भगवद्गीता 18.68 — परम गुह्य को भक्तों में कहने वाला निःसन्देह भगवान् को पाता है
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ १८.६८ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
जो मनुष्य इस परम गोपनीय गीता-उपदेश को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझमें परम भक्ति करके निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| यः | जो |
| इमम् | इस |
| परमम् गुह्यम् | परम गोपनीय उपदेश को |
| मद्भक्तेषु | मेरे भक्तों में |
| अभिधास्यति | कहेगा |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| भक्तिम् | भक्ति को |
| मयि | मुझमें |
| पराम् | परम |
| कृत्वा | करके |
| माम् एव | मुझे ही |
| एष्यति | प्राप्त होगा |
| असंशयः | निःसन्देह |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| यः | जो | भक्तिम् | भक्ति को |
| इमम् | इस | मयि | मुझमें |
| परमम् गुह्यम् | परम गोपनीय उपदेश को | पराम् | परम |
| मद्भक्तेषु | मेरे भक्तों में | कृत्वा | करके |
| अभिधास्यति | कहेगा | माम् एव | मुझे ही |
| एष्यति | प्राप्त होगा | ||
| असंशयः | निःसन्देह | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो इस परम गुह्य ज्ञान को उनके भक्तों के बीच कहेगा, वह उनके प्रति परा भक्ति करके निःसंदेह उन्हीं को प्राप्त करेगा।
भावार्थ
ज्ञान बाँटने की महिमा
पिछले श्लोक में बताया गया कि यह ज्ञान किसे नहीं कहना चाहिए। अब श्रीकृष्ण बताते हैं कि इसे किसे कहना श्रेष्ठ है और उसका फल क्या है। वे कहते हैं कि जो इस परम गुह्य उपदेश को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा, और इसमें कोई संशय नहीं।
शब्दों का अर्थ
इदं परमं गुह्यम् (This supreme secret): यहाँ विशेष रूप से पिछले श्लोकों में बताया गया शरणागति का उपदेश अभिप्रेत है, और परंपरा में पूरी गीता का सार भी।
मद्भक्तेषु अभिधास्यति (Will teach among My devotees): जो ग्रहणशील और श्रद्धालु लोगों के बीच इसे कहेगा। यह पिछले श्लोक की मर्यादा का सकारात्मक पक्ष है कि सही पात्रों के बीच ज्ञान बाँटना उचित है।
भक्तिं मयि परां कृत्वा (Having done supreme devotion to Me): इस कार्य की विशेषता यह है कि वह परा भक्ति का रूप बन जाता है। ज्ञान बाँटना स्वयं एक भक्ति का कर्म है।
मामेवैष्यत्यसंशयः (Will come to Me alone, without doubt): वह निःसंदेह परमात्मा को पाता है। श्रीकृष्ण यहाँ फिर निश्चयपूर्वक आश्वासन देते हैं।
ज्ञान-दान की विशिष्टता
धन, भोजन और वस्त्र का दान महत्त्वपूर्ण है, पर ज्ञान का दान सबसे ऊँचा माना गया है, क्योंकि वह दूसरे के भीतर प्रकाश जलाता है। जब कोई व्यक्ति सीखे हुए सत्य को दूसरों के साथ बाँटता है, तब वह स्वयं भी उसे अधिक गहराई से समझता है। इस प्रकार बाँटना और सीखना एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं।
विनम्रता का संतुलन
ज्ञान बाँटने का अर्थ अपने को श्रेष्ठ दिखाना या उपदेशक बन बैठना नहीं है। यहाँ भाव भक्ति का है, अहंकार का नहीं। जो सच्चे हृदय से, सेवा-भाव से बाँटता है, वही इसका अधिकारी है। जो बाँटते हुए मैं ज्ञानी हूँ का भाव रखता है, वह इस भाव से दूर है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
