जीवन का उद्देश्य खोने पर दिन चलते रहते हैं, पर उनमें दिशा नहीं रहती। काम होता है, पर उसका अर्थ नहीं दिखता; सफलता मिलती है, फिर भी भीतर खालीपन रहता है। यह अनुभव नौकरी बदलने, किसी बड़े लक्ष्य के पूरे होने, किसी अपने को खोने या लंबी थकान के बाद अक्सर आता है, और व्यक्ति पूछने लगता है कि आख़िर यह सब किसलिए है।
गीता 18.45 कहती है कि जो मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्म में निष्ठा से लगा रहता है, वह सिद्धि पाता है। गीता 9.25 बताती है कि हम जिस आदर्श की उपासना करते हैं, जीवन उसी दिशा में ढल जाता है। गीता 11.18 और 11.38 जीवन के परम आश्रय और लक्ष्य के रूप में शाश्वत सत्य को पहचानने की बात करती हैं, और गीता 15.4 कहती है कि केवल संसार से हटना काफ़ी नहीं, जीवन को किसी परम लक्ष्य की ओर मोड़ना चाहिए।
गीता 18.78 का निष्कर्ष है कि जहाँ ईश्वरीय मार्गदर्शन और मनुष्य का पुरुषार्थ दोनों मिलते हैं, वहीं विजय और स्थिर नीति रहती है। इसलिए अपना कर्तव्य निष्ठा से करें, अपनी प्राथमिकताओं और संगति पर ध्यान दें, और जीवन का आधार किसी नश्वर वस्तु के बजाय स्थायी मूल्यों पर रखें। अर्थ अक्सर एक झटके में नहीं, धीरे-धीरे अभ्यास से लौटता है।