भक्ति एक ऐसा गुण है जिसे नियमित छोटे अभ्यास से जीवित रखा जाता है: प्रेम, विश्वास और समर्पण के साथ ईश्वर से जुड़े रहना। कई लोग सोचते हैं कि भक्ति के लिए बड़े अनुष्ठान या विशेष समय चाहिए, और व्यस्त जीवन में वे उसे टालते रहते हैं। गीता भक्ति को रोज़ के कर्म, सेवा और स्मरण में उतारने का सरल मार्ग दिखाती है, इसलिए यह गुण हर किसी के लिए सुलभ है।
गीता 9.34 और 18.65 चार सरल साधन बताती हैं: मन भगवान् में लगाओ, भक्त बनो, पूजन करो और नमन करो, और दिन की शुरुआत तथा अंत स्मरण से करने की सलाह देती हैं। गीता 9.26 कहती है कि पत्र, पुष्प, फल और जल भी भक्ति से अर्पित हों तो भगवान् स्वीकार करते हैं, क्योंकि वे वस्तु का मूल्य नहीं, भाव देखते हैं, इसलिए बड़े साधनों की प्रतीक्षा न करें।
गीता 6.30 और 6.31 में जो सबमें भगवान् को और सबको भगवान् में देखता है, वह उनसे कभी अलग नहीं होता, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का अंश देखकर व्यवहार करने से संबंध अधिक करुणामय और निष्पक्ष बनते हैं। गीता 11.55 में जो भगवान् के लिए कर्म करता है, आसक्ति छोड़ता है और किसी से वैर नहीं रखता, वही उन्हें प्राप्त करता है, और गीता 11.54 अनन्य भक्ति को ईश्वर तक पहुँचने का निश्चित मार्ग बताती है। गीता 6.47 के अनुसार प्रेमपूर्वक भजन करने वाला योगियों में सर्वोत्तम है।