विवेक वह समझ है जो सही और गलत, ज़रूरी और गैर-ज़रूरी, स्थायी और क्षणिक के बीच भेद कर पाती है। भावनाओं, दबाव और इच्छाओं के बीच जो ठहरकर देख सके, वही विवेकशील है। जानकारी बहुत होने पर भी विवेक कम हो सकता है, और कम पढ़ा व्यक्ति भी विवेकी हो सकता है, क्योंकि विवेक का संबंध देखने की स्पष्टता से है, सूचना की मात्रा से नहीं।
गीता 18.30 सात्त्विक बुद्धि की पहचान बताती है: वह प्रवृत्ति-निवृत्ति, कर्तव्य-अकर्तव्य, भय-अभय और बंध-मोक्ष का स्पष्ट भेद करती है। गीता 2.41 कहती है कि दृढ़ लक्ष्य वाले की बुद्धि एकाग्र होती है, जबकि कामनाओं में बँटे मनुष्य की बुद्धि अनेक दिशाओं में बिखर जाती है। गीता 2.52 के अनुसार मोह के दलदल को पार करने वाली बुद्धि सहज वैराग्य पाती है।
गीता 16.23 और 16.24 बताती हैं कि केवल कामना और मनमानी से चलने वाले को सिद्धि नहीं मिलती, और कर्तव्य-अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र तथा अनुभवी जनों का मार्गदर्शन आधार बने। गीता 3.36 में अर्जुन का प्रश्न है कि मनुष्य अनचाहे ही गलत कर्म में क्यों बह जाता है, यानी गलती सुधारने से पहले उसके मूल कारण को समझना ज़रूरी है। गीता 17.28 श्रद्धा के बिना किए कर्म को निष्फल बताती है, और गीता 4.42 संशय को ज्ञान से काटने की सीख देती है।