भगवद्गीता 18.29 — गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति के तीन भेद
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥ १८.२९ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
हे धनञ्जय! अब तुम बुद्धि और धृति के गुणों के अनुसार तीन-तीन भेद, जो मैं पूर्ण रूप से और अलग-अलग कहने जा रहा हूँ, उन्हें सुनो।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| बुद्धेः | बुद्धि का |
| भेदम् | भेद |
| धृतेः | धृति का, धारण-शक्ति का |
| च एव | और भी |
| गुणतः | गुणों के अनुसार |
| त्रिविधम् | तीन प्रकार का |
| शृणु | सुनो |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| प्रोच्यमानम् | कहे जा रहे को |
| अशेषेण | पूर्ण रूप से |
| पृथक्त्वेन | अलग-अलग |
| धनञ्जय | हे धनञ्जय (अर्जुन) |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| बुद्धेः | बुद्धि का | प्रोच्यमानम् | कहे जा रहे को |
| भेदम् | भेद | अशेषेण | पूर्ण रूप से |
| धृतेः | धृति का, धारण-शक्ति का | पृथक्त्वेन | अलग-अलग |
| च एव | और भी | धनञ्जय | हे धनञ्जय (अर्जुन) |
| गुणतः | गुणों के अनुसार | ||
| त्रिविधम् | तीन प्रकार का | ||
| शृणु | सुनो | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में श्रीकृष्ण बुद्धि और धृति के भी गुणों के अनुसार तीन-तीन भेद बताने की घोषणा करते हैं और अर्जुन को उन्हें पूरी तरह तथा अलग-अलग सुनने का निर्देश देते हैं।
भावार्थ
गुणभेद का विस्तार
अब तक श्रीकृष्ण ने ज्ञान, कर्म और कर्ता के तीन-तीन भेद समझाए। यहाँ वे उसी शृंखला को आगे बढ़ाते हुए दो और महत्त्वपूर्ण तत्त्वों का परिचय देते हैं: बुद्धि और धृति। ये दोनों भीतर के वे उपकरण हैं जो हमारे सारे कर्मों को दिशा और टिकाव देते हैं।
बुद्धि और धृति क्यों महत्त्वपूर्ण हैं
बुद्धि (Discriminative intellect): वह क्षमता जो सही और गलत, करने योग्य और न करने योग्य के बीच भेद करती है। हमारे सारे निर्णय इसी से होते हैं। जैसी बुद्धि, वैसा निर्णय, और जैसा निर्णय, वैसा जीवन।
धृति (Fortitude or resolve): वह धारण करने की शक्ति जो हमें अपने निर्णय पर टिकाए रखती है। बुद्धि मार्ग दिखाती है, पर उस मार्ग पर चलते रहने की शक्ति धृति देती है। जो व्यक्ति सही जानता है पर टिक नहीं पाता, उसमें धृति की कमी है।
दोनों का संबंध ऐसा है जैसे नक्शा और चलने का साहस। केवल नक्शा हो तो यात्रा नहीं होती, और केवल साहस हो तो भटकाव होता है।
पृथक्त्वेन अशेषेण (अलग-अलग और पूर्णतः)
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे इसे अशेषेण यानी कुछ भी छोड़े बिना, और पृथक्त्वेन यानी अलग-अलग करके सुनें। यह निर्देश बताता है कि विषय सूक्ष्म है और इसमें भेद बारीक हैं। बुद्धि के तीन रूप और धृति के तीन रूप, दोनों अलग-अलग समझने होंगे, ताकि हम अपने भीतर उनकी पहचान कर सकें।
धनंजय संबोधन का संकेत
श्रीकृष्ण अर्जुन को धनंजय कहकर पुकारते हैं, जिसका अर्थ है धन को जीतने वाला। यह एक गरिमामय संबोधन है जो अर्जुन की विजय-प्रवृत्ति का स्मरण कराता है। संकेत है कि जैसे अर्जुन ने बाहरी युद्ध जीते, वैसे ही अब उसे भीतर के गुणों को समझकर आंतरिक विजय पानी है।
गुणों का आत्म-निरीक्षण में उपयोग
बुद्धि और धृति के तीन भेदों की सूची केवल जानकारी के लिए नहीं, बल्कि स्वयं की जाँच के लिए है। जैसे हम स्वास्थ्य जाँच कराते हैं, वैसे ही अपनी निर्णय-शक्ति और टिकाव की शक्ति की भी जाँच करनी चाहिए। यही अगले श्लोकों का प्रयोजन है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
जीवन की अधिकांश समस्याएँ या तो गलत निर्णय से आती हैं, जो बुद्धि का दोष है, या सही निर्णय पर टिके न रहने से, जो धृति का दोष है। जब हम इन दोनों को पहचानते हैं, तब सुधार का मार्ग स्पष्ट हो जाता है। अच्छा अध्ययन, सत्संग और आत्म-चिंतन बुद्धि को शुद्ध करते हैं, और अनुशासन तथा अभ्यास धृति को मजबूत करते हैं।
गुणभेद का विस्तार
अब तक श्रीकृष्ण ने ज्ञान, कर्म और कर्ता के तीन-तीन भेद समझाए। यहाँ वे उसी शृंखला को आगे बढ़ाते हुए दो और महत्त्वपूर्ण तत्त्वों का परिचय देते हैं: बुद्धि और धृति। ये दोनों भीतर के वे उपकरण हैं जो हमारे सारे कर्मों को दिशा और टिकाव देते हैं।
बुद्धि और धृति क्यों महत्त्वपूर्ण हैं
बुद्धि (Discriminative intellect): वह क्षमता जो सही और गलत, करने योग्य और न करने योग्य के बीच भेद करती है। हमारे सारे निर्णय इसी से होते हैं। जैसी बुद्धि, वैसा निर्णय, और जैसा निर्णय, वैसा जीवन।
धृति (Fortitude or resolve): वह धारण करने की शक्ति जो हमें अपने निर्णय पर टिकाए रखती है। बुद्धि मार्ग दिखाती है, पर उस मार्ग पर चलते रहने की शक्ति धृति देती है। जो व्यक्ति सही जानता है पर टिक नहीं पाता, उसमें धृति की कमी है।
दोनों का संबंध ऐसा है जैसे नक्शा और चलने का साहस। केवल नक्शा हो तो यात्रा नहीं होती, और केवल साहस हो तो भटकाव होता है।
पृथक्त्वेन अशेषेण (अलग-अलग और पूर्णतः)
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे इसे अशेषेण यानी कुछ भी छोड़े बिना, और पृथक्त्वेन यानी अलग-अलग करके सुनें। यह निर्देश बताता है कि विषय सूक्ष्म है और इसमें भेद बारीक हैं। बुद्धि के तीन रूप और धृति के तीन रूप, दोनों अलग-अलग समझने होंगे, ताकि हम अपने भीतर उनकी पहचान कर सकें।
धनंजय संबोधन का संकेत
श्रीकृष्ण अर्जुन को धनंजय कहकर पुकारते हैं, जिसका अर्थ है धन को जीतने वाला। यह एक गरिमामय संबोधन है जो अर्जुन की विजय-प्रवृत्ति का स्मरण कराता है। संकेत है कि जैसे अर्जुन ने बाहरी युद्ध जीते, वैसे ही अब उसे भीतर के गुणों को समझकर आंतरिक विजय पानी है।
गुणों का आत्म-निरीक्षण में उपयोग
बुद्धि और धृति के तीन भेदों की सूची केवल जानकारी के लिए नहीं, बल्कि स्वयं की जाँच के लिए है। जैसे हम स्वास्थ्य जाँच कराते हैं, वैसे ही अपनी निर्णय-शक्ति और टिकाव की शक्ति की भी जाँच करनी चाहिए। यही अगले श्लोकों का प्रयोजन है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
जीवन की अधिकांश समस्याएँ या तो गलत निर्णय से आती हैं, जो बुद्धि का दोष है, या सही निर्णय पर टिके न रहने से, जो धृति का दोष है। जब हम इन दोनों को पहचानते हैं, तब सुधार का मार्ग स्पष्ट हो जाता है। अच्छा अध्ययन, सत्संग और आत्म-चिंतन बुद्धि को शुद्ध करते हैं, और अनुशासन तथा अभ्यास धृति को मजबूत करते हैं।
आगे का विषय
बुद्धि और धृति का महत्त्व स्थापित हो चुका है। अब श्रीकृष्ण सबसे पहले बुद्धि के तीन भेदों में से सात्त्विक बुद्धि का परिचय देते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
बुद्धि दिशा देती है, धृति उस दिशा पर टिके रहने की शक्ति देती है।
धैर्य के बिना श्रेष्ठ निर्णय भी अधूरा रह जाता है।
एक ही क्षमता गुण के अनुसार उत्थान या पतन का कारण बन सकती है।
भेद जानना सुधार की पहली शर्त है।
श्रद्धा से सुना ज्ञान आचरण में उतरता है।
अपनी बुद्धि और धृति का गुण पहचानना साधना की कसौटी है।
तमस से रजस और रजस से सत्त्व की ओर बढ़ना ही साधना की प्रगति है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'बुद्धि' और 'धृति' में क्या अन्तर है?
इन्हें गुणों के अनुसार क्यों बाँटा गया?
'धनञ्जय' सम्बोधन का क्या भाव है?
'अशेषेण' और 'पृथक्त्वेन' का क्या महत्त्व है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: