भगवद्गीता 9.7 — कल्प के अन्त में प्रकृति में लय और आरम्भ में पुनः सृष्टि
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ९.७ ॥
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हे कुन्तीपुत्र! कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं, और कल्प के आरम्भ में उन्हें मैं फिर रचता हूँ।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सर्वभूतानि | सब प्राणी |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र |
| प्रकृतिम् | प्रकृति में |
| यान्ति | लीन होते हैं |
| मामिकाम् | मेरी |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| कल्पक्षये | कल्प के अन्त में |
| पुनः | फिर |
| तानि | उन्हें |
| कल्पादौ | कल्प के आरम्भ में |
| विसृजामि | रचता हूँ |
| अहम् | मैं |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सर्वभूतानि | सब प्राणी | कल्पक्षये | कल्प के अन्त में |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र | पुनः | फिर |
| प्रकृतिम् | प्रकृति में | तानि | उन्हें |
| यान्ति | लीन होते हैं | कल्पादौ | कल्प के आरम्भ में |
| मामिकाम् | मेरी | विसृजामि | रचता हूँ |
| अहम् | मैं | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
आकाश और वायु की उपमा के बाद भगवान सृष्टि और प्रलय के चक्र का वर्णन करते हैं। यह वर्णन आठवें अध्याय के ब्रह्मा के दिन-रात की चर्चा से जुड़ता है, पर यहाँ भगवान की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आती है।
भावार्थ
श्लोक का भाव: कल्प के अंत और आरंभ का चक्र
भगवान कहते हैं कि हे कौन्तेय! कल्प के अंत में सब प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं, अर्थात उसमें लीन हो जाते हैं, और कल्प के आरंभ में मैं उन्हें फिर रचता हूँ। यह श्लोक सृष्टि-चक्र में भगवान की भूमिका को स्पष्ट करता है।
मुख्य शब्दों का मर्म
सर्वभूतानि प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् — सब प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं: 'मामिका' शब्द का अर्थ है मेरी अपनी। भगवान प्रकृति को अपनी शक्ति बताते हैं। प्रलय के समय सब प्राणी अपने-अपने सूक्ष्म संस्कारों के साथ उसी शक्ति में लीन हो जाते हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में समा जाती हैं।
कल्पक्षये — कल्प के अंत में: कल्प ब्रह्मा के एक दिन की अवधि है, जिसका वर्णन आठवें अध्याय में हुआ था। जब यह दिन समाप्त होता है, तब सृष्टि का विलय होता है। यह विलय विनाश नहीं, बल्कि विश्राम की अवस्था है।
कल्पादौ विसृजाम्यहम् — कल्प के आरंभ में मैं रचता हूँ: जब नया कल्प आरंभ होता है, तब भगवान अपनी प्रकृति के द्वारा फिर से सृष्टि का विस्तार करते हैं। यहाँ 'अहम्' शब्द पर बल है, जो बताता है कि इस रचना का आधार और प्रेरक स्वयं भगवान हैं।
पुनस्तानि — वही फिर: यह शब्द इंगित करता है कि वही प्राणी, अपने पूर्व संस्कारों के साथ, नए चक्र में पुनः प्रकट होते हैं। कोई नया समूह नहीं आता। यह कर्म और उसके फल की निरंतरता की ओर संकेत है।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
सृष्टि कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं: यहाँ सृष्टि को किसी अंधे प्राकृतिक नियम का परिणाम नहीं, बल्कि भगवान की इच्छा और अधिष्ठान का फल बताया गया है। यह दृष्टि जीवन को अर्थ और उद्देश्य देती है कि हम किसी बड़े विधान का हिस्सा हैं।
विलय में भी निरंतरता: प्रलय में सब कुछ लीन होता है पर नष्ट नहीं होता। इसका अर्थ है कि अस्तित्व की धारा कभी पूरी तरह नहीं टूटती। हम जिसे अंत समझते हैं, वह वास्तव में अगले चरण की तैयारी है।
प्रलय में संस्कारों की निरंतरता
भारतीय दर्शन में माना गया है कि प्रलय के समय भी जीवों के कर्म और संस्कार नष्ट नहीं होते, वे सूक्ष्म रूप में प्रकृति में संचित रहते हैं। जब नई सृष्टि का आरंभ होता है, तब वही संस्कार उचित रूप में प्रकट होते हैं। इसीलिए गीता कर्म की शुद्धि पर इतना बल देती है, क्योंकि हमारे आज के कर्म किसी न किसी रूप में आगे साथ चलते हैं।
'मामिका' शब्द की आत्मीयता: प्रकृति को 'मेरी अपनी' कहकर भगवान संसार और परमात्मा के बीच एक आत्मीय संबंध बताते हैं। यह प्रकृति कोई पराई या विरोधी शक्ति नहीं, बल्कि भगवान की अपनी शक्ति है। इसलिए संसार से द्वेष करने की आवश्यकता नहीं, केवल उसमें आसक्ति से मुक्त रहना है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
अंत को भी चक्र का भाग मानना: जीवन में जब कोई चरण समाप्त हो, चाहे पढ़ाई हो, नौकरी हो या कोई संबंध, तब यह स्मरण रखें कि हर अंत नए आरंभ की भूमि है। यह दृष्टि हमें हानि के समय संभलने में मदद करती है।
