भगवद्गीता 8.7 — सब कालों में स्मरण और कर्तव्य-युद्ध साथ-साथ: मन-बुद्धि का अर्पण
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ८.७ ॥
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इसलिए तू सब समय मेरा निरन्तर स्मरण कर और युद्ध (अपना कर्तव्य) भी कर। मुझमें मन और बुद्धि अर्पित कर देने पर तू निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| तस्मात् | इसलिए |
| सर्वेषु कालेषु | सब कालों में |
| माम् | मेरा |
| अनुस्मर | निरन्तर स्मरण कर |
| युध्य | युद्ध कर |
| च | और |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| मयि | मुझमें |
| अर्पितमनोबुद्धिः | मन-बुद्धि अर्पित करने वाला |
| माम् | मुझे |
| एव | ही |
| एष्यसि | प्राप्त होगा |
| असंशयम् | निःसन्देह |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| तस्मात् | इसलिए | मयि | मुझमें |
| सर्वेषु कालेषु | सब कालों में | अर्पितमनोबुद्धिः | मन-बुद्धि अर्पित करने वाला |
| माम् | मेरा | माम् | मुझे |
| अनुस्मर | निरन्तर स्मरण कर | एव | ही |
| युध्य | युद्ध कर | एष्यसि | प्राप्त होगा |
| च | और | असंशयम् | निःसन्देह |
विस्तृत विवरण
परिचय
पिछले श्लोक में भगवान ने मन के भाव और गति के संबंध को बताया। अब वे उसी से एक सीधा, व्यावहारिक उपदेश निकालते हैं, जो अर्जुन की वर्तमान परिस्थिति के लिए भी बहुत उपयुक्त है।
भावार्थ
श्लोक का भाव: कर्म और स्मरण का समन्वय
भगवान कहते हैं कि इसलिए तू सभी कालों में मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मुझमें मन और बुद्धि को अर्पित करने वाला तू निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा। यह श्लोक गीता के सबसे व्यावहारिक उपदेशों में से एक है, क्योंकि यह कर्म और भक्ति को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बताता है।
मुख्य शब्दों का मर्म
तस्मात् — इसलिए: यह शब्द पिछले श्लोक के नियम से जुड़ता है। यदि अंतकाल का भाव जीवन भर के अभ्यास से बनता है, तो स्पष्ट निष्कर्ष यह है कि स्मरण को किसी अंतिम घड़ी के लिए टालना नहीं चाहिए। उसे अभी से और निरंतर करना चाहिए।
सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर — सभी कालों में मेरा स्मरण कर: 'सर्वेषु कालेषु' का अर्थ है हर समय। भगवान यहाँ स्मरण को किसी विशेष समय या स्थान तक सीमित नहीं करते। चाहे सुख हो या दुःख, काम हो या विश्राम, स्मरण की धारा बहती रहे। 'अनुस्मर' शब्द निरंतर पीछे-पीछे चलने वाले स्मरण का संकेत देता है।
युध्य च — और युद्ध भी कर: यह वाक्य अर्जुन की परिस्थिति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। अर्जुन युद्ध छोड़कर संन्यास की ओर जाना चाहते थे। भगवान स्पष्ट करते हैं कि कर्तव्य का त्याग आवश्यक नहीं। युद्ध जैसे कठिन कर्म के बीच भी स्मरण संभव है। इस प्रकार गीता दिखाती है कि आध्यात्मिकता का अर्थ कर्तव्य से भागना नहीं, कर्तव्य में रहकर जुड़ना है।
मय्यर्पितमनोबुद्धिः — मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर देने वाला: इसका अर्थ है कि हाथों से कर्म चलता रहे, पर मन और बुद्धि का केंद्र परमात्मा में रहे। मन जो चाहता है और बुद्धि जो निर्णय लेती है, दोनों उसी की ओर लगे हों।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
