ईश्वर स्मरण पर भगवद्गीता

36 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

ईश्वर स्मरण पर भगवद्गीता के श्लोक 36 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

ईश्वर स्मरण का अर्थ दिन भर किसी मंत्र को दोहराते रहना नहीं, बल्कि जीवन के हर कर्म के बीच मन को बार-बार उस परम सत्ता की ओर लौटाना है। व्यस्तता में हम भूल जाते हैं कि कोई भीतरी आश्रय भी है, और तनाव में यही भूल हमें अकेला कर देती है। छोटा-सा नियमित स्मरण मन को स्थिर करता है और कठिन क्षणों में सहारा बनता है।

गीता 12.8 कहती है कि मन और बुद्धि दोनों को भगवान् में स्थापित करो, यानी विचार और निश्चय दोनों उनके अधीन हों, तब साधक उनमें ही स्थित रहता है। गीता 8.14 के अनुसार जो मन अन्यत्र न लगाकर नित्य निरंतर भगवान् का स्मरण करता है, उसके लिए वे सुलभ हो जाते हैं, और गीता 8.7 कर्तव्य छोड़े बिना निरंतर स्मरण के साथ कर्म करने की सीख देती है।

गीता 8.13 में ओंकार का जप और भगवान् का स्मरण करते हुए देह त्यागने वाला परम गति पाता है, और गीता 8.5 अंत समय के स्मरण को परम गति से जोड़ती है। गीता 8.6 बताती है कि जीवनभर जिस भाव में मन रमा रहता है, वही अंत समय में उभरता है, इसलिए स्मरण को आज का अभ्यास बनाएँ। गीता 9.14 नियमित नाम-स्मरण, कीर्तन या प्रार्थना की निरंतरता और दृढ़ता पर बल देती है, और गीता 6.14 शांत, निर्भय और संयमी होकर मन को स्थिर करने को कहती है।

इन श्लोकों से शुरू करें

सभी 36 श्लोक

8.10

मृत्यु और पुनर्जन्म

अंत समय में भक्ति और योगबल से भ्रूमध्य में प्राण स्थापित कर परम पुरुष की प्राप्ति

भक्ति और योगबल से स्थिर मन अंतिम क्षण में भी परम पुरुष तक पहुँचा देता है।

गीता में कहाँ

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार ईश्वर-स्मरण का अभ्यास कैसे शुरू करें?
छोटे नियमित स्मरण से। गीता 8.7 में कर्तव्य छोड़े बिना, कर्म करते हुए भी भीतर से स्मरण और समर्पण का भाव रखने की सीख है, और गीता 9.14 में दिन में नियमित समय निकालकर नाम-स्मरण, कीर्तन या प्रार्थना की निरंतरता बताई गई है। कार्य के बीच मन को बार-बार ईश्वर की ओर लौटाएँ।
गीता 12.8 में मन और बुद्धि दोनों को ईश्वर में लगाने का क्या अर्थ है?
गीता 12.8 के अनुसार साधक मन और बुद्धि दोनों को भगवान् में स्थापित करे; जब विचार और निश्चय दोनों उनके अधीन हो जाते हैं, तब वह निःसंदेह उनमें ही स्थित रहता है। दिनभर के विचारों और निर्णयों में भगवान् की स्मृति रखें; मन और बुद्धि जहाँ टिकती हैं, जीवन वहीं बसता है।
गीता 8.14 के अनुसार निरंतर स्मरण से भगवान् सुलभ कैसे होते हैं?
गीता 8.14 कहती है कि जो साधक मन को अन्यत्र न लगाकर नित्य और निरंतर भगवान् का स्मरण करता है, उसके लिए भगवान् सुलभ हो जाते हैं। इसलिए स्मरण को केवल विशेष समय तक सीमित न रखें; दिनचर्या के कामों के बीच भी बार-बार मन को ईश्वर की ओर लौटाने की आदत डालें।
गीता 8.13 में ॐ के उच्चारण और स्मरण का क्या महत्व है?
गीता 8.13 के अनुसार ओंकार का जप और भगवान् का स्मरण करते हुए देह त्यागने वाला साधक परम गति को प्राप्त होता है। इसलिए ॐ का जप या किसी पवित्र नाम का स्मरण नियमित अभ्यास बनाएँ, ताकि कठिन क्षणों में भी मन उसी की ओर लौट सके। ऐसा अभ्यास अंतिम क्षण को भी पवित्र बनाता है।
क्या अंत समय का स्मरण पहले के अभ्यास के बिना संभव है?
गीता 8.6 बताती है कि जीवनभर जिस भाव में मन रमा रहता है, वही अंत समय में उभरता है। इसलिए गीता 8.5 के अंत समय के स्मरण के लिए भी रोज़ का अभ्यास ज़रूरी है। अपनी रोज़ की सोच, संगति और आदतों को सावधानी से चुनें, क्योंकि वही जीवन के अंतिम भाव को आकार देती हैं।

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