भगवद्गीता 9.9 — उदासीन की तरह स्थित और आसक्ति-रहित: सृष्टि-कर्म भगवान् को नहीं बाँधते
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९.९ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
हे धनञ्जय! उन कर्मों में आसक्ति-रहित और उदासीन की तरह स्थित मुझे वे कर्म नहीं बाँधते।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| न | नहीं |
| च | और |
| माम् | मुझे |
| तानि | वे |
| कर्माणि | कर्म |
| निबध्नन्ति | बाँधते हैं |
| धनञ्जय | हे धनञ्जय |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| उदासीनवत् | उदासीन की तरह |
| आसीनम् | स्थित, बैठा हुआ |
| असक्तम् | आसक्ति-रहित |
| तेषु कर्मसु | उन कर्मों में |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| न | नहीं | उदासीनवत् | उदासीन की तरह |
| च | और | आसीनम् | स्थित, बैठा हुआ |
| माम् | मुझे | असक्तम् | आसक्ति-रहित |
| तानि | वे | तेषु कर्मसु | उन कर्मों में |
| कर्माणि | कर्म | ||
| निबध्नन्ति | बाँधते हैं | ||
| धनञ्जय | हे धनञ्जय | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
सृष्टि की रचना और पालन में भगवान की भूमिका सुनकर एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इतने बड़े कर्म करने वाले भगवान स्वयं उन कर्मों से बँधते हैं। इस श्लोक में भगवान उसका स्पष्ट उत्तर देते हैं।
भावार्थ
श्लोक का भाव: कर्म करते हुए भी अनासक्त
भगवान कहते हैं कि हे धनंजय! वे कर्म मुझे बाँधते नहीं हैं, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्त न होकर उदासीन की तरह स्थित रहता हूँ। यह श्लोक कर्मयोग का आदर्श प्रस्तुत करता है, जहाँ भगवान स्वयं उसके सबसे श्रेष्ठ उदाहरण बन जाते हैं।
मुख्य शब्दों का मर्म
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति — वे कर्म मुझे नहीं बाँधते: सृष्टि की रचना, पालन और संहार, ये तीनों बहुत बड़े कर्म हैं, फिर भी भगवान को इनसे कोई बंधन नहीं होता। इसका कारण यह है कि बंधन कर्म से नहीं, कर्म में आसक्ति और कर्तापन के अभिमान से होता है।
उदासीनवदासीनम् — उदासीन की तरह स्थित: 'उदासीन' शब्द का अर्थ यहाँ उदास या निष्क्रिय नहीं, बल्कि निष्पक्ष और निर्लिप्त है। जैसे कोई न्यायाधीश बिना पक्षपात के निर्णय करता है, या कोई साक्षी घटनाओं को देखता है पर उनमें डूबता नहीं, वैसे ही भगवान सृष्टि के कार्यों में अधिष्ठाता रहते हैं पर उनके सुख-दुःख में लिप्त नहीं होते।
असक्तं तेषु कर्मसु — उन कर्मों में आसक्ति रहित: आसक्ति का अभाव ही मुक्ति का कारण है। भगवान को अपने किए हुए कर्मों से कोई स्वार्थ नहीं है, न कोई फल की चाह है। इसलिए उनका कर्म बंधन नहीं बनता।
धनंजय — संबोधन का भाव: अर्जुन को यह संबोधन देना सूक्ष्म संकेत है कि जैसे वह धन को जीतने वाला है, वैसे ही उसे कर्मफल की आसक्ति को भी जीतना है।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
