त्रिगुण पर भगवद्गीता

32 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

त्रिगुण पर भगवद्गीता के श्लोक 32 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

त्रिगुण का अर्थ है सत्त्व, रज और तम, यानी प्रकृति के तीन गुण जो हमारे विचार, स्वभाव, आहार, काम और मूड को आकार देते हैं। कभी मन शांत और स्पष्ट होता है, कभी बेचैन और महत्वाकांक्षी, और कभी सुस्त और भ्रमित। इन तीनों को पहचान लेने पर हम अपनी अवस्थाओं के गुलाम होने के बजाय उन्हें समझकर संतुलित करना सीख सकते हैं।

गीता 18.40 कहती है कि पृथ्वी हो या देवलोक, कोई प्राणी इन तीन गुणों के प्रभाव से बाहर नहीं है, और गीता 3.27 के अनुसार कर्म गुणों से होते हैं, पर अहंकार से मनुष्य स्वयं को कर्ता मान बैठता है। गीता 14.5 बताती है कि तीनों गुण अविनाशी आत्मा को शरीर और उसके अनुभवों से बाँध देते हैं, और गीता 3.5 के अनुसार गुणों के प्रभाव से कोई क्षणभर कर्म के बिना नहीं रह सकता।

गीता 7.12 में सत्त्व, रज और तम के भाव भगवान् की शक्ति से प्रकट होते हैं, पर वे गुणों के अधीन नहीं, गुणों के स्वामी हैं, इसलिए अपने सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भावों को साक्षी भाव से संतुलित करें। गीता 7.13 कहती है कि गुणों से मोहित जगत गुणातीत परमात्मा को नहीं पहचानता, और गीता 14.21 में अर्जुन गुणातीत की पहचान, आचरण और उपाय के बारे में स्पष्ट प्रश्न पूछते हैं। गीता 2.45 गुणों से ऊपर उठकर आत्मवान बनने को कहती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार सत्त्व, रज और तम क्या हैं?
गीता 18.40 के अनुसार सत्त्व, रज और तम प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं, और वे हमारे स्वभाव, विचार तथा कर्म को प्रभावित करते हैं। इन्हें सजगता से पहचानना और सत्त्वगुण की ओर बढ़ने का निरंतर प्रयास करना ही गीता की व्यावहारिक सीख है।
गीता 18.40 में कोई प्राणी गुणों से बाहर क्यों नहीं बताया गया?
गीता 18.40 कहती है कि प्रकृति से उत्पन्न सत्त्व, रज और तम सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं, इसलिए पृथ्वी हो या देवलोक, कोई भी प्राणी इनके प्रभाव से बाहर नहीं है। इसका संदेश है कि गुणों का प्रभाव स्वाभाविक है, और सजगता ही उनसे ऊपर उठने की शुरुआत है।
गीता 7.12 में भगवान् को गुणों का स्वामी क्यों कहा गया है?
गीता 7.12 के अनुसार तीनों गुणों वाले भाव भगवान् की शक्ति से प्रकट होते हैं, पर भगवान् उनसे बँधे या उनके अधीन नहीं हैं; वे गुणों के स्वामी हैं। इसकी सीख है कि अपने मन के सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भावों को पहचानें और उनके प्रभाव में बहने के बजाय साक्षी भाव से उन्हें संतुलित करें।
गीता 7.13 में गुणों का मोह भगवान् को जानने में बाधा कैसे है?
गीता 7.13 कहती है कि गुणों के प्रभाव में मोहित मनुष्य उनसे परे स्थित अविनाशी परमात्मा को पहचान नहीं पाता। सुख-दुःख और राग-द्वेष की लहरों में बहते रहने के बजाय रुककर उनसे परे स्थित अपने गहरे लक्ष्य पर ध्यान दें। गुणों का मोह ही भगवान् को जानने में सबसे बड़ी बाधा है।
गीता 14.21 में अर्जुन के प्रश्न से हम क्या सीखते हैं?
गीता 14.21 में अर्जुन गुणातीत की पहचान, उसके आचरण और गुणों को पार करने के उपाय के विषय में तीन स्पष्ट प्रश्न पूछते हैं। इसकी सीख है कि किसी भी साधना में आदर्श का स्वरूप, उसका व्यवहार और उस तक पहुँचने का मार्ग समझने के लिए स्पष्ट प्रश्न पूछना चाहिए, क्योंकि सही प्रश्न अगले उपदेश का द्वार खोलता है।

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