कर्मयोग का सार: यह श्लोक पूरी गीता के संदेश का संक्षेप है। जीवन में कर्म भी आवश्यक है और भक्ति भी, और दोनों का समन्वय ही संतुलित मार्ग है। जैसे कोई माँ घर के काम करते हुए भी अपने बच्चे को मन में रखती है, वैसे ही साधक संसार के काम करते हुए भगवान को मन में रखता है।
असंशयम् — निःसंदेह: भगवान फिर आश्वासन देते हैं कि इस मार्ग में कोई संदेह नहीं। यह दृढ़ता साधक को आत्मविश्वास देती है कि वह गृहस्थ या कर्मक्षेत्र में रहकर भी लक्ष्य तक पहुँच सकता है।
अर्जुन के लिए विशेष संदेश
अर्जुन के लिए 'युध्य च' शब्द का एक और अर्थ है। वह अपने स्वधर्म को छोड़ने की ओर झुक रहा था, और भगवान उसे बताते हैं कि स्वधर्म का पालन ही उसकी साधना बन सकता है। इसलिए यह श्लोक केवल योद्धाओं के लिए नहीं, हर उस व्यक्ति के लिए है जो अपने कर्तव्य और अपनी आध्यात्मिक आकांक्षा के बीच द्वंद्व अनुभव करता है।
अर्पण का अर्थ: मन और बुद्धि को अर्पित करने का अर्थ यह नहीं कि सोचना बंद कर दिया जाए। इसका अर्थ है कि हमारे विचार और निर्णय जिस दिशा में जाएँ, उसका लक्ष्य परमात्मा की प्रसन्नता और सबका कल्याण हो। यह समर्पण बुद्धि को निष्क्रिय नहीं, बल्कि शुद्ध करता है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
काम के बीच स्मरण: कार्यालय, घर या विद्यालय में अपने कर्तव्य निभाते हुए बीच-बीच में कुछ क्षण मौन होकर प्रभु या अपने श्रेष्ठ आदर्श का स्मरण करें। यह छोटा अभ्यास मन को स्थिर और काम को निर्मल बनाता है।
कर्तव्य से पलायन नहीं: जब जीवन कठिन लगे तो भाग जाने की इच्छा स्वाभाविक है, पर गीता का मार्ग है कि कठिन परिस्थिति में भी कर्तव्य निभाते हुए भीतर से जुड़े रहना। यही सच्ची शक्ति है।
श्लोक का भाव: कर्म और स्मरण का समन्वय
भगवान कहते हैं कि इसलिए तू सभी कालों में मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मुझमें मन और बुद्धि को अर्पित करने वाला तू निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा। यह श्लोक गीता के सबसे व्यावहारिक उपदेशों में से एक है, क्योंकि यह कर्म और भक्ति को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बताता है।
मुख्य शब्दों का मर्म
तस्मात् — इसलिए: यह शब्द पिछले श्लोक के नियम से जुड़ता है। यदि अंतकाल का भाव जीवन भर के अभ्यास से बनता है, तो स्पष्ट निष्कर्ष यह है कि स्मरण को किसी अंतिम घड़ी के लिए टालना नहीं चाहिए। उसे अभी से और निरंतर करना चाहिए।
सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर — सभी कालों में मेरा स्मरण कर: 'सर्वेषु कालेषु' का अर्थ है हर समय। भगवान यहाँ स्मरण को किसी विशेष समय या स्थान तक सीमित नहीं करते। चाहे सुख हो या दुःख, काम हो या विश्राम, स्मरण की धारा बहती रहे। 'अनुस्मर' शब्द निरंतर पीछे-पीछे चलने वाले स्मरण का संकेत देता है।
युध्य च — और युद्ध भी कर: यह वाक्य अर्जुन की परिस्थिति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। अर्जुन युद्ध छोड़कर संन्यास की ओर जाना चाहते थे। भगवान स्पष्ट करते हैं कि कर्तव्य का त्याग आवश्यक नहीं। युद्ध जैसे कठिन कर्म के बीच भी स्मरण संभव है। इस प्रकार गीता दिखाती है कि आध्यात्मिकता का अर्थ कर्तव्य से भागना नहीं, कर्तव्य में रहकर जुड़ना है।
मय्यर्पितमनोबुद्धिः — मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर देने वाला: इसका अर्थ है कि हाथों से कर्म चलता रहे, पर मन और बुद्धि का केंद्र परमात्मा में रहे। मन जो चाहता है और बुद्धि जो निर्णय लेती है, दोनों उसी की ओर लगे हों।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
कर्मयोग का सार: यह श्लोक पूरी गीता के संदेश का संक्षेप है। जीवन में कर्म भी आवश्यक है और भक्ति भी, और दोनों का समन्वय ही संतुलित मार्ग है। जैसे कोई माँ घर के काम करते हुए भी अपने बच्चे को मन में रखती है, वैसे ही साधक संसार के काम करते हुए भगवान को मन में रखता है।
असंशयम् — निःसंदेह: भगवान फिर आश्वासन देते हैं कि इस मार्ग में कोई संदेह नहीं। यह दृढ़ता साधक को आत्मविश्वास देती है कि वह गृहस्थ या कर्मक्षेत्र में रहकर भी लक्ष्य तक पहुँच सकता है।
अर्जुन के लिए विशेष संदेश
अर्जुन के लिए 'युध्य च' शब्द का एक और अर्थ है। वह अपने स्वधर्म को छोड़ने की ओर झुक रहा था, और भगवान उसे बताते हैं कि स्वधर्म का पालन ही उसकी साधना बन सकता है। इसलिए यह श्लोक केवल योद्धाओं के लिए नहीं, हर उस व्यक्ति के लिए है जो अपने कर्तव्य और अपनी आध्यात्मिक आकांक्षा के बीच द्वंद्व अनुभव करता है।
अर्पण का अर्थ: मन और बुद्धि को अर्पित करने का अर्थ यह नहीं कि सोचना बंद कर दिया जाए। इसका अर्थ है कि हमारे विचार और निर्णय जिस दिशा में जाएँ, उसका लक्ष्य परमात्मा की प्रसन्नता और सबका कल्याण हो। यह समर्पण बुद्धि को निष्क्रिय नहीं, बल्कि शुद्ध करता है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
काम के बीच स्मरण: कार्यालय, घर या विद्यालय में अपने कर्तव्य निभाते हुए बीच-बीच में कुछ क्षण मौन होकर प्रभु या अपने श्रेष्ठ आदर्श का स्मरण करें। यह छोटा अभ्यास मन को स्थिर और काम को निर्मल बनाता है।
कर्तव्य से पलायन नहीं: जब जीवन कठिन लगे तो भाग जाने की इच्छा स्वाभाविक है, पर गीता का मार्ग है कि कठिन परिस्थिति में भी कर्तव्य निभाते हुए भीतर से जुड़े रहना। यही सच्ची शक्ति है।
आगे का विषय
भगवान ने स्मरण और कर्म को साथ चलाने का मार्ग बताया। अब वे इस स्मरण को गहरा करने की विधि बताते हैं, जिसमें अभ्यास और एकाग्रता के साथ चित्त को परमपुरुष में लगाया जाता है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
साधना केवल पूजा के समय की नहीं, हर क्षण की है।
स्मरण का अर्थ कर्तव्य छोड़ना नहीं; कर्तव्य निभाते हुए स्मरण रखना है।
मन और बुद्धि को भगवान् में अर्पित करने से कर्म बोझ नहीं रहता।
जिसने सब कुछ अर्पित कर दिया, उसके लिए सन्देह का स्थान नहीं रहता।
संसार का कर्म और परमात्मा का स्मरण एक ही जीवन में एक साथ चल सकते हैं।
अर्पित भाव से किया गया संघर्ष भय और चिन्ता से मुक्त होता है।
निरन्तर स्मरण से मन कर्म की भागदौड़ में भी शान्त रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'मामनुस्मर युध्य च' का क्या आशय है?
क्या यह श्लोक संसार छोड़ने की बात कहता है?
'मय्यर्पितमनोबुद्धिः' का क्या अर्थ है?
'एष्यसि असंशयम्' का क्या भाव है?
इस श्लोक का व्यावहारिक सन्देश एक वाक्य में क्या है?
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