भगवद्गीता 9.8 — अपनी प्रकृति को अधीन कर बार-बार प्राणि-समुदाय की रचना

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ९.८ ॥

मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके, प्रकृति (स्वभाव) के वश में विवश हुए इस सम्पूर्ण प्राणि-समुदाय को बार-बार रचता हूँ।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

प्रकृतिम् स्वाम् अवष्टभ्य
विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्रामम् इमम् कृत्स्नम्
अवशम् प्रकृतेः वशात् ॥

शब्दार्थ

पंक्ति 1
संस्कृत शब्द अर्थ
प्रकृतिम् प्रकृति को
स्वाम् अपनी
अवष्टभ्य अधीन करके, आश्रय बनाकर
विसृजामि रचता हूँ
पुनः पुनः बार-बार
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
भूतग्रामम् प्राणि-समुदाय को
इमम् इस
कृत्स्नम् सम्पूर्ण
अवशम् विवश
प्रकृतेः वशात् प्रकृति (स्वभाव) के वश से
पंक्ति 1 पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
प्रकृतिम् प्रकृति को भूतग्रामम् प्राणि-समुदाय को
स्वाम् अपनी इमम् इस
अवष्टभ्य अधीन करके, आश्रय बनाकर कृत्स्नम् सम्पूर्ण
विसृजामि रचता हूँ अवशम् विवश
पुनः पुनः बार-बार प्रकृतेः वशात् प्रकृति (स्वभाव) के वश से

विस्तृत विवरण

परिचय

पिछले श्लोक में सृष्टि और प्रलय का चक्र बताया गया था। अब भगवान उसी रचना-प्रक्रिया की विधि स्पष्ट करते हैं और बताते हैं कि प्राणी किस विवशता में बार-बार प्रकट होते हैं।

भावार्थ

श्लोक का भाव: प्रकृति के आश्रय से बार-बार रचना

भगवान कहते हैं कि मैं अपनी प्रकृति का अवलंबन लेकर, प्रकृति के वश में होने के कारण परवश इस संपूर्ण प्राणिसमूह को बार-बार रचता हूँ। इस श्लोक में सृष्टि के दो पक्षों का वर्णन है: भगवान का स्वतंत्र आश्रय-रूप, और प्राणियों की प्रकृति-जनित परवशता।

मुख्य शब्दों का मर्म

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य — अपनी प्रकृति का अवलंबन लेकर: 'अवष्टभ्य' का अर्थ है आश्रय लेना, दृढ़ता से सहारा बनाना। भगवान अपनी ही शक्ति को आधार बनाकर सृष्टि करते हैं। जैसे कोई कुम्हार मिट्टी को आधार बनाकर पात्र गढ़ता है, पर मिट्टी उसके नियंत्रण में रहती है, वैसे ही प्रकृति भगवान के अधीन है।

विसृजामि पुनः पुनः — बार-बार रचता हूँ: सृष्टि का यह क्रम एक बार का नहीं, निरंतर आवर्ती है। हर कल्प के आरंभ में रचना होती है और हर कल्प के अंत में लीनता। यह चक्र सनातन काल से चला आ रहा है।

भूतग्राममिमं कृत्स्नम् — यह संपूर्ण प्राणिसमूह: भगवान कहते हैं कि जिस समूह को वे रचते हैं, वह संपूर्ण है। कोई भी प्राणी इस रचना से बाहर नहीं।

अवशं प्रकृतेर्वशात् — प्रकृति के वश में होने से परवश: यहाँ भगवान और प्राणियों के बीच का भेद स्पष्ट होता है। भगवान प्रकृति को अपने अधीन रखकर रचते हैं, जबकि प्राणी अपने कर्म-संस्कारों और प्रकृति के गुणों के वश में होकर आते हैं। उनके पास चुनने की स्वतंत्रता सीमित रहती है, इसलिए वे 'अवश' हैं।

गहरे भाव और आंतरिक संदेश

स्वतंत्रता और परतंत्रता का अंतर: यह श्लोक बताता है कि सच्ची स्वतंत्रता प्रकृति के गुणों और आदतों के वश में न होकर जीने में है। भगवान प्रकृति को चलाते हैं, जबकि सामान्य जीव प्रकृति द्वारा चलाए जाते हैं। साधना का उद्देश्य इसी परवशता से धीरे-धीरे मुक्त होना है।

