भगवद्गीता 3.29 — गुणों से मोहित अज्ञानियों को ज्ञानी विचलित न करे
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ ३.२९ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
प्रकृति के गुणों से मोहित मनुष्य गुणों के कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन अधूरा जानने वाले मन्द बुद्धि लोगों को पूर्ण ज्ञानी पुरुष विचलित न करे।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| प्रकृतेः | प्रकृति के |
| गुण-सम्मूढाः | गुणों से मोहित |
| सज्जन्ते | आसक्त होते हैं |
| गुण-कर्मसु | गुणों के कर्मों में |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| तान् | उन |
| अकृत्स्नविदः | अधूरा जानने वाले |
| मन्दान् | मन्द बुद्धि वालों को |
| कृत्स्नवित् | पूर्ण जानने वाला |
| न विचालयेत् | विचलित न करे |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| प्रकृतेः | प्रकृति के | तान् | उन |
| गुण-सम्मूढाः | गुणों से मोहित | अकृत्स्नविदः | अधूरा जानने वाले |
| सज्जन्ते | आसक्त होते हैं | मन्दान् | मन्द बुद्धि वालों को |
| गुण-कर्मसु | गुणों के कर्मों में | कृत्स्नवित् | पूर्ण जानने वाला |
| न विचालयेत् | विचलित न करे | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गुणों से मोहित लोगों की स्थिति का वर्णन करते हैं और ज्ञानी के लिए एक स्पष्ट मर्यादा निर्धारित करते हैं। यह श्लोक श्लोक 26 में दी गई सीख को और अधिक स्पष्टता देता है।
भावार्थ
गुणों से मोहित लोग
भगवान कहते हैं: प्रकृतेः गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। जो लोग प्रकृति के गुणों से पूरी तरह मोहित हैं, वे गुणों के कर्मों में आसक्त हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि सुख इंद्रिय-भोग, सफलता या मान-सम्मान में ही है, इसलिए वे उन्हीं के पीछे दौड़ते रहते हैं।
यह कोई निंदा का कथन नहीं, एक स्थिति का वर्णन है। हम सभी जीवन के किसी न किसी चरण में इसी अवस्था से गुज़रते हैं।
अकृत्स्नविद् और कृत्स्नवित्
तान् अकृत्स्नविदः मन्दान्: भगवान ऐसे लोगों को अकृत्स्नविद् कहते हैं, अर्थात् जो सम्पूर्ण सत्य को नहीं जानते और केवल उसके एक अंश को देखते हैं, और मन्द यानी मंद बुद्धि वाले, जिनकी समझ अभी विकसित हो रही है। इसके विपरीत कृत्स्नवित् वह है जो सम्पूर्ण सत्य को जानता है।
न विचालयेत्: कृत्स्नवित् को चाहिए कि वह उन्हें विचलित न करे। यह श्लोक 26 की ही पुष्टि है कि जिसे अधिक समझ है, उसकी जिम्मेदारी है कि वह धैर्य, करुणा और उचित मार्गदर्शन के साथ दूसरों की सहायता करे, उन्हें अस्थिर या भ्रमित न करे।
हमारे जीवन के लिए संदेश
धैर्य और करुणा: जिसे अधिक समझ मिली है, उसके लिए यह श्लोक विनम्रता का पाठ है। दूसरों की कमज़ोरियों को देखकर उनका उपहास करने की जगह उनके स्तर से उन्हें आगे बढ़ाना ही श्रेष्ठ मार्ग है।
अपनी स्थिति की ईमानदार पहचान: यदि हम स्वयं सुख-सुविधा और मान-सम्मान की दौड़ में फँसे हैं, तो इसे स्वीकार करना ही आगे बढ़ने का पहला कदम है।
गुणों से मोहित लोग
भगवान कहते हैं: प्रकृतेः गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। जो लोग प्रकृति के गुणों से पूरी तरह मोहित हैं, वे गुणों के कर्मों में आसक्त हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि सुख इंद्रिय-भोग, सफलता या मान-सम्मान में ही है, इसलिए वे उन्हीं के पीछे दौड़ते रहते हैं।
यह कोई निंदा का कथन नहीं, एक स्थिति का वर्णन है। हम सभी जीवन के किसी न किसी चरण में इसी अवस्था से गुज़रते हैं।
अकृत्स्नविद् और कृत्स्नवित्
तान् अकृत्स्नविदः मन्दान्: भगवान ऐसे लोगों को अकृत्स्नविद् कहते हैं, अर्थात् जो सम्पूर्ण सत्य को नहीं जानते और केवल उसके एक अंश को देखते हैं, और मन्द यानी मंद बुद्धि वाले, जिनकी समझ अभी विकसित हो रही है। इसके विपरीत कृत्स्नवित् वह है जो सम्पूर्ण सत्य को जानता है।
न विचालयेत्: कृत्स्नवित् को चाहिए कि वह उन्हें विचलित न करे। यह श्लोक 26 की ही पुष्टि है कि जिसे अधिक समझ है, उसकी जिम्मेदारी है कि वह धैर्य, करुणा और उचित मार्गदर्शन के साथ दूसरों की सहायता करे, उन्हें अस्थिर या भ्रमित न करे।
हमारे जीवन के लिए संदेश
धैर्य और करुणा: जिसे अधिक समझ मिली है, उसके लिए यह श्लोक विनम्रता का पाठ है। दूसरों की कमज़ोरियों को देखकर उनका उपहास करने की जगह उनके स्तर से उन्हें आगे बढ़ाना ही श्रेष्ठ मार्ग है।
अपनी स्थिति की ईमानदार पहचान: यदि हम स्वयं सुख-सुविधा और मान-सम्मान की दौड़ में फँसे हैं, तो इसे स्वीकार करना ही आगे बढ़ने का पहला कदम है।
आगे का विषय
भगवान ने अज्ञानियों के प्रति धैर्य की सीमा तय की। अब अगले श्लोक में वे अर्जुन के लिए सीधा और निर्णायक उपदेश देते हैं कि सब कर्म मुझमें अर्पित करके, आशा और ममता छोड़कर, चिंता-रहित होकर युद्ध करो।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
दूसरों की यात्रा को उनके अपने समय में चलने दो।
प्रकृति के आकर्षण में फँसा मन अचानक ऊँचे उपदेश से नहीं बदलता।
पूर्ण ज्ञानी वही है जो अधूरे को भी सम्मान देता है।
किसी का सहारा बिना विकल्प दिए छीन लेना हानिकारक है।
सही मार्गदर्शन व्यक्ति को उसकी स्थिति से धीरे-धीरे ऊपर उठाता है।
ज्ञान जितना गहरा, उतना सरल और करुणामय होना चाहिए।
परिवर्तन आचरण से आता है, तर्क से नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'अकृत्स्नविद्' कौन हैं
'कृत्स्नवित्' कौन है
ज्ञानी को उन्हें विचलित क्यों नहीं करना चाहिए
क्या ज्ञानी चुप रहकर कुछ न करे
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: