भगवद्गीता 10.27 — अश्वों में उच्चैःश्रवा, हाथियों में ऐरावत, मनुष्यों में राजा

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ १०.२७ ॥

घोड़ों में अमृत के साथ समुद्र से उत्पन्न उच्चैःश्रवा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा—इन्हें मेरी ही विभूति जानो।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

उच्चैःश्रवसम् अश्वानाम्
विद्धि माम् अमृतोद्भवम् ।
ऐरावतम् गजेन्द्राणाम्
नराणाम् च नराधिपम् ॥

शब्दार्थ

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संस्कृत शब्द अर्थ
उच्चैःश्रवसम् उच्चैःश्रवा नामक अश्व
अश्वानाम् घोड़ों में
विद्धि जानो
माम् मुझे
अमृतोद्भवम् अमृत के साथ समुद्र-मन्थन से उत्पन्न
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संस्कृत शब्द अर्थ
ऐरावतम् ऐरावत
गजेन्द्राणाम् श्रेष्ठ हाथियों में
नराणाम् मनुष्यों में
च और
नराधिपम् राजा
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
उच्चैःश्रवसम् उच्चैःश्रवा नामक अश्व ऐरावतम् ऐरावत
अश्वानाम् घोड़ों में गजेन्द्राणाम् श्रेष्ठ हाथियों में
विद्धि जानो नराणाम् मनुष्यों में
माम् मुझे च और
अमृतोद्भवम् अमृत के साथ समुद्र-मन्थन से उत्पन्न नराधिपम् राजा

विस्तृत विवरण

परिचय

पिछले श्लोक में विशिष्ट वर्गों की विभूतियाँ बताई गईं. इस श्लोक में भगवान पशुओं और मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ रूपों में अपनी उपस्थिति बताते हैं, जिनका उद्भव या स्थान विशेष रूप से गौरवपूर्ण माना जाता है.

भावार्थ

श्रेष्ठ अश्व, गजराज और राजा में विभूति

इस श्लोक में तीन उदाहरण हैं, जिनमें से दो पशु जगत के और एक मानव समाज का है. तीनों में शक्ति, गरिमा और प्रभाव की श्रेष्ठता दिखाई देती है.

उच्चैःश्रवसमश्वानाम् — अश्वों में उच्चैःश्रवा: उच्चैःश्रवा पौराणिक कथाओं में समुद्र-मंथन से उत्पन्न हुआ दिव्य अश्व माना जाता है.

अमृतोद्भवम् — अमृत के साथ उत्पन्न: यह उल्लेख बताता है कि वह उसी मंथन से प्रकट हुआ जिससे अमृत निकला. अमृत से जुड़ा होना उसकी दिव्यता और श्रेष्ठता का प्रतीक है.

ऐरावतं गजेन्द्राणाम् — गजराजों में ऐरावत: ऐरावत इंद्र का श्वेत और विशाल हाथी माना जाता है. उसकी शक्ति, विशालता और गरिमा उसे सब हाथियों में श्रेष्ठ बनाती है.

नराणां च नराधिपम् — मनुष्यों में राजा: मनुष्यों में राजा वह है जिस पर प्रजा की रक्षा और कल्याण का दायित्व है. यहाँ विभूति राजपद के अहंकार में नहीं, बल्कि धर्मपूर्वक शासन करने के दायित्व में है. जब कोई शासक न्याय, करुणा और विवेक से प्रजा का पालन करता है, तब उसमें ईश्वर की शक्ति का प्रकाश दिखता है.

हमारे जीवन के लिए संदेश

श्रेष्ठता का सम्मान: जहाँ भी हम किसी की उत्कृष्टता देखें, वहाँ ईर्ष्या के स्थान पर प्रशंसा और प्रेरणा का भाव रखना चाहिए.

पद के साथ उत्तरदायित्व: अधिकार जिनके हाथ में है, उनके लिए यह स्मरण रखना आवश्यक है कि वे दूसरों के कल्याण के लिए उत्तरदायी हैं.

शक्ति में मर्यादा: विशाल हाथी की शक्ति तब सुंदर लगती है जब उसमें गरिमा और संयम हो. हमारी क्षमता भी तभी शोभा देती है जब उसमें विनम्रता हो.

आगे का विषय

भगवान ने श्रेष्ठ अश्व, गजराज और राजा में अपनी विभूति बताई. अब वे शस्त्रों, कामधेनु, संतानोत्पत्ति और सर्पों में अपनी उपस्थिति बताकर इस सूची को आगे बढ़ाते हैं.

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

आध्यात्मिक
विभूति दिव्यता
प्रतीक-दृष्टि
उच्चैःश्रवा ऐरावत नराधिप
नेतृत्व
राजा उत्तरदायित्व
सामाजिक
शासन सुरक्षा
नैतिक
राजधर्म जिम्मेदारी
भक्ति-दृष्टि
हर श्रेष्ठ में प्रभु
शैक्षिक
समुद्र-मन्थन की कथा
दार्शनिक
अमृत—श्रेष्ठता का मूल
मनोवैज्ञानिक
शक्ति और गरिमा
व्यावहारिक
शासन में धर्म
प्रबन्धन
संसाधनों का संरक्षण
साधना-दृष्टि
ध्यान के आलम्बन
एकत्व-दृष्टि
सब श्रेष्ठता में एक
समन्वय-दृष्टि
शक्ति और धर्म का मेल

सूत्र

राजा का धर्म प्रजा की रक्षा और सेवा है।

विशाल शक्ति तभी शोभा देती है जब उसमें विनम्रता हो।

वेग और सौन्दर्य जब अमृत से जुड़ें तो दिव्य बन जाते हैं।

अमृत-जन्य वस्तु जीवन को ऊँचाई देने वाली है।

शक्ति का उपयोग लोक-कल्याण के लिए ही सच्चा नेतृत्व है।

ऊँचा पद ऊँचा दायित्व भी लाता है।

श्रेष्ठता में ईश्वर देखना अहंकार को रोकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'उच्चैःश्रवा' कौन है?
यह समुद्र-मन्थन से उत्पन्न दिव्य श्वेत अश्व है, जो अश्वों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
'अमृतोद्भवम्' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है अमृत के साथ उत्पन्न, अर्थात् समुद्र-मन्थन से प्रकट हुआ।
'ऐरावत' कौन है?
ऐरावत इन्द्र का दिव्य हाथी है, जो गजेन्द्रों में श्रेष्ठ माना जाता है।
'नराधिप' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है मनुष्यों का अधिपति, यानी राजा, जिसका धर्म प्रजा की रक्षा है।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
शक्ति और पद को सेवा तथा धर्म से जोड़ें, तभी वे विभूति बनते हैं।

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