भगवद्गीता 1.18 — सब योद्धाओं का अलग-अलग शंखनाद

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥ १.१८ ॥

हे पृथ्वीपति धृतराष्ट्र! राजा द्रुपद, द्रौपदी के पुत्रों और महाबाहु अभिमन्यु—इन सबने सब ओर से अपने-अपने शंख अलग-अलग बजाए।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

द्रुपदः द्रौपदेयाः च
सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रः च महाबाहुः
शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक् ॥

शब्दार्थ

पंक्ति 1
संस्कृत शब्द अर्थ
द्रुपदः राजा द्रुपद
द्रौपदेयाः द्रौपदी के पुत्र
च और
सर्वशः सब ओर से
पृथिवीपते हे पृथ्वीपति (धृतराष्ट्र)
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
सौभद्रः सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु
च और
महाबाहुः महाबाहु, विशाल भुजाओं वाले
शङ्खान् शंखों को
दध्मुः बजाया
पृथक् पृथक् अलग-अलग
पंक्ति 1 पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
द्रुपदः राजा द्रुपद सौभद्रः सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु
द्रौपदेयाः द्रौपदी के पुत्र च और
च और महाबाहुः महाबाहु, विशाल भुजाओं वाले
सर्वशः सब ओर से शङ्खान् शंखों को
पृथिवीपते हे पृथ्वीपति (धृतराष्ट्र) दध्मुः बजाया
पृथक् पृथक् अलग-अलग

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में पांडव पक्ष के शेष योद्धा अपने-अपने शंख बजाते हैं। संजय धृतराष्ट्र को 'पृथिवीपते' कहकर संबोधित करते हुए यह वर्णन पूरा करते हैं।

भावार्थ

शंखनाद की पूर्णता

संजय कहते हैं कि द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र और महाबाहु सौभद्र (अभिमन्यु) ने पृथक् पृथक् (अलग-अलग) अपने शंख बजाए। सर्वशः (सब ओर से) शब्द बताता है कि यह नाद चारों दिशाओं में फैल गया।

पृथिवीपते: संजय यहाँ धृतराष्ट्र को 'पृथ्वी के स्वामी' कहकर संबोधित करते हैं। इसमें हल्का-सा स्मरण भी है कि पृथ्वी का यह स्वामी अब अपने ही परिवार के विनाश का साक्षी बनने जा रहा है।

पृथक्-पृथक् शंखनाद: हर योद्धा ने अपने ढंग से नाद किया। यह सामूहिक शक्ति में व्यक्तिगत सहभागिता को दर्शाता है।

युवा ऊर्जा और अनुभव का संगम

इस सूची में द्रुपद जैसे अनुभवी राजा और अभिमन्यु जैसे युवा वीर एक साथ हैं। यह मिश्रण किसी भी समूह की शक्ति का आधार है, क्योंकि अनुभव दिशा देता है और युवा ऊर्जा गति प्रदान करती है।

हमारे जीवन के लिए संदेश

सबकी भागीदारी: जब हर व्यक्ति अपनी आवाज़ और अपना योगदान देता है, तब सामूहिक संकल्प मज़बूत होता है।

विरासत और भविष्य: पुरानी और नई पीढ़ी का साथ चलना किसी भी परिवार, संस्था या समाज की स्थिरता का रहस्य है।

आगे का विषय

पांडव पक्ष के सम्मिलित शंखनाद का प्रभाव कौरव सेना पर क्या पड़ा, इसका उत्तर अगले श्लोक में मिलता है। संजय बताते हैं कि यह घोष धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय को चीर गया।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

नेतृत्व
सामूहिक आह्वान व्यक्तिगत भूमिका
पारिवारिक
द्रौपदेय अभिमन्यु अगली पीढ़ी
मनोवैज्ञानिक
उत्साह एकजुटता
सामाजिक
सम्मिलित प्रयास
प्रबन्धन
हर सदस्य की भागीदारी
नैतिक
धर्म-पक्ष का समर्थन
दार्शनिक
अनेकता में एकता
आध्यात्मिक
संकल्प की घोषणा
शैक्षिक
पृथिवीपते सम्बोधन
कर्मयोग
कर्तव्य में सबकी भागीदारी
जिज्ञासा-दृष्टि
पृथक् पृथक् का संकेत
मानवता
युवा वीरों का उत्साह
व्यावहारिक
सबकी आवाज़ का महत्त्व
प्रतीक-दृष्टि
अलग शंख, एक उद्देश्य

सूत्र

हर सदस्य की आवाज़ टीम की शक्ति में कुछ जोड़ती है।

अलग-अलग स्वर भी एक उद्देश्य में मिलकर पूर्ण नाद बनते हैं।

युवा साहस किसी भी अभियान में नई ऊर्जा भरता है।

संवाद में सम्बोधन श्रोता की स्थिति और सम्बन्ध को याद दिलाता है।

एकता का अर्थ एक जैसे होना नहीं, एक लक्ष्य पर साथ चलना है।

जब परिवार धर्म के साथ खड़ा हो, तब उसकी शक्ति और बढ़ जाती है।

हर व्यक्ति का आह्वान अभियान का प्रारम्भ बन सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'पृथिवीपते' सम्बोधन किसके लिए है?
यह सम्बोधन सञ्जय द्वारा धृतराष्ट्र के लिए है, जिन्हें वे पृथ्वी का स्वामी कहकर पुकारते हैं।
'पृथक् पृथक्' से क्या संकेत मिलता है?
इसका अर्थ है कि हर योद्धा ने अपने-अपने शंख अलग-अलग बजाए, जिससे सबकी भागीदारी और उत्साह प्रकट होता है।
द्रौपदेय कौन थे?
द्रौपदेय द्रौपदी के पाँच पुत्र थे, जो पाण्डवों की अगली पीढ़ी के योद्धा थे।
'महाबाहुः' किसके लिए प्रयुक्त है?
यह अभिमन्यु के लिए प्रयुक्त है और उसके विशाल बल तथा पराक्रम का सूचक है।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
जब हर व्यक्ति अपनी भूमिका के साथ साझा लक्ष्य में योगदान देता है, तब पूरी टीम की शक्ति प्रकट होती है।

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