भगवद्गीता 1.36 — आततायियों को मारने पर भी पाप लगने की आशंका
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥ १.३६ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| निहत्य | मारकर |
| धार्तराष्ट्रान् | धृतराष्ट्र-पुत्रों को |
| नः | हमें |
| का | कौन-सी |
| प्रीतिः | प्रसन्नता |
| स्यात् | होगी |
| जनार्दन | हे जनार्दन |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| पापम् | पाप |
| एव | ही |
| आश्रयेत् | लगेगा |
| अस्मान् | हमें |
| हत्वा | मारकर |
| एतान् | इन |
| आततायिनः | आततायियों को |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| निहत्य | मारकर | पापम् | पाप |
| धार्तराष्ट्रान् | धृतराष्ट्र-पुत्रों को | एव | ही |
| नः | हमें | आश्रयेत् | लगेगा |
| का | कौन-सी | अस्मान् | हमें |
| प्रीतिः | प्रसन्नता | हत्वा | मारकर |
| स्यात् | होगी | एतान् | इन |
| जनार्दन | हे जनार्दन | आततायिनः | आततायियों को |
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में अर्जुन युद्ध के परिणाम पर प्रश्न उठाता है। वह कहता है कि धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर उसे कौन-सा सुख मिलेगा, उलटे इन आततायियों को मारने पर भी पाप ही लगेगा।
भावार्थ
प्रसन्नता का प्रश्न
अर्जुन पूछता है, निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्यात् (धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी)। फिर वह कहता है कि पापम् एव आश्रयेत् अस्मान् (हमें पाप ही लगेगा), भले ही ये आततायिनः (अत्याचारी) हों।
जनार्दन: अर्जुन यहाँ श्रीकृष्ण को 'जनार्दन' कहता है, यानी जो लोगों को कष्टों से मुक्ति देने वाला है। वह उन्हीं से मार्गदर्शन की अपेक्षा रखता है।
आततायी: शास्त्रों में आग लगाने वाले, विष देने वाले, शस्त्र लेकर मारने आने वाले, धन या भूमि छीनने वाले और पत्नी का हरण करने वाले को आततायी कहा गया है। नीति-शास्त्र के अनुसार आततायी को मारना पाप नहीं माना गया। फिर भी अर्जुन कहता है कि इन्हें मारकर भी पाप लगेगा। यह उसकी करुणा का स्तर दिखाता है।
शास्त्र और भावना का द्वंद्व
यहाँ अर्जुन स्वयं मानता है कि कौरव आततायी हैं, यानी वह उनकी गलती को स्वीकार करता है। फिर भी उसकी भावनाएँ उसे इस निर्णय की ओर ले जाती हैं कि उन्हें न मारा जाए। यही उसका असली द्वंद्व है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
सही और भावना का संघर्ष: कई बार हम जानते हैं कि क्या उचित है, फिर भी भावनाएँ हमें रोक देती हैं। इस द्वंद्व को पहचानना ही उसे सुलझाने की शुरुआत है।
परिणाम का आकलन: किसी कर्म का परिणाम केवल बाहरी लाभ से नहीं, भीतरी शांति से भी मापा जाना चाहिए।
प्रसन्नता का प्रश्न
अर्जुन पूछता है, निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्यात् (धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी)। फिर वह कहता है कि पापम् एव आश्रयेत् अस्मान् (हमें पाप ही लगेगा), भले ही ये आततायिनः (अत्याचारी) हों।
जनार्दन: अर्जुन यहाँ श्रीकृष्ण को 'जनार्दन' कहता है, यानी जो लोगों को कष्टों से मुक्ति देने वाला है। वह उन्हीं से मार्गदर्शन की अपेक्षा रखता है।
आततायी: शास्त्रों में आग लगाने वाले, विष देने वाले, शस्त्र लेकर मारने आने वाले, धन या भूमि छीनने वाले और पत्नी का हरण करने वाले को आततायी कहा गया है। नीति-शास्त्र के अनुसार आततायी को मारना पाप नहीं माना गया। फिर भी अर्जुन कहता है कि इन्हें मारकर भी पाप लगेगा। यह उसकी करुणा का स्तर दिखाता है।
शास्त्र और भावना का द्वंद्व
यहाँ अर्जुन स्वयं मानता है कि कौरव आततायी हैं, यानी वह उनकी गलती को स्वीकार करता है। फिर भी उसकी भावनाएँ उसे इस निर्णय की ओर ले जाती हैं कि उन्हें न मारा जाए। यही उसका असली द्वंद्व है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
सही और भावना का संघर्ष: कई बार हम जानते हैं कि क्या उचित है, फिर भी भावनाएँ हमें रोक देती हैं। इस द्वंद्व को पहचानना ही उसे सुलझाने की शुरुआत है।
परिणाम का आकलन: किसी कर्म का परिणाम केवल बाहरी लाभ से नहीं, भीतरी शांति से भी मापा जाना चाहिए।
आगे का विषय
अर्जुन ने अपनी करुणा और पाप-बोध को स्पष्ट किया। अगले श्लोक में वह इसी आधार पर अपना निष्कर्ष देता है कि अपने ही बंधुओं को मारना हमारे लिए उचित नहीं है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जो विजय अपनों की मृत्यु से मिले, उसमें सच्ची प्रसन्नता नहीं।
आततायी का दण्ड धर्मसम्मत हो सकता है, पर मन का भार फिर भी रह जाता है।
अपराध-बोध कर्म से पहले ही मन को घेर सकता है।
न्याय तब पूर्ण होता है जब वह द्वेष से नहीं, धर्म से किया जाए।
परिणाम की चिन्ता में कर्तव्य ओझल न हो, यही विवेक है।
करुणा और न्याय एक-दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं।
भावना से आरम्भ हुआ तर्क अधूरा भी हो सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'आततायी' किसे कहते हैं?
आततायी को मारने पर भी अर्जुन पाप क्यों मान रहा है?
'प्रीतिः' का क्या अर्थ है?
क्या अर्जुन का तर्क शास्त्र-सम्मत है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: