भगवद्गीता 2.71 — सब कामनाएँ त्यागकर निःस्पृह, निर्मम और निरहंकार पुरुष शान्ति पाता है
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ २.७१ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहा-रहित, ममता-रहित और अहंकार-रहित होकर विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| विहाय | त्यागकर |
| कामान् | कामनाओं को |
| यः सर्वान् | जो सब |
| पुमान् | पुरुष |
| चरति | विचरता है |
| निःस्पृहः | स्पृहा रहित |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| निर्ममः | ममता से रहित |
| निरहङ्कारः | अहंकार से रहित |
| सः | वह |
| शान्तिम् | शान्ति को |
| अधिगच्छति | प्राप्त होता है |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| विहाय | त्यागकर | निर्ममः | ममता से रहित |
| कामान् | कामनाओं को | निरहङ्कारः | अहंकार से रहित |
| यः सर्वान् | जो सब | सः | वह |
| पुमान् | पुरुष | शान्तिम् | शान्ति को |
| चरति | विचरता है | अधिगच्छति | प्राप्त होता है |
| निःस्पृहः | स्पृहा रहित | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में श्रीकृष्ण शांति की प्राप्ति के लिए त्याग के तीन आधार बताते हैं। जो मनुष्य सब कामनाओं को छोड़कर निःस्पृह, ममता से रहित और अहंकार से रहित होकर विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है।
भावार्थ
शांति के तीन आधार
पिछले श्लोक में समुद्र की उपमा से शांति की गंभीरता बताई गई थी। इस श्लोक में श्रीकृष्ण उसकी प्राप्ति का व्यावहारिक सूत्र देते हैं, जिसमें तीन आंतरिक त्यागों का क्रम है।
विहाय कामान्यः सर्वान् — जो सब कामनाओं को छोड़कर: यहाँ भी त्याग का अर्थ कामनाओं की आसक्ति और उनके प्रति बेचैनी को छोड़ना है। जब कामनाएँ मन को चलाना बंद कर देती हैं, तब मन हल्का और स्वतंत्र हो जाता है।
पुमांश्चरति निःस्पृहः — मनुष्य निःस्पृह होकर विचरता है: ‘निःस्पृह’ का अर्थ है स्पृहा या लालसा से रहित। ऐसा व्यक्ति संसार में चलता-फिरता है, कर्म करता है, संबंध निभाता है, पर भीतर किसी चीज़ के लिए तरसता नहीं।
निर्ममः — ममता से रहित: ‘मम’ का अर्थ है ‘मेरा’। जब व्यक्ति वस्तुओं, लोगों और परिस्थितियों को ‘मेरा’ कहकर कसकर पकड़ लेता है, तब उनके खोने का भय और दुख जन्म लेते हैं। निर्मम व्यक्ति उन्हें अपनाता है, पर उन पर स्वामित्व का बोझ नहीं रखता।
निरहङ्कारः — अहंकार से रहित: अहंकार वह भाव है जिसमें मैं ही कर्ता और स्वामी हूँ। जब यह भाव शिथिल होता है, तब सफलता का घमंड और असफलता की ग्लानि दोनों घट जाते हैं।
स शान्तिमधिगच्छति — वह शांति को प्राप्त होता है: इन तीनों त्यागों के परिणामस्वरूप जो स्थिति आती है, उसे श्रीकृष्ण शांति कहते हैं।
तीनों का परस्पर संबंध
कामना, ममता और अहंकार एक-दूसरे से जुड़े हैं। अहंकार ‘मैं’ का भाव देता है, ममता ‘मेरा’ का भाव जोड़ती है, और कामना ‘और चाहिए’ की भूख बढ़ाती है। जब ये तीनों शांत होते हैं, तब मन को जो विश्राम मिलता है, उसी को गीता शांति कहती है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
मेरा-तेरा के बोझ से हल्का होना: जब हम चीज़ों और रिश्तों को अधिकार-भाव से पकड़ने की जगह कृतज्ञता से स्वीकार करते हैं, तब उनसे जुड़ी चिंता कम हो जाती है।
कर्तापन के अभिमान में कमी: अपनी उपलब्धियों में दूसरों, परिस्थितियों और भाग्य के योगदान को पहचानना अहंकार को स्वाभाविक रूप से हल्का करता है।
इच्छाओं को सीमित करना: जो आवश्यक है उसमें संतोष करना सीखना और अनावश्यक इच्छाओं को पहचानकर छोड़ना जीवन को सरल और शांत बनाता है।
शांति के तीन आधार
पिछले श्लोक में समुद्र की उपमा से शांति की गंभीरता बताई गई थी। इस श्लोक में श्रीकृष्ण उसकी प्राप्ति का व्यावहारिक सूत्र देते हैं, जिसमें तीन आंतरिक त्यागों का क्रम है।
विहाय कामान्यः सर्वान् — जो सब कामनाओं को छोड़कर: यहाँ भी त्याग का अर्थ कामनाओं की आसक्ति और उनके प्रति बेचैनी को छोड़ना है। जब कामनाएँ मन को चलाना बंद कर देती हैं, तब मन हल्का और स्वतंत्र हो जाता है।
पुमांश्चरति निःस्पृहः — मनुष्य निःस्पृह होकर विचरता है: ‘निःस्पृह’ का अर्थ है स्पृहा या लालसा से रहित। ऐसा व्यक्ति संसार में चलता-फिरता है, कर्म करता है, संबंध निभाता है, पर भीतर किसी चीज़ के लिए तरसता नहीं।
निर्ममः — ममता से रहित: ‘मम’ का अर्थ है ‘मेरा’। जब व्यक्ति वस्तुओं, लोगों और परिस्थितियों को ‘मेरा’ कहकर कसकर पकड़ लेता है, तब उनके खोने का भय और दुख जन्म लेते हैं। निर्मम व्यक्ति उन्हें अपनाता है, पर उन पर स्वामित्व का बोझ नहीं रखता।
निरहङ्कारः — अहंकार से रहित: अहंकार वह भाव है जिसमें मैं ही कर्ता और स्वामी हूँ। जब यह भाव शिथिल होता है, तब सफलता का घमंड और असफलता की ग्लानि दोनों घट जाते हैं।
स शान्तिमधिगच्छति — वह शांति को प्राप्त होता है: इन तीनों त्यागों के परिणामस्वरूप जो स्थिति आती है, उसे श्रीकृष्ण शांति कहते हैं।
तीनों का परस्पर संबंध
कामना, ममता और अहंकार एक-दूसरे से जुड़े हैं। अहंकार ‘मैं’ का भाव देता है, ममता ‘मेरा’ का भाव जोड़ती है, और कामना ‘और चाहिए’ की भूख बढ़ाती है। जब ये तीनों शांत होते हैं, तब मन को जो विश्राम मिलता है, उसी को गीता शांति कहती है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
मेरा-तेरा के बोझ से हल्का होना: जब हम चीज़ों और रिश्तों को अधिकार-भाव से पकड़ने की जगह कृतज्ञता से स्वीकार करते हैं, तब उनसे जुड़ी चिंता कम हो जाती है।
कर्तापन के अभिमान में कमी: अपनी उपलब्धियों में दूसरों, परिस्थितियों और भाग्य के योगदान को पहचानना अहंकार को स्वाभाविक रूप से हल्का करता है।
इच्छाओं को सीमित करना: जो आवश्यक है उसमें संतोष करना सीखना और अनावश्यक इच्छाओं को पहचानकर छोड़ना जीवन को सरल और शांत बनाता है।
आगे का विषय
श्रीकृष्ण ने निःस्पृहता, निर्ममता और निरहंकार को शांति का आधार बताया। अब अध्याय के अंतिम श्लोक में वे इस पूरी अवस्था का नाम और उसका परम फल बताकर दूसरे अध्याय के उपदेश का समापन करते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जिसकी इच्छाएँ शान्त हैं, वही संसार में निर्भय विचरता है।
ममता का बोझ हटते ही मन हल्का हो जाता है।
अहंकार-रहित व्यक्ति सहज और सरल होता है।
शान्ति त्याग का उपहार है, प्राप्ति का नहीं।
जो संसार में निर्लिप्त होकर चलता है, वह स्वतंत्र है।
कामनाओं का त्याग जीवन का त्याग नहीं, बन्धन का त्याग है।
जो 'मैं' और 'मेरा' से मुक्त है, वही सचमुच मुक्त है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'निःस्पृहः' का क्या अर्थ है?
'निर्मम' का क्या मतलब है?
'निरहङ्कार' से क्या तात्पर्य है?
क्या इसका अर्थ है कि जीवन के सम्बन्ध छोड़ देने चाहिए?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: