भगवद्गीता 18.24 — राजस कर्म: कामना, अहंकार और बहुत परिश्रम से युक्त
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ १८.२४ ॥
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जो कर्म भोग की कामना वाले व्यक्ति द्वारा, अहंकार के साथ और बहुत परिश्रम से किया जाता है, वह राजस कर्म कहा गया है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| यत् | जो |
| तु | तो |
| कामेप्सुना | भोग या फल की कामना वाले द्वारा |
| कर्म | कर्म |
| साहङ्कारेण | अहंकार-सहित |
| वा पुनः | अथवा फिर |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| क्रियते | किया जाता है |
| बहुलायासम् | बहुत परिश्रम वाला |
| तत् | वह |
| राजसम् | राजस |
| उदाहृतम् | कहा गया है |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| यत् | जो | क्रियते | किया जाता है |
| तु | तो | बहुलायासम् | बहुत परिश्रम वाला |
| कामेप्सुना | भोग या फल की कामना वाले द्वारा | तत् | वह |
| कर्म | कर्म | राजसम् | राजस |
| साहङ्कारेण | अहंकार-सहित | उदाहृतम् | कहा गया है |
| वा पुनः | अथवा फिर | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में श्रीकृष्ण राजस कर्म की परिभाषा देते हैं, जो भोग की कामना से, अहंकारपूर्वक और अत्यधिक श्रम के साथ किया जाता है।
भावार्थ
राजस कर्म के तीन लक्षण
श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह कर्म राजस है जो कामना की पूर्ति के लिए, अहंकार के साथ और अत्यंत परिश्रम से किया जाए। पिछले श्लोक में सात्त्विक कर्म की चार विशेषताएँ थीं। यहाँ उनके ठीक विपरीत तीन लक्षण हैं।
कामेप्सुना (By one seeking desires): राजस कर्म की प्रेरणा भोग की इच्छा है। कर्ता कुछ पाने के लिए कर्म करता है, चाहे वह धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो या सुख। कर्म साधन है और कामना साध्य। जब तक वह वस्तु नहीं मिलती, उसका मन बेचैन रहता है।
साहंकारेण वा पुनः (With ego): कर्म के साथ अहंकार जुड़ा रहता है। मैंने किया, मैं श्रेष्ठ हूँ, मेरे कारण हुआ, ये भाव निरंतर बने रहते हैं। यह अहंकार सफलता में दंभ और असफलता में पीड़ा का कारण बनता है।
बहुलायासम् (Full of great strain): ऐसा कर्म अत्यधिक परिश्रम और तनाव के साथ होता है। चूँकि कर्ता परिणाम को अपनी मुट्ठी में रखना चाहता है, इसलिए वह निरंतर चिंता, भाग-दौड़ और दबाव में रहता है। उसका परिश्रम केवल शारीरिक नहीं, मानसिक भी होता है।
राजस कर्म का विरोधाभास
राजस कर्म बाहर से बहुत सक्रिय और प्रभावशाली दिखता है, पर भीतर से थकान देता है। ऐसा व्यक्ति अक्सर बहुत कुछ हासिल कर लेता है, पर शांति नहीं पाता। एक लक्ष्य पूरा होते ही अगला लक्ष्य खड़ा हो जाता है और यह दौड़ कभी रुकती नहीं। इसी कारण राजस कर्म का फल गीता में दुःख बताया गया है, जैसा कि आगे के श्लोकों में स्पष्ट होगा।
सात्त्विक और राजस कर्म की तुलना
सात्त्विक कर्म में कर्म ही पूजा है, जबकि राजस कर्म में कर्म केवल साधन है। सात्त्विक में अहंकार का विलय होता है, जबकि राजस में अहंकार का विस्तार। सात्त्विक कर्म हल्का और शांत होता है, जबकि राजस कर्म भारी और तनावपूर्ण। यहाँ यह भी स्मरण रखना चाहिए कि राजस कर्म गलत नहीं है, क्योंकि समाज में अधिकांश गतिविधि इसी से चलती है। परंतु वह मुक्तिदायक नहीं है, और उसमें बंधन तथा थकान की संभावना बनी रहती है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
आज की प्रतिस्पर्धी जीवनशैली में हम सब राजस कर्म की ओर खिंचते हैं। हम पद, पैसे और प्रतिष्ठा की दौड़ में थककर भी रुकते नहीं। इस श्लोक को पढ़कर हम अपने कर्मों का आकलन कर सकते हैं कि हम किसलिए काम कर रहे हैं, किस भाव के साथ, और कितने तनाव में। धीरे-धीरे अपने कर्मों में सेवा और कर्तव्य-भाव का अंश बढ़ाना हमें राजस से सात्त्विक की ओर ले जा सकता है।
