भगवद्गीता 10.17 — मैं आपका चिन्तन किन-किन भावों में करूँ?
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १०.१७ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
हे योगेश्वर! मैं सदा आपका चिन्तन करता हुआ आपको कैसे जानूँ? और हे भगवन्! मैं आपका किन-किन भावों (रूपों) में चिन्तन करूँ?
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| कथम् | कैसे |
| विद्याम् | जानूँ |
| अहम् | मैं |
| योगिन् | हे योगेश्वर |
| त्वाम् | आपको |
| सदा | सदा |
| परिचिन्तयन् | चिन्तन करता हुआ |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| केषु केषु | किन-किन |
| च | और |
| भावेषु | भावों/रूपों में |
| चिन्त्यः | चिन्तन करने योग्य |
| असि | हैं |
| भगवन् | हे भगवन् |
| मया | मेरे द्वारा |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| कथम् | कैसे | केषु केषु | किन-किन |
| विद्याम् | जानूँ | च | और |
| अहम् | मैं | भावेषु | भावों/रूपों में |
| योगिन् | हे योगेश्वर | चिन्त्यः | चिन्तन करने योग्य |
| त्वाम् | आपको | असि | हैं |
| सदा | सदा | भगवन् | हे भगवन् |
| परिचिन्तयन् | चिन्तन करता हुआ | मया | मेरे द्वारा |
विस्तृत विवरण
परिचय
विभूतियों को जानने की प्रार्थना के बाद अर्जुन का प्रश्न अब साधना की ओर मुड़ता है. वह जानना चाहता है कि निरंतर चिंतन करते हुए वह भगवान को कैसे पहचाने और जीवन में किन-किन भावों में उनका ध्यान करे.
भावार्थ
चिंतन की साधना का प्रश्न
यह श्लोक अर्जुन की जिज्ञासा को केवल ज्ञान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे साधना से जोड़ देता है. वह केवल यह नहीं पूछ रहा कि भगवान कौन हैं. वह यह पूछ रहा है कि मैं उनका स्मरण कैसे करूँ.
योगिन् — हे योगी: अर्जुन भगवान को योगी कहकर पुकारता है, अर्थात सब योगों और शक्तियों के स्वामी, जो स्वयं योग के आदर्श हैं.
सदा परिचिन्तयन् — सदा चिंतन करता हुआ: अर्जुन निरंतर स्मरण का संकल्प रखता है. उसकी इच्छा है कि चिंतन कभी टूटे नहीं. परंतु निराकार, अनंत और असीम का चिंतन आरंभ में कठिन होता है, इसलिए वह मार्ग पूछता है.
कथं विद्याम् — मैं आपको कैसे जानूँ: यहाँ जानना केवल बौद्धिक जानकारी नहीं, बल्कि पहचानना और अनुभव करना है.
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि — किन-किन भावों में आपका चिंतन करूँ: अर्जुन व्यावहारिक आधार माँगता है. सामान्य मन को ऐसे आलंबन चाहिए जिनसे वह परमात्मा तक पहुँच सके. प्रकृति, गुण, शक्ति और श्रेष्ठता के रूप ऐसे ही आलंबन हैं.
साधना में आलंबन का महत्व
असीम को सीधे पकड़ना कठिन है. इसलिए गीता यहाँ बताती है कि मन को ऐसे दृश्य और परिचित आधार चाहिए जिनमें श्रेष्ठता दिखे. जब हम सूर्य के तेज, किसी महान गुण या सुंदर रचना में दिव्यता का स्मरण करते हैं, तब हमारा चिंतन जीवन के दैनिक अनुभवों से जुड़ जाता है. आगे के श्लोकों में भगवान इसी प्रश्न का उत्तर देंगे.
हमारे जीवन के लिए संदेश
व्यावहारिक प्रश्न पूछना: आध्यात्मिकता को जीवन में उतारने के लिए केवल सिद्धांत नहीं, यह भी जानना आवश्यक है कि उसे दैनिक जीवन में कैसे अपनाया जाए.
अपने स्तर के अनुसार मार्ग: हर साधक का मन अलग होता है. जो आलंबन हमारे मन को शांत और भाव से भरे, उसी से आरंभ करना स्वाभाविक है.
चिंतन की साधना का प्रश्न
यह श्लोक अर्जुन की जिज्ञासा को केवल ज्ञान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे साधना से जोड़ देता है. वह केवल यह नहीं पूछ रहा कि भगवान कौन हैं. वह यह पूछ रहा है कि मैं उनका स्मरण कैसे करूँ.
योगिन् — हे योगी: अर्जुन भगवान को योगी कहकर पुकारता है, अर्थात सब योगों और शक्तियों के स्वामी, जो स्वयं योग के आदर्श हैं.
सदा परिचिन्तयन् — सदा चिंतन करता हुआ: अर्जुन निरंतर स्मरण का संकल्प रखता है. उसकी इच्छा है कि चिंतन कभी टूटे नहीं. परंतु निराकार, अनंत और असीम का चिंतन आरंभ में कठिन होता है, इसलिए वह मार्ग पूछता है.
कथं विद्याम् — मैं आपको कैसे जानूँ: यहाँ जानना केवल बौद्धिक जानकारी नहीं, बल्कि पहचानना और अनुभव करना है.
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि — किन-किन भावों में आपका चिंतन करूँ: अर्जुन व्यावहारिक आधार माँगता है. सामान्य मन को ऐसे आलंबन चाहिए जिनसे वह परमात्मा तक पहुँच सके. प्रकृति, गुण, शक्ति और श्रेष्ठता के रूप ऐसे ही आलंबन हैं.
साधना में आलंबन का महत्व
असीम को सीधे पकड़ना कठिन है. इसलिए गीता यहाँ बताती है कि मन को ऐसे दृश्य और परिचित आधार चाहिए जिनमें श्रेष्ठता दिखे. जब हम सूर्य के तेज, किसी महान गुण या सुंदर रचना में दिव्यता का स्मरण करते हैं, तब हमारा चिंतन जीवन के दैनिक अनुभवों से जुड़ जाता है. आगे के श्लोकों में भगवान इसी प्रश्न का उत्तर देंगे.
हमारे जीवन के लिए संदेश
व्यावहारिक प्रश्न पूछना: आध्यात्मिकता को जीवन में उतारने के लिए केवल सिद्धांत नहीं, यह भी जानना आवश्यक है कि उसे दैनिक जीवन में कैसे अपनाया जाए.
अपने स्तर के अनुसार मार्ग: हर साधक का मन अलग होता है. जो आलंबन हमारे मन को शांत और भाव से भरे, उसी से आरंभ करना स्वाभाविक है.
आगे का विषय
अर्जुन ने चिंतन के मार्ग और भावों के बारे में पूछा. अब वह अपनी प्रार्थना को दोहराकर उसे और मार्मिक बनाता है, और बताता है कि भगवान की वाणी को सुनकर उसे तृप्ति ही नहीं होती.
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
मन को टिकाने के लिए उसे एक सुन्दर आलम्बन चाहिए।
स्पष्ट प्रश्न से ही स्पष्ट मार्गदर्शन मिलता है।
जो योग का स्वामी है, वही साधक को मार्ग दिखा सकता है।
ईश्वर का चिन्तन भावों के माध्यम से सरल हो जाता है।
निरन्तर स्मरण साधना का प्राण है।
जो पूछना जानता है, वही सीखना भी जानता है।
अध्यात्म तब सार्थक है जब वह जीवन में उतरे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'योगिन्' सम्बोधन क्यों?
'परिचिन्तयन्' का क्या भाव है?
'केषु केषु भावेषु' से अर्जुन क्या पूछ रहे हैं?
अर्जुन का यह प्रश्न साधकों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: