भगवद्गीता 14.18 — गुणों के अनुसार गति: ऊपर, मध्य और नीचे
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १४.१८ ॥
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सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य ऊपर के लोकों में जाते हैं, रजोगुण वाले मध्य में अर्थात् मनुष्यलोक में रहते हैं और निकृष्ट तमोगुण की वृत्ति में स्थित मनुष्य नीचे की गति को प्राप्त होते हैं।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| ऊर्ध्वम् | ऊपर की ओर |
| गच्छन्ति | जाते हैं |
| सत्त्वस्थाः | सत्त्वगुण में स्थित |
| मध्ये | बीच में |
| तिष्ठन्ति | रहते हैं |
| राजसाः | रजोगुण वाले |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| जघन्यगुणवृत्तिस्थाः | निकृष्ट गुण की वृत्ति में स्थित |
| अधः | नीचे |
| गच्छन्ति | जाते हैं |
| तामसाः | तमोगुण वाले |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| ऊर्ध्वम् | ऊपर की ओर | जघन्यगुणवृत्तिस्थाः | निकृष्ट गुण की वृत्ति में स्थित |
| गच्छन्ति | जाते हैं | अधः | नीचे |
| सत्त्वस्थाः | सत्त्वगुण में स्थित | गच्छन्ति | जाते हैं |
| मध्ये | बीच में | तामसाः | तमोगुण वाले |
| तिष्ठन्ति | रहते हैं | ||
| राजसाः | रजोगुण वाले | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर की ओर जाते हैं, रजोगुणी मध्य में रहते हैं, और निकृष्ट वृत्ति वाले तामसी जन नीचे की ओर गिरते हैं।
भावार्थ
तीन दिशाएँ: ऊर्ध्व, मध्य और अधो
श्लोक 14 और 15 में भगवान ने मृत्यु के समय की स्थिति के अनुसार गति बताई थी। यहाँ वे उसी बात को एक व्यापक और सरल चित्र में रखते हैं। जीवन की दिशा तीन प्रकार की हो सकती है: ऊपर, बीच में और नीचे।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थाः — सत्त्व में स्थित ऊपर जाते हैं: जो व्यक्ति सत्त्व में स्थित है, उसकी चेतना निरंतर उन्नत होती जाती है। उसके विचार, चरित्र और आकांक्षाएँ ऊँची होती जाती हैं। 'ऊपर' का संकेत केवल किसी दूर के लोक से नहीं, बल्कि चेतना की ऊँचाई से भी है। ऐसा व्यक्ति इस जीवन में ही अपने भीतर उठान अनुभव करता है।
मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः — रजोगुणी बीच में रहते हैं: रजस प्रधान व्यक्ति न बहुत ऊँचा उठ पाता है, न बहुत नीचे गिरता है। वह कर्म और भोग के बीच के लोक में घूमता रहता है। वह सक्रिय तो है, पर उसकी गति चक्राकार है, यानी दौड़ बहुत है, फिर भी स्थिति वही रहती है।
जघन्यगुणवृत्तिस्थाः अधो गच्छन्ति तामसाः — निकृष्ट वृत्ति में स्थित तामसी नीचे जाते हैं: भगवान तमोगुण को 'जघन्य' अर्थात सबसे निचला गुण कहते हैं। इसकी वृत्ति में, यानी प्रमाद, आलस्य और मोह में, रहने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी चेतना को गिराता जाता है। वह कब नीचे खिसक रहा है, यह उसे पता भी नहीं चलता।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
इस श्लोक की भाषा केवल मृत्यु के बाद की गति तक सीमित नहीं है। हम इसी जीवन में देख सकते हैं कि कुछ लोग निरंतर उन्नत होते जाते हैं, कुछ एक ही स्तर पर संघर्ष करते रहते हैं और कुछ धीरे-धीरे गिरते जाते हैं। उनके पीछे उनकी प्रवृत्तियों का ही बड़ा हाथ होता है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
दिशा का निरीक्षण: स्वयं से पूछें कि पिछले एक वर्ष में मैं किस दिशा में गया हूँ। क्या मेरी समझ, धैर्य और करुणा बढ़े हैं, या केवल व्यस्तता बढ़ी है, या कहीं मैं ढीला पड़ता जा रहा हूँ।
ऊँचाई का अर्थ: ऊपर उठने का अर्थ दूसरों से श्रेष्ठ बनना नहीं, बल्कि कल के अपने से अधिक निर्मल और स्पष्ट बनना है। यह तुलना दूसरों से नहीं, स्वयं से करनी है।
तीन दिशाएँ: ऊर्ध्व, मध्य और अधो
श्लोक 14 और 15 में भगवान ने मृत्यु के समय की स्थिति के अनुसार गति बताई थी। यहाँ वे उसी बात को एक व्यापक और सरल चित्र में रखते हैं। जीवन की दिशा तीन प्रकार की हो सकती है: ऊपर, बीच में और नीचे।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थाः — सत्त्व में स्थित ऊपर जाते हैं: जो व्यक्ति सत्त्व में स्थित है, उसकी चेतना निरंतर उन्नत होती जाती है। उसके विचार, चरित्र और आकांक्षाएँ ऊँची होती जाती हैं। 'ऊपर' का संकेत केवल किसी दूर के लोक से नहीं, बल्कि चेतना की ऊँचाई से भी है। ऐसा व्यक्ति इस जीवन में ही अपने भीतर उठान अनुभव करता है।
मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः — रजोगुणी बीच में रहते हैं: रजस प्रधान व्यक्ति न बहुत ऊँचा उठ पाता है, न बहुत नीचे गिरता है। वह कर्म और भोग के बीच के लोक में घूमता रहता है। वह सक्रिय तो है, पर उसकी गति चक्राकार है, यानी दौड़ बहुत है, फिर भी स्थिति वही रहती है।
जघन्यगुणवृत्तिस्थाः अधो गच्छन्ति तामसाः — निकृष्ट वृत्ति में स्थित तामसी नीचे जाते हैं: भगवान तमोगुण को 'जघन्य' अर्थात सबसे निचला गुण कहते हैं। इसकी वृत्ति में, यानी प्रमाद, आलस्य और मोह में, रहने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी चेतना को गिराता जाता है। वह कब नीचे खिसक रहा है, यह उसे पता भी नहीं चलता।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
इस श्लोक की भाषा केवल मृत्यु के बाद की गति तक सीमित नहीं है। हम इसी जीवन में देख सकते हैं कि कुछ लोग निरंतर उन्नत होते जाते हैं, कुछ एक ही स्तर पर संघर्ष करते रहते हैं और कुछ धीरे-धीरे गिरते जाते हैं। उनके पीछे उनकी प्रवृत्तियों का ही बड़ा हाथ होता है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
दिशा का निरीक्षण: स्वयं से पूछें कि पिछले एक वर्ष में मैं किस दिशा में गया हूँ। क्या मेरी समझ, धैर्य और करुणा बढ़े हैं, या केवल व्यस्तता बढ़ी है, या कहीं मैं ढीला पड़ता जा रहा हूँ।
ऊँचाई का अर्थ: ऊपर उठने का अर्थ दूसरों से श्रेष्ठ बनना नहीं, बल्कि कल के अपने से अधिक निर्मल और स्पष्ट बनना है। यह तुलना दूसरों से नहीं, स्वयं से करनी है।
आगे का विषय
तीनों गुणों की गति स्पष्ट हो गई। अब भगवान उस महत्त्वपूर्ण बिंदु की ओर बढ़ते हैं जहाँ साधक इन तीनों के पार जा सकता है, और वह पार जाने की कुंजी है सही दृष्टि।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
सत्त्व मनुष्य को भीतर से ऊँचा उठाता है।
रजस् मनुष्य को संसार की दौड़ में स्थिर रखता है, ऊपर नहीं उठाता।
तमस् धीरे-धीरे चेतना को नीचे गिराता है।
बाहरी स्थान से पहले चेतना का स्तर बदलता है।
हर दिन के छोटे चयन हमारी दिशा तय करते हैं।
उत्थान दूसरों को हराने से नहीं, स्वयं को शुद्ध करने से होता है।
सात्त्विक जीवन स्थायी उन्नति का आधार है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'सत्त्वस्थाः' का क्या अर्थ है?
'मध्ये तिष्ठन्ति' का क्या तात्पर्य है?
'जघन्यगुण' किसे कहा गया है?
क्या यह श्लोक केवल मृत्यु के बाद की गति के लिए है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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