भगवद्गीता 12.14 — सन्तुष्ट, संयमी और दृढ़-निश्चयी भक्त भगवान् को प्रिय
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १२.१४ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
जो योगी निरन्तर सन्तुष्ट रहता है, जिसका मन और इन्द्रियाँ वश में हैं, जिसका निश्चय दृढ़ है और जिसने मन-बुद्धि को मुझे अर्पित कर दिया है—ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सन्तुष्टः | सदा तृप्त और सन्तुष्ट |
| सततम् | निरन्तर |
| योगी | योगयुक्त साधक |
| यतात्मा | मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाला |
| दृढनिश्चयः | दृढ़ निश्चय वाला |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| मयि | मुझमें |
| अर्पितमनोबुद्धिः | जिसने मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर दिए हैं |
| यः मद्भक्तः | जो मेरा भक्त है |
| सः | वह |
| मे प्रियः | मुझे प्रिय है |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सन्तुष्टः | सदा तृप्त और सन्तुष्ट | मयि | मुझमें |
| सततम् | निरन्तर | अर्पितमनोबुद्धिः | जिसने मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर दिए हैं |
| योगी | योगयुक्त साधक | यः मद्भक्तः | जो मेरा भक्त है |
| यतात्मा | मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाला | सः | वह |
| दृढनिश्चयः | दृढ़ निश्चय वाला | मे प्रियः | मुझे प्रिय है |
विस्तृत विवरण
परिचय
यह श्लोक पिछले श्लोक का ही निष्कर्ष है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ संतोष, संयम और दृढ़ निश्चय के साथ मन-बुद्धि को प्रभु को अर्पित करने वाले भक्त को अपना प्रिय कहते हैं।
भावार्थ
गुणों का आधार: समर्पित मन-बुद्धि
श्लोक 13 में भक्त के सामाजिक और भावनात्मक गुण गिनाए गए थे। इस श्लोक में उन गुणों का आंतरिक आधार स्पष्ट होता है। भक्त का यह व्यवहार केवल नैतिक नियमों का पालन नहीं, बल्कि प्रभु के प्रति गहरे समर्पण का स्वाभाविक फल है।
सन्तुष्टः सततम् (निरंतर संतुष्ट): यह संतोष परिस्थिति के अनुकूल होने पर निर्भर नहीं करता। इसका स्रोत भीतर है। जिसे भीतर पूर्णता का अनुभव होता है, उसे बाहर की कमी बहुत विचलित नहीं करती।
योगी यतात्मा (योगयुक्त और संयमी): उसका जीवन प्रभु से जुड़ा हुआ है और उसका मन अपने वश में है। 'यतात्मा' का भाव है कि वह मन, इंद्रियों और स्वभाव का स्वामी है, उनका दास नहीं।
दृढनिश्चयः (दृढ़ निश्चय वाला): उसके निर्णय में अस्थिरता नहीं है। वह जानता है कि उसे किस दिशा में चलना है, और कठिनाइयाँ आने पर भी अपने मार्ग से नहीं हटता।
मय्यर्पितमनोबुद्धिः (जिसने मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर दी): यह इस श्लोक का मूल है। श्लोक 8 में भगवान ने अर्जुन से यही कहा था कि मन और बुद्धि मुझमें लगाओ। यहाँ उसी का फल दिखता है, जहाँ भावना और विवेक दोनों प्रभु को समर्पित हैं।
स मे प्रियः (वह मुझे प्रिय है): भगवान के प्रिय होने का अर्थ यह नहीं कि वे किसी से पक्षपात करते हैं। इसका भाव यह है कि जिसका हृदय इन गुणों से भरा है, वह भगवान से सबसे अधिक निकटता का अनुभव करता है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश (आंतरिक संतोष)
संतोष और प्रगति: संतोष का अर्थ प्रयास छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है कि प्रयास करते हुए भी मन की शांति इस पर निर्भर न हो कि हमें कितना मिला। ऐसा व्यक्ति अधिक स्थिरता से और अधिक समय तक काम कर पाता है।