कर्मयोग का आदर्श: पूरी गीता में बार-बार यही बात आती है कि कर्म करो पर फल में आसक्त मत हो। यहाँ भगवान स्वयं अपना उदाहरण देकर यह सिद्धांत स्थापित करते हैं। जब परमात्मा स्वयं निष्काम भाव से कर्म करते हैं, तो मनुष्य के लिए यह आदर्श और भी प्रेरक बन जाता है।
निष्क्रियता नहीं, निर्लिप्तता: उदासीनता का अर्थ कर्म न करना नहीं है। सृष्टि के सारे कर्म चल रहे हैं। असली बात यह है कि कर्म करते हुए भी भीतर से अप्रभावित रहना, जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी भीगता नहीं।
भगवान की निर्लिप्तता से साधक की प्रेरणा
इस श्लोक का एक सुंदर पक्ष यह है कि भगवान स्वयं अपने आचरण से साधक को शिक्षा देते हैं। वे जो सिखाते हैं, उसी का पालन भी करते हैं। गीता के तीसरे अध्याय में उन्होंने कहा था कि वे भी कर्म करते हैं ताकि लोग उनका अनुसरण करें, और यहाँ उसी बात को ऊँचे स्तर पर समझाया गया है कि कर्म करते हुए भी अनासक्त कैसे रहा जाता है।
उदासीनता का सही अर्थ: उदासीन शब्द का अर्थ उदासी या उपेक्षा नहीं है। इसका भाव है ऊपर बैठकर निष्पक्ष रूप से देखना। एक माता-पिता जब बच्चे को गिरकर स्वयं उठना सिखाते हैं, तो वे उदासीन नहीं होते, पर वे हर कदम पर हस्तक्षेप भी नहीं करते। यह निर्लिप्त प्रेम का रूप है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
कर्तव्य और अनासक्ति: अपने सभी कर्तव्य पूरे मन से निभाएँ, पर परिणाम को अपनी पहचान या सुख-दुःख का आधार न बनाएँ। इससे कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ती है और मन भी शांत रहता है।
साक्षी की तरह देखना: जब कोई कठिन परिस्थिति आए, तो कुछ क्षण साक्षी की तरह उसे देखने का अभ्यास करें, जैसे कोई दूसरा व्यक्ति देख रहा हो। इससे प्रतिक्रिया की बजाय विवेकपूर्ण उत्तर देना संभव होता है।
श्लोक का भाव: कर्म करते हुए भी अनासक्त
भगवान कहते हैं कि हे धनंजय! वे कर्म मुझे बाँधते नहीं हैं, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्त न होकर उदासीन की तरह स्थित रहता हूँ। यह श्लोक कर्मयोग का आदर्श प्रस्तुत करता है, जहाँ भगवान स्वयं उसके सबसे श्रेष्ठ उदाहरण बन जाते हैं।
मुख्य शब्दों का मर्म
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति — वे कर्म मुझे नहीं बाँधते: सृष्टि की रचना, पालन और संहार, ये तीनों बहुत बड़े कर्म हैं, फिर भी भगवान को इनसे कोई बंधन नहीं होता। इसका कारण यह है कि बंधन कर्म से नहीं, कर्म में आसक्ति और कर्तापन के अभिमान से होता है।
उदासीनवदासीनम् — उदासीन की तरह स्थित: 'उदासीन' शब्द का अर्थ यहाँ उदास या निष्क्रिय नहीं, बल्कि निष्पक्ष और निर्लिप्त है। जैसे कोई न्यायाधीश बिना पक्षपात के निर्णय करता है, या कोई साक्षी घटनाओं को देखता है पर उनमें डूबता नहीं, वैसे ही भगवान सृष्टि के कार्यों में अधिष्ठाता रहते हैं पर उनके सुख-दुःख में लिप्त नहीं होते।
असक्तं तेषु कर्मसु — उन कर्मों में आसक्ति रहित: आसक्ति का अभाव ही मुक्ति का कारण है। भगवान को अपने किए हुए कर्मों से कोई स्वार्थ नहीं है, न कोई फल की चाह है। इसलिए उनका कर्म बंधन नहीं बनता।
