भक्त के गुण किसी विशेष वेश या अनुष्ठान से नहीं, बल्कि व्यवहार, भाव और मन की स्थिरता से पहचाने जाते हैं। गीता में सच्चा भक्त वह है जो सबके प्रति मित्रभाव रखता है, परिस्थितियों में संतुलित रहता है, अपने कर्म में कुशल होते हुए भी फल की अपेक्षा नहीं रखता और अपना मन भगवान् में स्थिर रखता है। ये गुण भक्ति के स्वाभाविक फल हैं और अभ्यास से विकसित किए जा सकते हैं।
गीता 12.13 में भक्त किसी से द्वेष नहीं करता, मित्रभाव और करुणा रखता है, ममता तथा अहंकार से मुक्त रहता है, सुख-दुःख में सम रहता है और क्षमा करता है, और गीता 12.14 में सदा संतुष्ट, संयमी और दृढ़ निश्चयी भक्त भगवान् को प्रिय है। गीता 12.16 में भक्त अपेक्षा-रहित, शुद्ध और कर्म में कुशल होता है, और गीता 12.17 में वह हर्ष, द्वेष, शोक और कामना से परे रहकर भक्ति में स्थित रहता है।
गीता 12.19 कहती है कि भक्त निन्दा-स्तुति में सम, वाणी में संयमी और जो मिले उसमें संतुष्ट रहता है, और गीता 11.55 में जो भगवान् के लिए कर्म करता है, आसक्ति छोड़ता है और किसी से वैर नहीं रखता, वही उन्हें प्राप्त करता है। गीता 7.17 और 7.18 के अनुसार ज्ञान से युक्त, सदा भगवान् में स्थित और अनन्य भक्ति वाला भक्त चारों प्रकार के भक्तों में श्रेष्ठ है, और भगवान् तथा भक्त का प्रेम परस्पर होता है।