गुरु-शिष्य परम्परा केवल पढ़ाने और पढ़ने का संबंध नहीं, बल्कि विश्वास, विनम्रता और मार्गदर्शन की वह धारा है जिससे ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी तक पहुँचता है। आज जानकारी हर जगह उपलब्ध है, पर समझ किससे लें, कैसे लें और उसे जीवन में कैसे उतारें, यह विवेक कम दिखता है। गीता स्वयं गुरु और शिष्य के संवाद के रूप में प्रस्तुत है, इसलिए यह परम्परा इसके केंद्र में है।
गीता 2.7 में अर्जुन अपनी बुद्धि के भ्रम को स्वीकार कर शिष्य भाव से शरण लेते हैं, यानी सच्चे शिष्य की शुरुआत भ्रम की विनम्र स्वीकृति से होती है, और गीता 2.10 में दोनों सेनाओं के बीच कृष्ण की शांत प्रसन्नता संकट में पड़े शिष्य के लिए आश्वासन बनती है। गीता 4.1 और 4.2 बताती हैं कि दिव्य ज्ञान प्राचीन परम्परा से योग्य शिष्यों तक पहुँचता है और परम्परा टूटने पर शुद्ध ज्ञान लुप्त हो सकता है।
गीता 18.67 कहती है कि ज्ञान उसे देना चाहिए जिसमें अनुशासन, भक्ति, सुनने की इच्छा और श्रद्धा हो, और गीता 18.68 के अनुसार ज्ञान को भक्ति से दूसरों तक पहुँचाना स्वयं सेवा है। गीता 13.26 में जो अभी स्वयं नहीं जानते, वे भी श्रद्धा से सुनकर आगे बढ़ सकते हैं, और गीता 18.75 में संजय व्यासजी की कृपा से गीता-ज्ञान सुनने का सौभाग्य बताते हैं, जो गुरु-परम्परा और कृपा की ओर संकेत करता है। अपने जीवन के मार्गदर्शकों के प्रति कृतज्ञ रहें।