अध्याय 1 अर्जुन विषाद योग

47 श्लोक

आत्मिक परिवर्तन की यात्रा तब प्रारम्भ होती है जब हम अपने भीतर के भ्रम, भय और संघर्षों को ईमानदारी से स्वीकार करते हैं। इस अध्याय में अर्जुन मोह, शोक और कर्तव्य-संबंधी दुविधा से व्याकुल हो जाते हैं। उनकी स्थिति उन मानसिक संघर्षों का प्रतिनिधित्व करती है जिनका सामना जीवन में प्रत्येक व्यक्ति कभी न कभी करता है। इस अध्याय से हमें यह सीखने को मिलता है कि सही प्रश्न पूछना, अपनी सीमाओं को पहचानना और मार्गदर्शन के लिए विनम्र होना ही ज्ञान और आंतरिक विकास की पहली सीढ़ी है।

श्लोक सूची

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श्लोक 1 धर्मक्षेत्र में युद्ध के लिए एकत्र हुए पक्षों ने क्या किया? धृतराष्ट्र उवाच । धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १.१ ॥ धृतराष्ट्र ने कहा—हे सञ्जय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? → श्लोक 2 दुर्योधन का आचार्य द्रोण के पास जाना सञ्जय उवाच । दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ १.२ ॥ सञ्जय ने कहा—पाण्डवों की व्यूह-रचना में खड़ी सेना को देखकर राजा दुर्योधन आचार्य द्रोण के पास गया और उनसे यह वचन बोला। → श्लोक 3 दुर्योधन का द्रोणाचार्य को पाण्डव सेना दिखाना पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥ १.३ ॥ हे आचार्य! पाण्डु-पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न ने व्यूह में सजाया है। → श्लोक 4 पाण्डव सेना के पराक्रमी महारथी (भाग १) अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ १.४ ॥ इस सेना में बड़े-बड़े धनुर्धर और युद्ध में भीम तथा अर्जुन के समान शूरवीर हैं—जैसे सात्यकि, राजा विराट और महारथी द्रुपद। → श्लोक 5 पाण्डव सेना के पराक्रमी महारथी (भाग २) धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥ १.५ ॥ धृष्टकेतु, चेकितान, पराक्रमी काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य—ये सब भी पाण्डव सेना में हैं। → श्लोक 6 पाण्डव सेना के पराक्रमी महारथी (भाग ३) युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ १.६ ॥ पराक्रमी युधामन्यु, बलशाली उत्तमौजा, सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र—ये सभी महारथी हैं। → श्लोक 7 दुर्योधन का अपने पक्ष के प्रमुख नायकों को बताना अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ १.७ ॥ हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हमारे पक्ष में भी जो प्रमुख सेनानायक हैं, उन्हें भी आप जान लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मैं अपनी सेना के उन नायकों के नाम बताता हूँ। → श्लोक 8 कौरव पक्ष के महान योद्धाओं का परिचय भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ १.८ ॥ आप स्वयं, भीष्म, कर्ण और सदा युद्धविजयी कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा—ये हमारे पक्ष के प्रमुख योद्धा हैं। → श्लोक 9 मेरे लिए प्राण त्यागने को तैयार वीर अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ १.९ ॥ इनके अतिरिक्त और भी अनेक शूरवीर हैं, जो मेरे लिए प्राणों की आशा छोड़ चुके हैं। वे अनेक प्रकार के शस्त्र चलाने वाले और सभी युद्ध-कला में निपुण हैं। → श्लोक 10 भीष्म-रक्षित कौरव सेना और भीम-रक्षित पाण्डव सेना की तुलना अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १.१० ॥ भीष्म द्वारा रक्षित हमारी सेना अपरिमित (अथवा अपर्याप्त) है, और भीम द्वारा रक्षित इन पाण्डवों की सेना परिमित (अथवा पर्याप्त) है। → श्लोक 11 सभी मोर्चों से भीष्म की रक्षा का निर्देश अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ १.११ ॥ आप सभी योद्धा अपने-अपने निर्धारित मोर्चों पर दृढ़ता से स्थित रहते हुए सब ओर से केवल भीष्म पितामह की ही रक्षा करें। → श्लोक 12 भीष्म का सिंहनाद और शंखध्वनि तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १.१२ ॥ दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए कुरुवंश के वयोवृद्ध प्रतापी पितामह भीष्म ने सिंह के समान उच्च स्वर से गर्जना करके शंख बजाया। → श्लोक 13 युद्धघोष: शंख, भेरी और नगाड़ों का तुमुल नाद ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १.१३ ॥ इसके पश्चात शंख, भेरी, पणव, आनक और गोमुख आदि वाद्य अचानक एक साथ बज उठे। उनका वह शब्द अत्यन्त भयंकर और कोलाहल से भरा हुआ था। → श्लोक 14 श्रीकृष्ण और अर्जुन का दिव्य शंखनाद ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥ १.१४ ॥ इसके बाद श्वेत घोड़ों से जुते हुए विशाल रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अपने दिव्य शंख बजाए। → श्लोक 15 पाञ्चजन्य, देवदत्त और पौण्ड्र: प्रमुख योद्धाओं के शंख पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः । पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १.१५ ॥ श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य, अर्जुन ने देवदत्त और भयंकर कर्म करने वाले भीम ने अपना विशाल शंख पौण्ड्र बजाया। → श्लोक 16 युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव का शंखनाद अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १.१६ ॥ कुन्ती-पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया, तथा नकुल और सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए। → श्लोक 17 काशिराज, शिखण्डी, धृष्टद्युम्न आदि का शंखनाद काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १.१७ ॥ श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट और अपराजित सात्यकि—इन सबने भी अपने-अपने शंख बजाए। → श्लोक 18 सब योद्धाओं का अलग-अलग शंखनाद द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥ १.१८ ॥ हे पृथ्वीपति धृतराष्ट्र! राजा द्रुपद, द्रौपदी के पुत्रों और महाबाहु अभिमन्यु—इन सबने सब ओर से अपने-अपने शंख अलग-अलग बजाए। → श्लोक 19 पाण्डवों के नाद से कौरवों के हृदय का विदीर्ण होना स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १.१९ ॥ आकाश और पृथ्वी को गुंजाती हुई वह भयंकर ध्वनि धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को विदीर्ण करने लगी। → श्लोक 20 अर्जुन का धनुष उठाकर श्रीकृष्ण से कहना अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः । हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ॥ १.२० ॥ हे राजन्! इसके बाद व्यूह में खड़े धृतराष्ट्र-पुत्रों को देखकर, शस्त्र-प्रहार प्रारम्भ होने के समय, कपिध्वज अर्जुन ने धनुष उठाया और श्रीकृष्ण से यह वचन कहा। → श्लोक 21 दोनों सेनाओं के मध्य रथ खड़ा करने का अर्जुन का अनुरोध अर्जुन उवाच । सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ १.२१ ॥ अर्जुन ने कहा—हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए। → श्लोक 22 युद्ध के लिए खड़े योद्धाओं को देखने की अर्जुन की इच्छा यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् । कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥ १.२२ ॥ जब तक मैं युद्ध की इच्छा से खड़े हुए इन योद्धाओं को देख न लूँ, तब तक रथ वहीं रखिए—कि इस युद्ध के उद्योग में मुझे किन-किन के साथ लड़ना है। → श्लोक 23 दुर्बुद्धि दुर्योधन का प्रिय करने वालों को देखने की इच्छा योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ १.२३ ॥ मैं उन युद्ध के लिए उद्यत लोगों को देखूँगा जो यहाँ एकत्र हुए हैं और युद्ध में दुष्ट बुद्धि वाले धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन का प्रिय करना चाहते हैं। → श्लोक 24 श्रीकृष्ण द्वारा रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा करना सञ्जय उवाच । एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ १.२४ ॥ सञ्जय ने कहा—हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! निद्राजयी अर्जुन के इस प्रकार कहने पर श्रीकृष्ण ने उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर दिया। → श्लोक 25 श्रीकृष्ण का अर्जुन को कुरुओं को देखने का निर्देश भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥ १.२५ ॥ भीष्म, द्रोण और अन्य सब राजाओं के सामने रथ खड़ा करके श्रीकृष्ण ने कहा—हे पार्थ! यहाँ एकत्र हुए इन कुरुवंशियों को देखो। → श्लोक 26 अर्जुन का दोनों सेनाओं में अपने स्वजनों को देखना तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥ १.२६ ॥ वहाँ अर्जुन ने दोनों सेनाओं में खड़े अपने पिता-तुल्य बड़ों, पितामहों, आचार्यों, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को देखा। → श्लोक 27 श्वशुरों और सुहृदों को देखकर अर्जुन की दशा श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥ १.२७ ॥ अर्जुन ने दोनों सेनाओं में खड़े श्वसुरों और मित्रों को भी देखा, और उन सभी बन्धुओं को वहाँ उपस्थित देखकर वह कुन्ती-पुत्र अर्जुन गहरे भाव में डूब गया। → श्लोक 28 करुणा से भरे अर्जुन का विषाद कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् । अर्जुन उवाच । दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ १.२८ ॥ अत्यन्त करुणा से भरा हुआ अर्जुन विषाद करता हुआ बोला—हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से सामने खड़े इन अपने स्वजनों को देखकर... → श्लोक 29 अर्जुन के शरीर में विषाद के लक्षण सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ १.२९ ॥ मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर में कम्पन हो रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं। → श्लोक 30 गाण्डीव का हाथ से गिरना और मन का भ्रमित होना गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ १.३० ॥ मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है, त्वचा में जलन हो रही है, मैं खड़ा रहने में भी समर्थ नहीं हूँ और मेरा मन मानो भ्रमित हो रहा है। → श्लोक 31 अपशकुन और स्वजनों को मारने में कल्याण का अभाव निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ १.३१ ॥ हे केशव! मैं शकुनों को भी विपरीत देख रहा हूँ, और युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर किसी प्रकार का कल्याण भी नहीं देखता। → श्लोक 32 अर्जुन को न विजय चाहिए, न राज्य, न सुख न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ १.३२ ॥ हे कृष्ण! मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य और न सुख। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से, भोगों से अथवा जीवन से भी क्या प्रयोजन है? → श्लोक 33 जिनके लिए राज्य चाहा, वही प्राण त्यागने को खड़े हैं येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ १.३३ ॥ जिनके लिए हमें राज्य, भोग और सुख चाहिए थे, वे ही ये सब अपने प्राणों और धन की आशा छोड़कर युद्ध में खड़े हैं। → श्लोक 34 युद्ध में खड़े सम्बन्धियों की सूची आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥ १.३४ ॥ गुरुजन, पिता-तुल्य बड़े, पुत्र, पितामह, मामा, श्वसुर, पौत्र, साले तथा अन्य सम्बन्धी—ये सभी यहाँ युद्ध के लिए खड़े हैं। → श्लोक 35 त्रिलोक के राज्य के लिए भी स्वजनों को मारने की इच्छा नहीं एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ १.३५ ॥ हे मधुसूदन! ये मुझे मार भी डालें, तब भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता। तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, फिर इस पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या। → श्लोक 36 आततायियों को मारने पर भी पाप लगने की आशंका निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥ १.३६ ॥ हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। → श्लोक 37 स्वजनों को मारकर सुखी कैसे होंगे? तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् । स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ १.३७ ॥ इसलिए अपने ही बन्धु धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं है। हे माधव! अपने स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे? → श्लोक 38 लोभ से अन्धे हुए लोग कुलनाश और मित्रद्रोह का दोष नहीं देखते यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ १.३८ ॥ यद्यपि लोभ से भ्रष्ट बुद्धि वाले ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष और मित्रों से द्रोह करने के पाप को नहीं देखते, → श्लोक 39 दोष को जानने वाले हम पाप से क्यों न बचें? कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ १.३९ ॥ हे जनार्दन! कुल के नाश से होने वाले दोष को भली-भाँति देखने वाले हमें इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए? → श्लोक 40 कुल के नाश से सनातन कुलधर्मों का नाश कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ १.४० ॥ कुल के नाश से सनातन कुल-परम्पराएँ नष्ट हो जाती हैं, और धर्म के नष्ट होने पर अधर्म सम्पूर्ण कुल को दबा लेता है। → श्लोक 41 अधर्म बढ़ने पर कुल के आचार-विचार में बिगाड़ का भय अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥ १.४१ ॥ हे कृष्ण! अधर्म के बढ़ने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है। (यह तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में अर्जुन की चिन्ता है।) → श्लोक 42 वर्णसङ्कर और पितरों के पतन की आशंका सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ १.४२ ॥ वह सामाजिक अव्यवस्था कुल का नाश करने वालों और कुल के लिए नरक-सदृश दुःख का कारण बनती है। इनके पितर भी पिण्ड और जल-तर्पण की क्रियाएँ लुप्त होने से पतन को प्राप्त होते हैं। → श्लोक 43 कुलघातियों के दोष से जाति और कुल के शाश्वत धर्मों का नाश दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ १.४३ ॥ कुल का नाश करने वालों के इन वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले दोषों से जाति-धर्म और सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं। → श्लोक 44 कुलधर्म नष्ट होने पर अनिश्चित काल तक नरकवास की सुनी हुई बात उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ १.४४ ॥ हे जनार्दन! हमने सुना है कि जिन मनुष्यों के कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उनका अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है। → श्लोक 45 राज्य-सुख के लोभ में स्वजनों को मारने को उद्यत होने का पश्चात्ताप अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ १.४५ ॥ हाय! कितने खेद की बात है कि हम बड़ा पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से अपने ही स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हुए हैं। → श्लोक 46 निःशस्त्र अर्जुन का मारा जाना भी श्रेयस्कर यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ १.४६ ॥ यदि शस्त्र हाथ में लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र मुझ निःशस्त्र और प्रतिकार न करने वाले को युद्ध में मार डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा। → श्लोक 47 धनुष-बाण त्यागकर शोकाकुल अर्जुन का रथ में बैठ जाना सञ्जय उवाच । एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ १.४७ ॥ सञ्जय ने कहा—इस प्रकार कहकर शोक से व्याकुल मन वाला अर्जुन युद्धभूमि में बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया। →

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