कर्म और अकर्म का भेद अक्सर उलझा देता है: क्या कुछ न करना अकर्म है, और क्या हर काम करना कर्म का बंधन है? गीता इस उलझन को सीधा करती है और बताती है कि असली अंतर बाहर की क्रिया में नहीं, भीतर की भावना, आसक्ति और कर्तापन में है। इसलिए व्यस्त व्यक्ति भी मुक्त हो सकता है और निष्क्रिय बैठा व्यक्ति भी बँधा रह सकता है।
गीता 4.16 और 4.17 कहती हैं कि कर्म, अकर्म और विकर्म का विवेक आध्यात्मिक मुक्ति के लिए ज़रूरी है, यानी किसी कार्य का मूल्यांकन केवल बाहरी रूप से नहीं, उसके उद्देश्य, भावना और परिणामों से करें। गीता 3.4 के अनुसार बाहरी रूप से कर्म छोड़ देना न मुक्ति देता है न सिद्धि, और गीता 9.9 कहती है कि भगवान् सृष्टि-कर्म करते हुए भी आसक्ति-रहित रहते हैं, इसलिए कर्म नहीं, आसक्ति बाँधती है।
गीता 13.30 बताती है कि सब कर्म प्रकृति से सम्पन्न होते हैं और आत्मा साक्षी है, इसलिए 'मैंने किया' के अहंकार को हल्का करें। गीता 18.15 के अनुसार शरीर, वाणी और मन से होने वाले हर कर्म के पीछे पाँच कारण कार्य करते हैं, इसलिए अपने विचार, वाणी और व्यवहार के प्रति सजग रहें। गीता 3.1 और 3.2 में अर्जुन की दुविधा और उलझे वचनों से बुद्धि का मोहित होना दिखाते हैं कि मन की उलझन को दबाने के बजाय ईमानदारी से स्पष्ट प्रश्न पूछना चाहिए।