राजस कर्म के तीन लक्षण
श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह कर्म राजस है जो कामना की पूर्ति के लिए, अहंकार के साथ और अत्यंत परिश्रम से किया जाए। पिछले श्लोक में सात्त्विक कर्म की चार विशेषताएँ थीं। यहाँ उनके ठीक विपरीत तीन लक्षण हैं।
कामेप्सुना (By one seeking desires): राजस कर्म की प्रेरणा भोग की इच्छा है। कर्ता कुछ पाने के लिए कर्म करता है, चाहे वह धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो या सुख। कर्म साधन है और कामना साध्य। जब तक वह वस्तु नहीं मिलती, उसका मन बेचैन रहता है।
साहंकारेण वा पुनः (With ego): कर्म के साथ अहंकार जुड़ा रहता है। मैंने किया, मैं श्रेष्ठ हूँ, मेरे कारण हुआ, ये भाव निरंतर बने रहते हैं। यह अहंकार सफलता में दंभ और असफलता में पीड़ा का कारण बनता है।
बहुलायासम् (Full of great strain): ऐसा कर्म अत्यधिक परिश्रम और तनाव के साथ होता है। चूँकि कर्ता परिणाम को अपनी मुट्ठी में रखना चाहता है, इसलिए वह निरंतर चिंता, भाग-दौड़ और दबाव में रहता है। उसका परिश्रम केवल शारीरिक नहीं, मानसिक भी होता है।
राजस कर्म का विरोधाभास
राजस कर्म बाहर से बहुत सक्रिय और प्रभावशाली दिखता है, पर भीतर से थकान देता है। ऐसा व्यक्ति अक्सर बहुत कुछ हासिल कर लेता है, पर शांति नहीं पाता। एक लक्ष्य पूरा होते ही अगला लक्ष्य खड़ा हो जाता है और यह दौड़ कभी रुकती नहीं। इसी कारण राजस कर्म का फल गीता में दुःख बताया गया है, जैसा कि आगे के श्लोकों में स्पष्ट होगा।
सात्त्विक और राजस कर्म की तुलना
सात्त्विक कर्म में कर्म ही पूजा है, जबकि राजस कर्म में कर्म केवल साधन है। सात्त्विक में अहंकार का विलय होता है, जबकि राजस में अहंकार का विस्तार। सात्त्विक कर्म हल्का और शांत होता है, जबकि राजस कर्म भारी और तनावपूर्ण। यहाँ यह भी स्मरण रखना चाहिए कि राजस कर्म गलत नहीं है, क्योंकि समाज में अधिकांश गतिविधि इसी से चलती है। परंतु वह मुक्तिदायक नहीं है, और उसमें बंधन तथा थकान की संभावना बनी रहती है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
आज की प्रतिस्पर्धी जीवनशैली में हम सब राजस कर्म की ओर खिंचते हैं। हम पद, पैसे और प्रतिष्ठा की दौड़ में थककर भी रुकते नहीं। इस श्लोक को पढ़कर हम अपने कर्मों का आकलन कर सकते हैं कि हम किसलिए काम कर रहे हैं, किस भाव के साथ, और कितने तनाव में। धीरे-धीरे अपने कर्मों में सेवा और कर्तव्य-भाव का अंश बढ़ाना हमें राजस से सात्त्विक की ओर ले जा सकता है।
आगे का विषय
राजस कर्म का स्वरूप स्पष्ट हुआ। अब श्रीकृष्ण कर्म के तीसरे भेद को बताते हैं, जो मोह और अज्ञान से उपजता है और जिसमें परिणाम तथा सामर्थ्य का कोई विचार नहीं किया जाता।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
कामना से प्रेरित कर्म परिश्रम बढ़ाता है, शान्ति नहीं देता।
'मैं करता हूँ' का अभिमान कर्म को बोझ बनाता है।
अत्यधिक परिश्रम तब थकाता है जब उसके पीछे अपेक्षा और होड़ हो।
राजस कर्म सफल दिख सकता है, पर भीतर बेचैनी छोड़ जाता है।
वही कर्म सात्त्विक बन सकता है यदि उसके पीछे का भाव बदल जाए।
सन्तोष के बिना उपलब्धि भी अशान्ति बन जाती है।
कर्म की मात्रा से अधिक उसके भाव को परखना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राजस कर्म किसे कहते हैं?
'कामेप्सुना' का क्या अर्थ है?
'बहुलायासम्' का क्या भाव है?
क्या परिश्रम करना राजस है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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