है और न ही कोई ऐसी वस्तु है जो मुझे प्राप्त न हो या जिसे प्राप्त करना शेष हो, फिर भी मैं कर्म में ही लगा रहता हूँ। → श्लोक 23 यदि मैं कर्म न करूँ, तो सब लोग मेरा अनुसरण करेंगे यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ३.२३ ॥ हे पार्थ! यदि मैं कभी भी सावधान और आलस्य-रहित होकर कर्म में न लगूँ, तो सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करने लगेंगे। → श्लोक 24 यदि मैं कर्म न करूँ, तो लोक नष्ट हो जाएँगे उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ ३.२४ ॥ यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब लोक नष्ट हो जाएँगे, मैं सृष्टि में अव्यवस्था का कारण बनूँगा और इन प्रजाओं का विनाश करने वाला हो जाऊँगा। → श्लोक 25 अज्ञानी आसक्ति से कर्म करते हैं, ज्ञानी अनासक्त होकर लोकहित में सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥ ३.२५ ॥ हे भारत! जैसे अज्ञानी लोग आसक्ति के साथ कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी पुरुष को लोक-कल्याण की इच्छा से आसक्ति-रहित होकर कर्म करना चाहिए। → श्लोक 26 अज्ञानी कर्मासक्त लोगों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करें न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ ३.२६ ॥ ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह कर्मों में आसक्त अज्ञानी लोगों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, बल्कि स्वयं योग-युक्त होकर सब कर्मों का भली-भाँति आचरण करते हुए उन्हें भी कर्म में लगाए रखे। → श्लोक 27 कर्ता मैं हूँ: अहंकार से मोहित मन की भूल प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ ३.२७ ॥ सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, परन्तु अहंकार से मोहित अन्तःकरण वाला मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ'—ऐसा मान लेता है। → श्लोक 28 गुण और कर्म के विभाग को जानने वाला कर्म में आसक्त नहीं होता तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥ ३.२८ ॥ परन्तु हे महाबाहो! गुणों और कर्मों के विभाग के तत्त्व को जानने वाला पुरुष 'गुण ही गुणों में बरत रहे हैं'—ऐसा मानकर कर्म में आसक्त नहीं होता। → श्लोक 29 गुणों से मोहित अज्ञानियों को ज्ञानी विचलित न करे प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ ३.२९ ॥ प्रकृति के गुणों से मोहित मनुष्य गुणों के कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन अधूरा जानने वाले मन्द बुद्धि लोगों को पूर्ण ज्ञानी पुरुष विचलित न करे। → श्लोक 30 सब कर्म मुझमें समर्पित कर, आशा-ममता छोड़कर युद्ध करो मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३.३० ॥ अध्यात्म-भाव से युक्त चित्त द्वारा सब कर्मों को मुझमें समर्पित करके, आशा और ममता से रहित होकर तथा सन्ताप छोड़कर तुम युद्ध करो। → श्लोक 31 श्रद्धा और निन्दा-रहित भाव से भगवान् के मत का पालन करने वाले मुक्त होते हैं ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३.३१ ॥ जो मनुष्य श्रद्धा से युक्त और दोष-दृष्टि से रहित होकर मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। → श्लोक 32 उपदेश की निन्दा करने वाले विवेकहीन लोग नष्ट हो जाते हैं ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३.३२ ॥ परन्तु जो लोग मेरे इस मत में दोष निकालते हुए उसका पालन नहीं करते, उन सब प्रकार के ज्ञान में मोहित और विवेकहीन लोगों को तुम नष्ट हुआ ही जानो। → श्लोक 33 प्रकृति के अनुसार चेष्टा: केवल दमन से क्या होगा? सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३.३३ ॥ ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति (स्वभाव और संस्कार) के अनुरूप ही चेष्टा करता है। सब प्राणी अपनी प्रकृति का ही अनुसरण करते हैं, ऐसे में केवल हठपूर्वक दमन क्या कर लेगा? → श्लोक 34 इन्द्रियों के विषयों में स्थित राग-द्वेष के वश में न आओ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३.३४ ॥ प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग (आकर्षण) और द्वेष (विकर्षण) स्थित रहते हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं आना चाहिए, क्योंकि वे ही उसके कल्याण-मार्ग के बाधक शत्रु हैं। → श्लोक 35 स्वधर्म श्रेष्ठ है, परधर्म भयावह श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३.३५ ॥ भली-भाँति आचरण किए गए परधर्म की अपेक्षा अपूर्ण रूप से किया गया भी स्वधर्म श्रेष्ठ है। स्वधर्म में मरना भी कल्याणकारी है, जबकि परधर्म भय देने वाला है। → श्लोक 36 अर्जुन का प्रश्न: मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है? अर्जुन उवाच । अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३.३६ ॥ अर्जुन ने कहा—हे वार्ष्णेय! फिर यह मनुष्य न चाहते हुए भी, मानो किसी के द्वारा बलपूर्वक लगाया हुआ, किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है? → श्लोक 37 काम और क्रोध ही मनुष्य के महाशत्रु हैं श्रीभगवानुवाच । काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३.३७ ॥ श्रीभगवान् ने कहा—यह कामना ही क्रोध है, जो रजोगुण से उत्पन्न होती है। यह बहुत भोगने वाली और महान् पाप कराने वाली है। इसे ही इस विषय में अपना महान् शत्रु जानो। → श्लोक 38 धुएँ से अग्नि, मैल से दर्पण और झिल्ली से गर्भ की भाँति ज्ञान का आवरण धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३.३८ ॥ जैसे धुएँ से अग्नि, मैल से दर्पण और झिल्ली से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस कामना से यह ज्ञान ढका हुआ है। → श्लोक 39 कामरूपी अग्नि ज्ञानी के ज्ञान को भी ढक देती है आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३.३९ ॥ हे कुन्तीपुत्र! ज्ञानी का ज्ञान भी इस कामना-रूपी नित्य शत्रु से ढका रहता है, जो अग्नि के समान है और कभी तृप्त नहीं होता। → श्लोक 40 इन्द्रिय, मन और बुद्धि में काम का निवास इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ३.४० ॥ इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—इस काम के निवास-स्थान कहे गए हैं। यह काम इन्हीं के द्वारा ज्ञान को ढककर देहधारी जीव को मोहित कर देता है। → श्लोक 41 पहले इन्द्रियों को वश में कर पाप-रूप काम का नाश करो तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ३.४१ ॥ इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! तुम पहले इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान (अनुभव) का नाश करने वाले इस पापरूप काम को निश्चय ही मार डालो। → श्लोक 42 इन्द्रियों से परे मन, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से परे आत्मा इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ३.४२ ॥ इन्द्रियों को (स्थूल शरीर से) श्रेष्ठ कहते हैं, इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है और जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मा है। → श्लोक 43 आत्मबल से कामरूपी दुर्जेय शत्रु को जीतो एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ३.४३ ॥ इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को स्थिर करके, हे महाबाहो! तुम इस कामना-रूप दुर्जेय शत्रु को मार डालो। →

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