प्रकृति का सम्मान: प्रकृति को भगवान की अपनी शक्ति कहने का अर्थ है कि संसार कोई तिरस्कार की वस्तु नहीं। उसे ईश्वर की रचना मानकर सम्मान के साथ उसमें कर्तव्य निभाना चाहिए।

'अवश' शब्द पर और विचार

प्राणियों को 'अवश' कहने से किसी निराशा का भाव नहीं निकलना चाहिए। यह शब्द हमें उस सीमा का बोध कराता है जिसमें हम अनजाने में जीते हैं, ताकि हम उससे बाहर निकलने का प्रयास कर सकें। गीता का पूरा उपदेश इसी दिशा में है कि मनुष्य ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग से प्रकृति के वश में होने की बजाय अपने विवेक से जीना सीखे।

सृष्टि में दया का भाव: जब भगवान बार-बार प्राणियों को रचते हैं, तो इसमें एक करुणा भी है। हर नए जन्म में जीव को अपने संस्कारों को सुधारने और मुक्ति की ओर बढ़ने का नया अवसर मिलता है। इस प्रकार सृष्टि का चक्र केवल दोहराव नहीं, विकास की संभावना भी है।

हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश

आदतों के वश से बाहर आना: जो आदतें हमें बिना सोचे चलाती हैं, जैसे क्रोध, आलस्य या अत्यधिक चिंता, उन्हें पहचानें और धीरे-धीरे उनके प्रभाव को कम करने का अभ्यास करें। यही परवशता से स्वतंत्रता की ओर यात्रा है।

सजग चुनाव: हर दिन कुछ ऐसे निर्णय सचेत रूप से लें जो हमारे दीर्घकालिक हित में हों, भले ही उनमें तात्कालिक सुविधा न हो। यही अवशता को कम करने का व्यावहारिक तरीका है।

आगे का विषय

भगवान ने बताया कि वे प्रकृति के द्वारा बार-बार सृष्टि रचते हैं। परंतु यदि वे सृष्टि के कर्ता हैं, तो क्या वे कर्मों से बँधते नहीं? अगले श्लोक में वे इस संदेह का समाधान देते हैं।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

सृष्टि-दृष्टि
स्वप्रकृति का आश्रय
दार्शनिक
अवश प्राणी प्रकृति के वश
आध्यात्मिक
भूतग्राम
ज्ञानयोग
कर्ता और अकर्ता
भक्ति-दृष्टि
ईश्वरीय संकल्प
मनोवैज्ञानिक
स्वभाव-बद्धता
शैक्षिक
पूर्व श्लोक का विस्तार
नैतिक
कर्म-स्वभाव
व्यावहारिक
स्वभाव को समझना
आत्मशुद्धि
प्रकृति के वश से मुक्ति
समन्वय-दृष्टि
ईश्वर और प्रकृति
प्रतीक-दृष्टि
अवष्टभ्य
पर्यावरणीय
प्रकृति और जीव
कर्मयोग
स्वभावजन्य कर्म

सूत्र

परमात्मा अपनी ही प्रकृति को आधार बनाकर सृजन करते हैं।

सृष्टि एक बार नहीं, बार-बार प्रकट होने वाली लीला है।

प्रकृति के वश में आए प्राणी स्वभाव से प्रेरित होकर कर्म करते हैं।

बिना विवेक के जीवन स्वभाव की धारा में बहता रहता है।

विवेक से स्वभाव को पहचानकर उससे ऊपर उठा जा सकता है।

ईश्वर प्रकृति का आश्रय लेकर रचते हैं, पर उसके वश में नहीं होते।

स्वभाव को जानना उसे बदलने की पहली सीढ़ी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'स्वां प्रकृतिमवष्टभ्य' का क्या अर्थ है?
अपनी ही प्रकृति को अधीन करके या आश्रय बनाकर।
'अवशं प्रकृतेर्वशात्' का क्या भाव है?
प्रकृति के स्वभाव के वश में होने से प्राणी विवश रहते हैं।
क्या यह कर्म की स्वतन्त्रता को नकारता है?
नहीं; यह प्राणियों के स्वभाव-बद्ध होने का वर्णन है, जबकि गीता में विवेक और साधना से स्वभाव को बदलने का मार्ग भी बताया गया है।
'भूतग्राम' का क्या अर्थ है?
प्राणियों का समुदाय।
इस श्लोक का व्यावहारिक सन्देश एक वाक्य में क्या है?
अपने स्वभाव की आदतों को पहचानो और विवेक से उनका सुधार करो।

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