भगवद्गीता 13.28 — जो सब प्राणियों में समभाव से स्थित अविनाशी परमेश्वर को देखता है, वही यथार्थ देखता है

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ १३.२८ ॥

जो मनुष्य नष्ट होने वाले सब प्राणियों में समान रूप से स्थित अविनाशी परमेश्वर को देखता है, वही वास्तव में देखता है।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

समम् सर्वेषु भूतेषु
तिष्ठन्तम् परमेश्वरम् ।
विनश्यत्सु अविनश्यन्तम्
यः पश्यति सः पश्यति ॥

शब्दार्थ

पंक्ति 1
संस्कृत शब्द अर्थ
समम् समान रूप से
सर्वेषु भूतेषु सब प्राणियों में
तिष्ठन्तम् स्थित
परमेश्वरम् परमेश्वर को
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
विनश्यत्सु नष्ट होते हुए (प्राणियों) में
अविनश्यन्तम् नष्ट न होने वाले को
यः जो
पश्यति देखता है
सः पश्यति वही (वास्तव में) देखता है
पंक्ति 1 पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
समम् समान रूप से विनश्यत्सु नष्ट होते हुए (प्राणियों) में
सर्वेषु भूतेषु सब प्राणियों में अविनश्यन्तम् नष्ट न होने वाले को
तिष्ठन्तम् स्थित यः जो
परमेश्वरम् परमेश्वर को पश्यति देखता है
सः पश्यति वही (वास्तव में) देखता है

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में भगवान सच्चे दर्शन की परिभाषा देते हैं। वही व्यक्ति वास्तव में देखता है जो नश्वर प्राणियों में समान रूप से स्थित अविनाशी परमेश्वर को देख लेता है।

भावार्थ

असली देखना क्या है?

हम सब आँखों से देखते हैं, पर भगवान यहाँ एक गहरे प्रकार के देखने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि वास्तव में वही देखता है जो बाहरी दृश्य के पीछे की सत्ता को पहचान लेता है। यह श्लोक पूरे ज्ञानयोग का केंद्रीय दर्शन है।

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तम् (सब प्राणियों में समान रूप से स्थित): प्राणी अनेक हैं, उनके शरीर, स्वभाव और परिस्थितियाँ भिन्न हैं। पर उन सबके भीतर विद्यमान परमेश्वर एक और समान है। किसी में वह अधिक और किसी में कम नहीं। जैसे बिजली एक ही होती है, चाहे वह छोटे बल्ब में हो या विशाल यंत्र में। उपकरण भिन्न हैं, ऊर्जा एक है।

परमेश्वरम् (परम ईश्वर): यहाँ भगवान उस तत्त्व को 'परमेश्वर' कहते हैं, जो सब जीवों का अंतर्यामी स्वामी है और जिसका स्वरूप सबमें एक है।

विनश्यत्सु अविनश्यन्तम् (नष्ट होते हुए में नष्ट न होने वाला): यह इस श्लोक का सबसे सुंदर भाग है। शरीर, पद, संबंध और परिस्थितियाँ सब नश्वर हैं, और सभी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इन सबके बीच जो तत्त्व कभी नष्ट नहीं होता, उसे देख पाना ही असली दृष्टि है। जैसे लहरें उठती और मिटती हैं, पर समुद्र बना रहता है।

यः पश्यति स पश्यति (जो देखता है, वही वास्तव में देखता है): इस पुनरुक्ति का आशय यह है कि बाकी सब लोग देखते हुए भी नहीं देखते। वे केवल सतह देखते हैं, जबकि सच्चा द्रष्टा गहराई को देख लेता है।

इस दर्शन की कसौटी

यह दर्शन केवल सिद्धांत की बात नहीं, व्यवहार की कसौटी भी है। जो वास्तव में सबमें एक ही परमेश्वर को देखता है, उसके व्यवहार में भेदभाव और घृणा टिक नहीं सकती। साथ ही, जो नश्वर में अविनाशी को देख लेता है, वह हानि और मृत्यु के भय से भी ऊपर उठने लगता है।

हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश (The Vision of Oneness)

व्यवहार में समता: किसी से मिलते समय उसके पद, धन या स्वभाव से परे यह स्मरण करने का प्रयास कीजिए कि उसके भीतर भी वही चेतना है जो मेरे भीतर है। यह अभ्यास हमारे व्यवहार को कोमल और सम्मानपूर्ण बनाता है।

नश्वरता के बीच स्थिरता: जब जीवन में कुछ टूटता है, चाहे नौकरी हो, संबंध हो या स्वास्थ्य, तब यह स्मरण कि कुछ शाश्वत भी है जो नहीं टूटता, मन को सहारा देता है।

गहरी दृष्टि का विकास: किसी भी परिस्थिति में केवल सतही घटना पर प्रतिक्रिया करने के बजाय यह पूछिए कि इसके पीछे का स्थायी सत्य क्या है। इससे हमारी प्रतिक्रियाएँ परिपक्व बनती हैं।

आगे का विषय

भगवान ने स्पष्ट किया कि वही सच्चा द्रष्टा है जो नश्वर में अविनाशी परमेश्वर को देखता है। अब वे बताते हैं कि इस समदर्शन का व्यावहारिक फल क्या है: कैसे यह दृष्टि हमें स्वयं को हानि पहुँचाने से बचाती है और परम गति की ओर ले जाती है।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

एकत्व-दृष्टि
समदर्शन सबमें परमेश्वर
आध्यात्मिक
अविनाशी तत्त्व आत्म-दृष्टि
ज्ञानयोग
नश्वर-अनश्वर विवेक यथार्थ दर्शन
मानवता
समानता करुणा
नैतिक
सबके प्रति आदर
सामाजिक
भेदभाव का अन्त सद्भाव
भक्ति-दृष्टि
सर्वत्र ईश्वर-दर्शन
मनोवैज्ञानिक
भय और द्वेष का शमन
दार्शनिक
परिवर्तन में स्थिरता
साधना-दृष्टि
दृष्टि का रूपान्तरण
नेतृत्व
निष्पक्षता समावेशी दृष्टि
पारिवारिक
सबके प्रति समान स्नेह
व्यावहारिक
व्यवहार में समानता
जिज्ञासा-दृष्टि
वास्तव में देखना क्या है?

सूत्र

सच्चा दर्शन वह है जो रूपों के पार एक चेतना को देखे।

शरीर बदलते हैं; भीतर की सत्ता नहीं बदलती।

नश्वर रूपों में अनश्वर को देखना ही विवेक है।

जो सबमें समान स्थित है, वही सबका आधार है।

जो सबमें एक को देखता है, उसमें करुणा स्वाभाविक होती है।

भेद बाहर के रूपों का है, भीतर के सार का नहीं।

आँखें खुली होना देखना नहीं; दृष्टि का शुद्ध होना देखना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'यः पश्यति स पश्यति' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि जो इस प्रकार देखता है, वही वास्तव में सही देखता है, अन्य लोग केवल बाहरी रूपों को देखते हैं।
'समं तिष्ठन्तम्' क्यों कहा गया?
क्योंकि परमेश्वर सब प्राणियों में समान रूप से स्थित है; जाति, रूप, योनि आदि के भेद से उसमें भेद नहीं होता।
'विनश्यत्स्वविनश्यन्तम्' का क्या भाव है?
भाव है कि शरीर आदि नष्ट होते हैं, परन्तु उनमें स्थित परमेश्वर या आत्म-तत्त्व अविनाशी है।
क्या इसका अर्थ भेदभावरहित व्यवहार है?
हाँ। जब सबमें एक ही अविनाशी सत्ता दिखती है, तब व्यवहार में आदर, करुणा और निष्पक्षता सहज होती है।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
सबमें एक ही अविनाशी परमेश्वर को देखो और उसी दृष्टि से व्यवहार करो।

संबंधित विषय खोजें

इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक:

जीवन-क्षेत्र समाज संबंध समुदाय