धार्मिक नेतृत्व का अर्थ किसी पद या वेश से नहीं, बल्कि धर्म, सत्य और कर्तव्य के पक्ष में स्वयं उदाहरण बनकर चलने से है। ऐसा नेता दूसरों पर अपनी ऊँची कसौटी थोपता नहीं, उन्हें धैर्य से आगे बढ़ाता है, और भय या स्वार्थ के बजाय विश्वास पर समन्वय बनाता है। परिवार, कक्षा, संस्था या समाज, हर जगह ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता रहती है।
गीता 3.21 कहती है कि श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, लोग वैसा ही करते हैं, और गीता 3.23 बताती है कि आदर्श व्यक्ति की निष्क्रियता भी समाज में निष्क्रियता फैलाती है, इसलिए उत्तरदायी व्यक्ति को सजग रहकर कर्म करते रहना चाहिए। गीता 3.26 और 3.29 सुधार के लिए उतावले न होकर धैर्य और संवेदनशीलता से वर्तमान समझ के अनुसार मार्गदर्शन देने की सीख देती हैं।
गीता 1.12 में भीष्म का शंखनाद दुर्योधन का मनोबल बढ़ाता है, पर कर्तव्य-निष्ठा और पक्ष के बंधन का द्वंद्व भी दिखाता है, इसलिए प्रोत्साहन तभी सार्थक है जब वह सत्य के साथ जुड़ा हो। गीता 1.11 में समन्वय की प्रेरणा भय से उपजी है और गीता 1.7 में नेता अपनी टीम की क्षमताओं का परिचय देता है, जबकि गीता 1.15 में धर्मपक्ष के वीर निर्भयता से अपने कर्तव्य की घोषणा करते हैं। गीता 1.1 में पक्षपात की दृष्टि धर्म-दृष्टि को धुंधला करती है।