संस्कारों की जिम्मेदारी: यदि हमारे संस्कार आगे साथ जाते हैं, तो आज के विचार और कर्म महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए अपने स्वभाव को शुद्ध और सुंदर बनाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
श्लोक का भाव: कल्प के अंत और आरंभ का चक्र
भगवान कहते हैं कि हे कौन्तेय! कल्प के अंत में सब प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं, अर्थात उसमें लीन हो जाते हैं, और कल्प के आरंभ में मैं उन्हें फिर रचता हूँ। यह श्लोक सृष्टि-चक्र में भगवान की भूमिका को स्पष्ट करता है।
मुख्य शब्दों का मर्म
सर्वभूतानि प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् — सब प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं: 'मामिका' शब्द का अर्थ है मेरी अपनी। भगवान प्रकृति को अपनी शक्ति बताते हैं। प्रलय के समय सब प्राणी अपने-अपने सूक्ष्म संस्कारों के साथ उसी शक्ति में लीन हो जाते हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में समा जाती हैं।
कल्पक्षये — कल्प के अंत में: कल्प ब्रह्मा के एक दिन की अवधि है, जिसका वर्णन आठवें अध्याय में हुआ था। जब यह दिन समाप्त होता है, तब सृष्टि का विलय होता है। यह विलय विनाश नहीं, बल्कि विश्राम की अवस्था है।
कल्पादौ विसृजाम्यहम् — कल्प के आरंभ में मैं रचता हूँ: जब नया कल्प आरंभ होता है, तब भगवान अपनी प्रकृति के द्वारा फिर से सृष्टि का विस्तार करते हैं। यहाँ 'अहम्' शब्द पर बल है, जो बताता है कि इस रचना का आधार और प्रेरक स्वयं भगवान हैं।
पुनस्तानि — वही फिर: यह शब्द इंगित करता है कि वही प्राणी, अपने पूर्व संस्कारों के साथ, नए चक्र में पुनः प्रकट होते हैं। कोई नया समूह नहीं आता। यह कर्म और उसके फल की निरंतरता की ओर संकेत है।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
सृष्टि कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं: यहाँ सृष्टि को किसी अंधे प्राकृतिक नियम का परिणाम नहीं, बल्कि भगवान की इच्छा और अधिष्ठान का फल बताया गया है। यह दृष्टि जीवन को अर्थ और उद्देश्य देती है कि हम किसी बड़े विधान का हिस्सा हैं।
विलय में भी निरंतरता: प्रलय में सब कुछ लीन होता है पर नष्ट नहीं होता। इसका अर्थ है कि अस्तित्व की धारा कभी पूरी तरह नहीं टूटती। हम जिसे अंत समझते हैं, वह वास्तव में अगले चरण की तैयारी है।
प्रलय में संस्कारों की निरंतरता
भारतीय दर्शन में माना गया है कि प्रलय के समय भी जीवों के कर्म और संस्कार नष्ट नहीं होते, वे सूक्ष्म रूप में प्रकृति में संचित रहते हैं। जब नई सृष्टि का आरंभ होता है, तब वही संस्कार उचित रूप में प्रकट होते हैं। इसीलिए गीता कर्म की शुद्धि पर इतना बल देती है, क्योंकि हमारे आज के कर्म किसी न किसी रूप में आगे साथ चलते हैं।
'मामिका' शब्द की आत्मीयता: प्रकृति को 'मेरी अपनी' कहकर भगवान संसार और परमात्मा के बीच एक आत्मीय संबंध बताते हैं। यह प्रकृति कोई पराई या विरोधी शक्ति नहीं, बल्कि भगवान की अपनी शक्ति है। इसलिए संसार से द्वेष करने की आवश्यकता नहीं, केवल उसमें आसक्ति से मुक्त रहना है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
अंत को भी चक्र का भाग मानना: जीवन में जब कोई चरण समाप्त हो, चाहे पढ़ाई हो, नौकरी हो या कोई संबंध, तब यह स्मरण रखें कि हर अंत नए आरंभ की भूमि है। यह दृष्टि हमें हानि के समय संभलने में मदद करती है।
संस्कारों की जिम्मेदारी: यदि हमारे संस्कार आगे साथ जाते हैं, तो आज के विचार और कर्म महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए अपने स्वभाव को शुद्ध और सुंदर बनाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
आगे का विषय
भगवान ने सृष्टि और प्रलय के चक्र में अपनी भूमिका बताई। अब वे बताते हैं कि इस रचना की प्रक्रिया कैसे चलती है और किस प्रकार वे अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर प्राणियों को बार-बार रचते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
सृष्टि का एक चक्र पूरा होने पर सब प्राणी अव्यक्त प्रकृति में लीन हो जाते हैं।
नए चक्र के आरम्भ में परमात्मा फिर सृजन करते हैं।
प्रकृति परमात्मा की ही शक्ति है, अलग सत्ता नहीं।
जो आता-जाता है, उस पर निर्भर रहना अस्थायी आश्रय है।
उत्पत्ति और लय एक ही सृष्टि-लीला के दो चरण हैं।
सृष्टि निरन्तर नवीन होने की क्षमता है, एक बार का कार्य नहीं।
चक्र के बीच जो अचल है, उस पर टिकना ही शान्ति है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'कल्पक्षय' और 'कल्पादि' क्या हैं?
'मामिकां प्रकृतिम्' का क्या अर्थ है?
यह श्लोक अध्याय आठ के कथन से कैसे जुड़ता है?
'विसृजामि' का क्या भाव है?
इस श्लोक का व्यावहारिक सन्देश एक वाक्य में क्या है?
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