लगातार काम करते रहने से शरीर ही नहीं, मन भी चुपचाप थकता है। शुरुआत में उत्साह होता है, फिर काम का बोझ, अपेक्षाएँ और कभी न रुकने वाली दौड़ ऊर्जा सोख लेती हैं। तब काम से लगाव घटता है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है और व्यक्ति स्वयं को खाली महसूस करता है। इसे रोकने के लिए केवल आराम नहीं, काम के पीछे की प्रेरणा को समझना भी ज़रूरी है।
गीता 18.24 कहती है कि भोगों की कामना, अहंकार और बहुत परिश्रम से किया गया कर्म राजस है, जिसमें कर्म का बल कर्तव्य नहीं, इच्छाएँ और कर्तापन का अभिमान होता है। गीता 14.7 के अनुसार रजोगुण तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होकर जीव को कर्म और फल की आसक्ति में बाँधता है, और गीता 14.12 लोभ, कर्मों का आरंभ, अशांति और विषयों की लालसा को उसकी वृद्धि के लक्षण बताती है।
समाधान गीता 18.6 में है: कर्म छोड़ना नहीं है, बल्कि उनमें आसक्ति और फल की इच्छा छोड़नी है, और परिणाम, श्रेय या मान्यता की पकड़ ढीली रखनी है। जब मन में अधिक पाने की होड़, बेचैनी और लालच बढ़े, तब रुककर संतोष और संयम का अभ्यास करें, और अपने परिश्रम के पीछे की प्रेरणा को ईमानदारी से परखें।