व्यावहारिक तरीका: रोज़ दिन के अंत में तीन ऐसी बातें लिखें जिनके लिए आप कृतज्ञ हैं। यह अभ्यास मन को कमी से हटाकर जो मिला है उस ओर ले जाता है, और संतोष का स्वभाव बनाता है।
गुणों का आधार: समर्पित मन-बुद्धि
श्लोक 13 में भक्त के सामाजिक और भावनात्मक गुण गिनाए गए थे। इस श्लोक में उन गुणों का आंतरिक आधार स्पष्ट होता है। भक्त का यह व्यवहार केवल नैतिक नियमों का पालन नहीं, बल्कि प्रभु के प्रति गहरे समर्पण का स्वाभाविक फल है।
सन्तुष्टः सततम् (निरंतर संतुष्ट): यह संतोष परिस्थिति के अनुकूल होने पर निर्भर नहीं करता। इसका स्रोत भीतर है। जिसे भीतर पूर्णता का अनुभव होता है, उसे बाहर की कमी बहुत विचलित नहीं करती।
योगी यतात्मा (योगयुक्त और संयमी): उसका जीवन प्रभु से जुड़ा हुआ है और उसका मन अपने वश में है। 'यतात्मा' का भाव है कि वह मन, इंद्रियों और स्वभाव का स्वामी है, उनका दास नहीं।
दृढनिश्चयः (दृढ़ निश्चय वाला): उसके निर्णय में अस्थिरता नहीं है। वह जानता है कि उसे किस दिशा में चलना है, और कठिनाइयाँ आने पर भी अपने मार्ग से नहीं हटता।
मय्यर्पितमनोबुद्धिः (जिसने मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर दी): यह इस श्लोक का मूल है। श्लोक 8 में भगवान ने अर्जुन से यही कहा था कि मन और बुद्धि मुझमें लगाओ। यहाँ उसी का फल दिखता है, जहाँ भावना और विवेक दोनों प्रभु को समर्पित हैं।
स मे प्रियः (वह मुझे प्रिय है): भगवान के प्रिय होने का अर्थ यह नहीं कि वे किसी से पक्षपात करते हैं। इसका भाव यह है कि जिसका हृदय इन गुणों से भरा है, वह भगवान से सबसे अधिक निकटता का अनुभव करता है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश (आंतरिक संतोष)
संतोष और प्रगति: संतोष का अर्थ प्रयास छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है कि प्रयास करते हुए भी मन की शांति इस पर निर्भर न हो कि हमें कितना मिला। ऐसा व्यक्ति अधिक स्थिरता से और अधिक समय तक काम कर पाता है।
व्यावहारिक तरीका: रोज़ दिन के अंत में तीन ऐसी बातें लिखें जिनके लिए आप कृतज्ञ हैं। यह अभ्यास मन को कमी से हटाकर जो मिला है उस ओर ले जाता है, और संतोष का स्वभाव बनाता है।
आगे का विषय
भगवान ने भक्त के आंतरिक गुणों और उसके समर्पण को एक साथ रखकर उसे अपना प्रिय कहा। अब अगले श्लोक में वे बताते हैं कि ऐसे भक्त का दूसरों के साथ और संसार के साथ संबंध कैसा होता है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जो भीतर से तृप्त है, उसे बाहर की कमी विचलित नहीं करती।
निरन्तर जुड़ाव योगी की पहचान है, कभी-कभार का उत्साह नहीं।
वश में की हुई इन्द्रियाँ साधक की स्थिर पूँजी हैं।
दृढ़ निश्चय साधना को दिशा और गति देता है।
मन और बुद्धि का अर्पण भक्ति का सबसे सम्पूर्ण रूप है।
भक्त वही है जिसका जीवन और विचार दोनों भगवान् की ओर मुड़ गए हों।
भगवान् का प्रिय बनना गुणों की ओर बढ़ने का परिणाम है, किसी पद का नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
‘सन्तुष्टः सततम्’ का क्या अर्थ है?
‘यतात्मा’ से क्या तात्पर्य है?
‘दृढनिश्चयः’ का साधना में क्या महत्त्व है?
‘अर्पितमनोबुद्धिः’ का क्या अर्थ है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: