भगवद्गीता 13.1 — अर्जुन की जिज्ञासा: प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय
अर्जुन उवाच ।
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥ १३.१ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
अर्जुन बोले—हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय—इन सबको जानना चाहता हूँ।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| अर्जुन उवाच | अर्जुन ने कहा |
| प्रकृतिम् | प्रकृति को |
| पुरुषम् | पुरुष को |
| च एव | और |
| क्षेत्रम् | क्षेत्र को |
| क्षेत्रज्ञम् | क्षेत्रज्ञ को |
| एव च | तथा |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| एतत् | इन सबको |
| वेदितुम् | जानना |
| इच्छामि | चाहता हूँ |
| ज्ञानम् | ज्ञान को |
| ज्ञेयम् | ज्ञेय (जानने योग्य) को |
| च | और |
| केशव | हे केशव |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| अर्जुन उवाच | अर्जुन ने कहा | एतत् | इन सबको |
| प्रकृतिम् | प्रकृति को | वेदितुम् | जानना |
| पुरुषम् | पुरुष को | इच्छामि | चाहता हूँ |
| च एव | और | ज्ञानम् | ज्ञान को |
| क्षेत्रम् | क्षेत्र को | ज्ञेयम् | ज्ञेय (जानने योग्य) को |
| क्षेत्रज्ञम् | क्षेत्रज्ञ को | च | और |
| एव च | तथा | केशव | हे केशव |
विस्तृत विवरण
परिचय
बारहवें अध्याय में भक्ति और भक्तों के लक्षणों का वर्णन सुनने के बाद अर्जुन के मन में एक नई जिज्ञासा जागती है। इस श्लोक से तेरहवाँ अध्याय आरंभ होता है, जिसमें अर्जुन छह मूलभूत विषयों को जानने की इच्छा प्रकट करता है: प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय।
भावार्थ
एक सच्चे जिज्ञासु का प्रश्न
गीता की शिक्षा प्रायः अर्जुन के प्रश्नों से ही आगे बढ़ती है। इस अध्याय का आरंभ भी एक प्रश्न से होता है, और यह कोई साधारण प्रश्न नहीं, बल्कि जीवन के सबसे मूल रहस्यों को एक साथ पूछने वाला प्रश्न है। अर्जुन अब केवल युद्ध के कर्तव्य या भक्ति की विधि तक सीमित नहीं रहना चाहता; वह जानना चाहता है कि यह जगत और स्वयं वह क्या है।
प्रकृतिं पुरुषं चैव (प्रकृति और पुरुष): 'प्रकृति' वह जड़, परिवर्तनशील शक्ति है जिससे यह जगत, शरीर और मन बने हैं। 'पुरुष' वह चेतन तत्त्व है जो इन सबको जानता है। अर्जुन पूछ रहा है कि इस संसार का मूल निर्माण-तत्त्व क्या है और उसे जानने वाली चेतना क्या है।
क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च (क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ): 'क्षेत्र' का अर्थ खेत है, अर्थात यह शरीर और उससे जुड़ा समस्त अनुभव-जगत। 'क्षेत्रज्ञ' का अर्थ है उसे जानने वाला। पहले जोड़े में सृष्टि की दृष्टि से प्रश्न है, और इस दूसरे जोड़े में व्यक्ति की अपनी देह और चेतना की दृष्टि से। दोनों जोड़े वास्तव में एक ही गहरे सत्य के दो पहलू हैं, जिसका उत्तर आगे आता है।
एतद् वेदितुम् इच्छामि (इन्हें मैं जानना चाहता हूँ): यहाँ 'इच्छामि' शब्द विशेष है। यह केवल जिज्ञासा नहीं, जानने की सच्ची आकांक्षा है। अर्जुन अपनी अज्ञानता को स्वीकार करके विनम्रता से पूछ रहा है। यही वह मनोभाव है जिसके बिना कोई भी गहरा ज्ञान ग्रहण नहीं किया जा सकता।
ज्ञानं ज्ञेयं च (ज्ञान और ज्ञेय): अंत में अर्जुन दो और बातें पूछता है। 'ज्ञान' अर्थात वास्तविक ज्ञान क्या है, और 'ज्ञेय' अर्थात जानने योग्य परम तत्त्व क्या है। यह प्रश्न बहुत सटीक है। अर्जुन केवल जानकारी नहीं, यह जानना चाहता है कि सच्चा ज्ञान किसे कहते हैं और उसका अंतिम लक्ष्य क्या है।
केशव (हे केशव): अर्जुन भगवान को 'केशव' कहकर पुकारता है। यह संबोधन निकटता और श्रद्धा दोनों का भाव लिए है। अर्जुन जानता है कि इन प्रश्नों का उत्तर देने वाला उसका सखा ही सबका परम गुरु भी है।
इस प्रश्न की रूपरेखा
अर्जुन ने छह विषय एक साथ रख दिए, और भगवान आगे इनका उत्तर क्रमबद्ध ढंग से देते हैं। सबसे पहले वे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को समझाते हैं, फिर ज्ञान के स्वरूप और उसके साधनों का वर्णन करते हैं, इसके बाद ज्ञेय परमात्मा का स्वरूप खोलते हैं, और अंत में प्रकृति और पुरुष के संबंध तथा बंधन-मुक्ति का रहस्य समझाते हैं। इस प्रकार पूरा अध्याय इसी एक प्रश्न का विस्तृत उत्तर है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश (The Art of Asking)
सही प्रश्न पूछने का साहस: हम प्रायः जीवन को बिना पूछे जीते चले जाते हैं: मैं कौन हूँ, मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है। अर्जुन हमें याद दिलाता है कि गहरे प्रश्न पूछना कमज़ोरी नहीं, बल्कि विकास का पहला चरण है।
विनम्रता और जिज्ञासा का मेल: 'इच्छामि' का भाव सिखाता है कि सीखने के लिए पहले अपनी अज्ञानता को स्वीकार करना पड़ता है। जो स्वयं को पहले से जानकार मान लेता है, उसके भीतर नया ज्ञान आने के लिए जगह नहीं बचती।
प्रश्नों को स्पष्ट करना: जब भी मन उलझे, अपनी उलझन को सरल प्रश्नों में बाँट लीजिए, जैसे अर्जुन ने छह स्पष्ट बिंदु रखे। स्पष्ट प्रश्न ही स्पष्ट उत्तर की ओर ले जाता है।
एक सच्चे जिज्ञासु का प्रश्न
गीता की शिक्षा प्रायः अर्जुन के प्रश्नों से ही आगे बढ़ती है। इस अध्याय का आरंभ भी एक प्रश्न से होता है, और यह कोई साधारण प्रश्न नहीं, बल्कि जीवन के सबसे मूल रहस्यों को एक साथ पूछने वाला प्रश्न है। अर्जुन अब केवल युद्ध के कर्तव्य या भक्ति की विधि तक सीमित नहीं रहना चाहता; वह जानना चाहता है कि यह जगत और स्वयं वह क्या है।
प्रकृतिं पुरुषं चैव (प्रकृति और पुरुष): 'प्रकृति' वह जड़, परिवर्तनशील शक्ति है जिससे यह जगत, शरीर और मन बने हैं। 'पुरुष' वह चेतन तत्त्व है जो इन सबको जानता है। अर्जुन पूछ रहा है कि इस संसार का मूल निर्माण-तत्त्व क्या है और उसे जानने वाली चेतना क्या है।
क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च (क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ): 'क्षेत्र' का अर्थ खेत है, अर्थात यह शरीर और उससे जुड़ा समस्त अनुभव-जगत। 'क्षेत्रज्ञ' का अर्थ है उसे जानने वाला। पहले जोड़े में सृष्टि की दृष्टि से प्रश्न है, और इस दूसरे जोड़े में व्यक्ति की अपनी देह और चेतना की दृष्टि से। दोनों जोड़े वास्तव में एक ही गहरे सत्य के दो पहलू हैं, जिसका उत्तर आगे आता है।
