सेवा का अर्थ केवल किसी की मदद करना नहीं, बल्कि बिना अपेक्षा, विनम्रता और आदर के साथ किसी के कल्याण में योगदान देना है। सेवा हमें अपने सीमित स्वार्थ से बाहर निकालती है, संबंधों को गहरा करती है और अहंकार को घटाती है। गीता सेवा को कर्म, ज्ञान और भक्ति, तीनों के साथ जोड़ती है, इसलिए वह किसी एक रूप तक सीमित नहीं।
गीता 18.69 कहती है कि मनुष्यों में भगवान् को सबसे प्रिय सेवा वही है जो गीता के ज्ञान को भक्तिपूर्वक दूसरों तक पहुँचाती है, और गीता 18.68 के अनुसार भक्ति से ज्ञान बाँटना स्वयं भगवान् की सेवा है। गीता 4.34 में योग्य गुरु से ज्ञान विनम्रता, सेवा और जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों के माध्यम से मिलता है, इसलिए सेवा सीखने का भी मार्ग है।
गीता 3.11 बताती है कि सृष्टि परस्पर निर्भरता और सहयोग पर चलती है और कर्तव्य-भाव से किया गया पारस्परिक पोषण सबके कल्याण का कारण बनता है, और गीता 5.25 के अनुसार आत्मशुद्धि और लोककल्याण दोनों मिलकर परम शांति की ओर ले जाते हैं। गीता 17.14 बड़ों और गुरुजनों के आदर, सरलता और अहिंसा को शरीर का तप कहती है, और गीता 18.44 बताती है कि समाज के हर ईमानदार कार्य का अपना महत्त्व है।