हम सब किसी न किसी रूप में शिक्षक हैं, चाहे परिवार में, मित्रों में या कार्यस्थल पर। जो अच्छी बात हमने सीखी है, उसे विनम्रता और प्रेम से योग्य लोगों के साथ बाँटना एक सेवा है। यह बाँटना केवल उपदेश नहीं, अपने जीवन के उदाहरण से भी हो सकता है।
ज्ञान बाँटने की महिमा
पिछले श्लोक में बताया गया कि यह ज्ञान किसे नहीं कहना चाहिए। अब श्रीकृष्ण बताते हैं कि इसे किसे कहना श्रेष्ठ है और उसका फल क्या है। वे कहते हैं कि जो इस परम गुह्य उपदेश को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा, और इसमें कोई संशय नहीं।
शब्दों का अर्थ
इदं परमं गुह्यम् (This supreme secret): यहाँ विशेष रूप से पिछले श्लोकों में बताया गया शरणागति का उपदेश अभिप्रेत है, और परंपरा में पूरी गीता का सार भी।
मद्भक्तेषु अभिधास्यति (Will teach among My devotees): जो ग्रहणशील और श्रद्धालु लोगों के बीच इसे कहेगा। यह पिछले श्लोक की मर्यादा का सकारात्मक पक्ष है कि सही पात्रों के बीच ज्ञान बाँटना उचित है।
भक्तिं मयि परां कृत्वा (Having done supreme devotion to Me): इस कार्य की विशेषता यह है कि वह परा भक्ति का रूप बन जाता है। ज्ञान बाँटना स्वयं एक भक्ति का कर्म है।
मामेवैष्यत्यसंशयः (Will come to Me alone, without doubt): वह निःसंदेह परमात्मा को पाता है। श्रीकृष्ण यहाँ फिर निश्चयपूर्वक आश्वासन देते हैं।
ज्ञान-दान की विशिष्टता
धन, भोजन और वस्त्र का दान महत्त्वपूर्ण है, पर ज्ञान का दान सबसे ऊँचा माना गया है, क्योंकि वह दूसरे के भीतर प्रकाश जलाता है। जब कोई व्यक्ति सीखे हुए सत्य को दूसरों के साथ बाँटता है, तब वह स्वयं भी उसे अधिक गहराई से समझता है। इस प्रकार बाँटना और सीखना एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं।
विनम्रता का संतुलन
ज्ञान बाँटने का अर्थ अपने को श्रेष्ठ दिखाना या उपदेशक बन बैठना नहीं है। यहाँ भाव भक्ति का है, अहंकार का नहीं। जो सच्चे हृदय से, सेवा-भाव से बाँटता है, वही इसका अधिकारी है। जो बाँटते हुए मैं ज्ञानी हूँ का भाव रखता है, वह इस भाव से दूर है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
हम सब किसी न किसी रूप में शिक्षक हैं, चाहे परिवार में, मित्रों में या कार्यस्थल पर। जो अच्छी बात हमने सीखी है, उसे विनम्रता और प्रेम से योग्य लोगों के साथ बाँटना एक सेवा है। यह बाँटना केवल उपदेश नहीं, अपने जीवन के उदाहरण से भी हो सकता है।
आगे का विषय
ज्ञान बाँटने की महिमा स्पष्ट हुई। अब श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञान-प्रचारक के प्रति अपने अपार स्नेह को बताते हैं और कहते हैं कि उससे बढ़कर उन्हें प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
सबसे सुन्दर दान वह ज्ञान है जो दूसरे का जीवन दिशा दे।
भक्तों के बीच चर्चा से साधना की ज्योति तेज होती है।
जो सिखाते हुए स्वयं भक्ति में स्थिर होता है, वही सच्चा शिक्षक है।
ईश्वर-प्राप्ति का आश्वासन साधक के सन्देहों को शान्त करता है।
ज्ञान साझा करना भी सेवा का ही रूप है।
उपदेश देने वाला भी भीतर से सीखने वाला रहता है।
ज्ञान तभी सार्थक बँटता है जब देने वाले का भाव शुद्ध हो।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'परमं गुह्यम्' से क्या तात्पर्य है?
'मद्भक्तेषु अभिधास्यति' का क्या अर्थ है?
'असंशयः' का क्या महत्त्व है?
क्या ज्ञान बाँटने के लिए विद्वान होना आवश्यक है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: