भगवद्गीता 3.24 — यदि मैं कर्म न करूँ, तो लोक नष्ट हो जाएँगे
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ ३.२४ ॥
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यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब लोक नष्ट हो जाएँगे, मैं सृष्टि में अव्यवस्था का कारण बनूँगा और इन प्रजाओं का विनाश करने वाला हो जाऊँगा।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| उत्सीदेयुः | नष्ट हो जाएँगे |
| इमे | ये |
| लोकाः | सब लोक |
| न कुर्याम् | न करूँ |
| कर्म | कर्म |
| चेत् | यदि |
| अहम् | मैं |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सङ्करस्य | वर्ण-संकर, अव्यवस्था का |
| च | और |
| कर्ता | कारण |
| स्याम् | बन जाऊँगा |
| उपहन्याम् | नष्ट करूँगा |
| इमाः प्रजाः | इन प्रजाओं को |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| उत्सीदेयुः | नष्ट हो जाएँगे | सङ्करस्य | वर्ण-संकर, अव्यवस्था का |
| इमे | ये | च | और |
| लोकाः | सब लोक | कर्ता | कारण |
| न कुर्याम् | न करूँ | स्याम् | बन जाऊँगा |
| कर्म | कर्म | उपहन्याम् | नष्ट करूँगा |
| चेत् | यदि | इमाः प्रजाः | इन प्रजाओं को |
| अहम् | मैं | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
पिछले श्लोक की बात को आगे बढ़ाते हुए भगवान श्रीकृष्ण यहाँ कर्म के अभाव के गंभीर परिणामों को स्पष्ट रूप से रखते हैं। यह श्लोक कर्म की सामाजिक और वैश्विक भूमिका को बहुत स्पष्टता से दिखाता है।
भावार्थ
कर्म न करने पर लोकों का पतन
भगवान कहते हैं: उत्सीदेयुः इमे लोकाः न कुर्यां कर्म चेत् अहम्। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सभी लोक नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ। इसका आशय यह है कि सृष्टि की व्यवस्था निरंतर कर्म पर आधारित है, और यदि आदर्श स्वरूप भी कर्म से विमुख हो जाए, तो पूरा तंत्र बिखर सकता है।
संकर और प्रजा का नाश
सङ्करस्य च कर्ता स्याम्: भगवान कहते हैं कि मैं संकर, अर्थात् अव्यवस्था और मर्यादाओं के मिश्रण का कारण बनूँगा। जब लोग देखेंगे कि सर्वोच्च ने ही कर्तव्य छोड़ दिया, तो वे भी अपनी मर्यादाएँ और भूमिकाएँ छोड़ने लगेंगे, और समाज में भ्रम और असंतुलन फैलेगा।
उपहन्याम् इमाः प्रजाः: इस प्रकार मैं इन प्रजाओं का विनाश करने वाला ठहरूँगा। यहाँ भगवान एक बहुत गंभीर बात कहते हैं कि कर्तव्य छोड़ने का परिणाम केवल व्यक्तिगत नहीं होता, वह सामूहिक भी होता है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
हमारे छोटे दायित्व भी महत्वपूर्ण हैं: हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे एक व्यक्ति के कर्तव्य छोड़ देने से क्या फर्क पड़ता है। पर समाज, परिवार और संस्थाएँ ऐसे ही असंख्य छोटे योगदानों से चलती हैं।
उदाहरण का प्रभाव: जब कोई जिम्मेदार व्यक्ति अपना कर्तव्य छोड़ता है, तो दूसरों के लिए भी ढिलाई का रास्ता खुल जाता है। इसलिए उत्तरदायी लोगों को अपने आचरण के प्रति अधिक सजग रहना चाहिए।
कर्म न करने पर लोकों का पतन
भगवान कहते हैं: उत्सीदेयुः इमे लोकाः न कुर्यां कर्म चेत् अहम्। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सभी लोक नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ। इसका आशय यह है कि सृष्टि की व्यवस्था निरंतर कर्म पर आधारित है, और यदि आदर्श स्वरूप भी कर्म से विमुख हो जाए, तो पूरा तंत्र बिखर सकता है।
संकर और प्रजा का नाश
सङ्करस्य च कर्ता स्याम्: भगवान कहते हैं कि मैं संकर, अर्थात् अव्यवस्था और मर्यादाओं के मिश्रण का कारण बनूँगा। जब लोग देखेंगे कि सर्वोच्च ने ही कर्तव्य छोड़ दिया, तो वे भी अपनी मर्यादाएँ और भूमिकाएँ छोड़ने लगेंगे, और समाज में भ्रम और असंतुलन फैलेगा।
उपहन्याम् इमाः प्रजाः: इस प्रकार मैं इन प्रजाओं का विनाश करने वाला ठहरूँगा। यहाँ भगवान एक बहुत गंभीर बात कहते हैं कि कर्तव्य छोड़ने का परिणाम केवल व्यक्तिगत नहीं होता, वह सामूहिक भी होता है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
हमारे छोटे दायित्व भी महत्वपूर्ण हैं: हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे एक व्यक्ति के कर्तव्य छोड़ देने से क्या फर्क पड़ता है। पर समाज, परिवार और संस्थाएँ ऐसे ही असंख्य छोटे योगदानों से चलती हैं।
उदाहरण का प्रभाव: जब कोई जिम्मेदार व्यक्ति अपना कर्तव्य छोड़ता है, तो दूसरों के लिए भी ढिलाई का रास्ता खुल जाता है। इसलिए उत्तरदायी लोगों को अपने आचरण के प्रति अधिक सजग रहना चाहिए।
आगे का विषय
भगवान ने कर्म के अभाव के परिणाम बताए। अब अगले श्लोक में वे यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञानी और अज्ञानी, दोनों कर्म करते हैं, पर दोनों के भाव और उद्देश्य में बड़ा अंतर होता है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
कर्तव्य का त्याग केवल व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक अव्यवस्था भी लाता है।
बड़ी स्थिति में छोटी भूल भी बड़ा प्रभाव डालती है।
कर्म ही संसार की संरचना को चलाता है।
मूल्यहीनता से समाज में अराजकता बढ़ती है।
नेता की निष्क्रियता सबके लिए संकट बन सकती है।
कर्म न करने के भी परिणाम होते हैं।
मेरा कर्म किसी के हित या अहित का कारण बनता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'उत्सीदेयुः' का अर्थ क्या है
'सङ्कर' का क्या तात्पर्य है
क्या भगवान् सृष्टि का विनाश कर सकते हैं
अर्जुन के लिए यह क्या सन्देश है
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है
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