धनंजय — संबोधन का भाव: अर्जुन को यह संबोधन देना सूक्ष्म संकेत है कि जैसे वह धन को जीतने वाला है, वैसे ही उसे कर्मफल की आसक्ति को भी जीतना है।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
कर्मयोग का आदर्श: पूरी गीता में बार-बार यही बात आती है कि कर्म करो पर फल में आसक्त मत हो। यहाँ भगवान स्वयं अपना उदाहरण देकर यह सिद्धांत स्थापित करते हैं। जब परमात्मा स्वयं निष्काम भाव से कर्म करते हैं, तो मनुष्य के लिए यह आदर्श और भी प्रेरक बन जाता है।
निष्क्रियता नहीं, निर्लिप्तता: उदासीनता का अर्थ कर्म न करना नहीं है। सृष्टि के सारे कर्म चल रहे हैं। असली बात यह है कि कर्म करते हुए भी भीतर से अप्रभावित रहना, जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी भीगता नहीं।
भगवान की निर्लिप्तता से साधक की प्रेरणा
इस श्लोक का एक सुंदर पक्ष यह है कि भगवान स्वयं अपने आचरण से साधक को शिक्षा देते हैं। वे जो सिखाते हैं, उसी का पालन भी करते हैं। गीता के तीसरे अध्याय में उन्होंने कहा था कि वे भी कर्म करते हैं ताकि लोग उनका अनुसरण करें, और यहाँ उसी बात को ऊँचे स्तर पर समझाया गया है कि कर्म करते हुए भी अनासक्त कैसे रहा जाता है।
उदासीनता का सही अर्थ: उदासीन शब्द का अर्थ उदासी या उपेक्षा नहीं है। इसका भाव है ऊपर बैठकर निष्पक्ष रूप से देखना। एक माता-पिता जब बच्चे को गिरकर स्वयं उठना सिखाते हैं, तो वे उदासीन नहीं होते, पर वे हर कदम पर हस्तक्षेप भी नहीं करते। यह निर्लिप्त प्रेम का रूप है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
कर्तव्य और अनासक्ति: अपने सभी कर्तव्य पूरे मन से निभाएँ, पर परिणाम को अपनी पहचान या सुख-दुःख का आधार न बनाएँ। इससे कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ती है और मन भी शांत रहता है।
साक्षी की तरह देखना: जब कोई कठिन परिस्थिति आए, तो कुछ क्षण साक्षी की तरह उसे देखने का अभ्यास करें, जैसे कोई दूसरा व्यक्ति देख रहा हो। इससे प्रतिक्रिया की बजाय विवेकपूर्ण उत्तर देना संभव होता है।
आगे का विषय
भगवान ने अपने अनासक्त कर्तृत्व का रहस्य बताया। अब वे यह स्पष्ट करते हैं कि जब वे स्वयं निर्लिप्त हैं तो सृष्टि का संचालन कैसे होता है और प्रकृति की उसमें क्या भूमिका है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
कर्म तब बाँधते हैं जब उनमें आसक्ति और कर्तापन का भाव हो।
उदासीन का अर्थ उदासीन भाव नहीं, निर्लिप्त साक्षी की स्थिरता है।
जो परिणाम से चिपकता नहीं, वह कर्म करते हुए भी मुक्त रहता है।
पूरा प्रयास करना और परिणाम से बँधना—ये दो अलग बातें हैं।
सृष्टि-कार्य करते हुए भी परमात्मा उनसे अछूते रहते हैं; साधक उसी की ओर बढ़ सकता है।
'मैं ही करने वाला हूँ' का अभिमान बन्धन की जड़ है।
शान्त चित्त से किया गया कर्म सबसे कुशल और सबसे मुक्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'उदासीनवत् आसीनम्' का क्या अर्थ है?
'असक्तं तेषु कर्मसु' का क्या भाव है?
क्या इसका अर्थ है कि भगवान् कर्म के प्रति उदासीन हैं?
साधक इससे क्या सीखे?
इस श्लोक का व्यावहारिक सन्देश एक वाक्य में क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: