आसक्ति पर भगवद्गीता

78 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

"आसक्ति" में सहायक भगवद्गीता के श्लोक 78 श्लोक, अर्थ, मूल शिक्षा और व्यावहारिक उपयोग सहित।

आसक्ति का अर्थ है किसी व्यक्ति, वस्तु, पद या परिणाम से इतना जुड़ जाना कि उसके बिना मन अस्थिर होने लगे। थोड़ा लगाव जीवन में रंग भरता है, पर जब सुख-दुख पूरी तरह उसी पर टिक जाएँ, तब हम डर, जलन और निराशा के शिकार होने लगते हैं और अपनी स्वतंत्रता खो बैठते हैं।

गीता 2.62 आसक्ति की जड़ बताती है: विषयों का चिंतन आसक्ति को जन्म देता है, आसक्ति कामना को और अपूर्ण कामना क्रोध को। इसलिए शुरुआती चिंतन पर ही सजग रहना ज़रूरी है। गीता 5.3 के अनुसार सच्चा संन्यासी वह है जो द्वेष और कामना से मुक्त है, केवल कर्म छोड़ने वाला नहीं। गीता 6.4 में योगारूढ़ वही है जो विषयों और कर्मों में आसक्ति छोड़ देता है।

गीता त्याग नहीं, संतुलन सिखाती है। गीता 2.64 में राग-द्वेष से मुक्त रहकर विषयों का सेवन करने वाला प्रसन्नता पाता है। गीता 4.23 के अनुसार ईश्वरार्पण भाव से किया गया कर्म बंधन नहीं बनता। काम सेवा-भाव से करें, परिणाम पर पकड़ ढीली रखें और सुख को केवल बाहरी उपलब्धियों में न खोजें, क्योंकि गीता 5.21 भीतर के अक्षय सुख की ओर संकेत करती है।

इन श्लोकों से शुरू करें

सभी 78 श्लोक

6.4

ध्यानयोग

योगारूढ़ की पहचान

आसक्ति और संकल्पों का त्याग ही योगारूढ़ होने की पहचान है।

गीता में कहाँ

संबंधित विषय

जीवन-क्षेत्र

गुण

आधुनिक संदर्भ

विषय

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार आसक्ति को कैसे छोड़ें?
शुरुआत में ही सजग होकर और कर्म को समर्पण भाव से करके। गीता 2.62 बताती है कि बार-बार किया गया विषय-चिंतन आसक्ति बनाता है, इसलिए उसे आरंभ में रोकना सरल है। साथ ही गीता 4.23 की तरह कार्य को सेवा और ऊँचे उद्देश्य से जोड़ने पर आसक्ति स्वतः कम होने लगती है।
गीता 2.62 में आसक्ति से क्रोध तक का क्रम क्या है?
गीता 2.62 के अनुसार पहले विषयों का चिंतन होता है, उससे आसक्ति पैदा होती है, आसक्ति से कामना उठती है और कामना पूरी न हो तो क्रोध जन्म लेता है। यह क्रम बताता है कि क्रोध जैसी समस्या को समझने के लिए उसके पीछे के लगाव और चिंतन को देखना पड़ता है।
क्या अनासक्त होने का मतलब रिश्ते और कर्तव्य छोड़ देना है?
नहीं। गीता 5.3 में सच्चा संन्यास बाहरी कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि द्वेष और कामना से मुक्त होना है। गीता 2.64 भी कहती है कि राग-द्वेष से मुक्त रहकर संसार के विषयों का सेवन किया जा सकता है। अनासक्ति का अर्थ है जुड़े रहकर भी मन की स्वतंत्रता बनाए रखना।
गीता 4.23 के अनुसार कर्म बंधन कब नहीं बनता?
गीता 4.23 के अनुसार जिसकी आसक्ति समाप्त हो गई है और जो ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करता है, उसके कर्म बंधन का कारण नहीं बनते, बल्कि विलीन हो जाते हैं। इसलिए दैनिक कार्यों को केवल स्वार्थ के लिए नहीं, सेवा और उच्च उद्देश्य की भावना से करने का अभ्यास उपयोगी है।
गीता 11.55 में भक्त की पहचान क्या बताई गई है?
गीता 11.55 के अनुसार वही भक्त भगवान को प्राप्त करता है जो उनके लिए कर्म करता है, उन्हें परम लक्ष्य मानता है, आसक्ति छोड़ देता है और किसी प्राणी से वैर नहीं रखता। यानी सेवा-भाव से काम, परिणाम की पकड़ से मुक्ति और सबके प्रति मैत्री इसकी पहचान हैं।

एक्सप्लोरर में फ़िल्टर करें

भगवद्गीता खोजें

← चुनौतियाँ