एतद् वेदितुम् इच्छामि (इन्हें मैं जानना चाहता हूँ): यहाँ 'इच्छामि' शब्द विशेष है। यह केवल जिज्ञासा नहीं, जानने की सच्ची आकांक्षा है। अर्जुन अपनी अज्ञानता को स्वीकार करके विनम्रता से पूछ रहा है। यही वह मनोभाव है जिसके बिना कोई भी गहरा ज्ञान ग्रहण नहीं किया जा सकता।
ज्ञानं ज्ञेयं च (ज्ञान और ज्ञेय): अंत में अर्जुन दो और बातें पूछता है। 'ज्ञान' अर्थात वास्तविक ज्ञान क्या है, और 'ज्ञेय' अर्थात जानने योग्य परम तत्त्व क्या है। यह प्रश्न बहुत सटीक है। अर्जुन केवल जानकारी नहीं, यह जानना चाहता है कि सच्चा ज्ञान किसे कहते हैं और उसका अंतिम लक्ष्य क्या है।
केशव (हे केशव): अर्जुन भगवान को 'केशव' कहकर पुकारता है। यह संबोधन निकटता और श्रद्धा दोनों का भाव लिए है। अर्जुन जानता है कि इन प्रश्नों का उत्तर देने वाला उसका सखा ही सबका परम गुरु भी है।
इस प्रश्न की रूपरेखा
अर्जुन ने छह विषय एक साथ रख दिए, और भगवान आगे इनका उत्तर क्रमबद्ध ढंग से देते हैं। सबसे पहले वे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को समझाते हैं, फिर ज्ञान के स्वरूप और उसके साधनों का वर्णन करते हैं, इसके बाद ज्ञेय परमात्मा का स्वरूप खोलते हैं, और अंत में प्रकृति और पुरुष के संबंध तथा बंधन-मुक्ति का रहस्य समझाते हैं। इस प्रकार पूरा अध्याय इसी एक प्रश्न का विस्तृत उत्तर है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश (The Art of Asking)
सही प्रश्न पूछने का साहस: हम प्रायः जीवन को बिना पूछे जीते चले जाते हैं: मैं कौन हूँ, मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है। अर्जुन हमें याद दिलाता है कि गहरे प्रश्न पूछना कमज़ोरी नहीं, बल्कि विकास का पहला चरण है।
विनम्रता और जिज्ञासा का मेल: 'इच्छामि' का भाव सिखाता है कि सीखने के लिए पहले अपनी अज्ञानता को स्वीकार करना पड़ता है। जो स्वयं को पहले से जानकार मान लेता है, उसके भीतर नया ज्ञान आने के लिए जगह नहीं बचती।
प्रश्नों को स्पष्ट करना: जब भी मन उलझे, अपनी उलझन को सरल प्रश्नों में बाँट लीजिए, जैसे अर्जुन ने छह स्पष्ट बिंदु रखे। स्पष्ट प्रश्न ही स्पष्ट उत्तर की ओर ले जाता है।
आगे का विषय
अर्जुन की इस जिज्ञासा के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण सबसे पहले क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का परिचय देते हैं और बताते हैं कि यह शरीर ही 'क्षेत्र' कहलाता है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
ज्ञान की यात्रा सच्चे प्रश्न से आरम्भ होती है।
स्पष्ट प्रश्न उत्तर की आधी राह तय कर देता है।
जो बदलता है और जो जानता है, इन दोनों का भेद समझना मूल प्रश्न है।
शरीर रूपी क्षेत्र और उसे जानने वाले का विवेक जीवन की गहराई खोलता है।
क्या जानना है और कैसे जानना है, दोनों को समझना आवश्यक है।
जो स्वयं को अधूरा जानता है, वही सीखने को तैयार होता है।
गुरु के सामने ईमानदारी से प्रश्न रखना शिष्य की पहली साधना है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस श्लोक में अर्जुन कौन-से छह विषय पूछते हैं?
यह श्लोक सभी संस्करणों में क्यों नहीं मिलता?
'केशव' सम्बोधन का क्या भाव है?
भगवान् इन प्रश्नों का उत्तर कहाँ से आरम्भ करते हैं?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: