जो सब कामनाएँ त्यागकर आत्मा में संतुष्ट रहता है
जो मन की कामनाओं को छोड़कर आत्मा में ही संतोष पाता है, वही स्थिरबुद्धि पुरुष है।
जीवन में उपयोग: सुख की खोज को बाहरी वस्तुओं पर निर्भर रखने के बजाय भीतर के संतोष और आत्मिक स्थिरता की ओर मोड़ें।
5 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित
स्थितप्रज्ञ के गुण पर भगवद्गीता के श्लोक 5 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।
स्थितप्रज्ञ के गुण वे लक्षण हैं जिनसे पहचाना जाता है कि किसी की बुद्धि वास्तव में स्थिर है: वह कामनाओं के पीछे नहीं भागता, सुख-दुःख में संतुलित रहता है और राग, भय तथा क्रोध से मुक्त रहता है। ये गुण किसी जन्मजात विशेषता की तरह नहीं, बल्कि अभ्यास, विवेक और साक्षीभाव से धीरे-धीरे विकसित होते हैं। गीता ने इनका वर्णन आदर्श के रूप में किया है, ताकि हम अपने जीवन को उसकी ओर मोड़ सकें।
गीता 2.54 में अर्जुन आदर्श साधक के लक्षण पूछते हैं, और गीता 2.55 में उत्तर मिलता है कि जो मन की कामनाएँ छोड़कर आत्मा में ही संतोष पाता है, वही स्थिरबुद्धि है। गीता 2.56 में वह दुःख में विचलित और सुख में लालायित नहीं होता तथा राग, भय और क्रोध से मुक्त रहता है, इसलिए सुख और दुःख दोनों में भावनात्मक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करें और इन प्रवृत्तियों पर निगरानी रखें।
गीता 2.15 में जो द्वन्द्वों में विचलित नहीं होता और सुख-दुःख में सम रहता है, वही अमृतत्व का पात्र बनता है, इसलिए सफलता-असफलता और प्रशंसा-निंदा में भावनात्मक संतुलन का अभ्यास करें। गीता 14.23 में गुणातीत पुरुष साक्षी की भाँति रहता है और जानता है कि गुण ही अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त हैं, इसलिए क्रोध, लोभ या सुस्ती जैसी अवस्थाओं के उठने पर उनसे तुरंत बह न जाएँ, पहले साक्षी बनकर उन्हें देखें।
जो मन की कामनाओं को छोड़कर आत्मा में ही संतोष पाता है, वही स्थिरबुद्धि पुरुष है।
जीवन में उपयोग: सुख की खोज को बाहरी वस्तुओं पर निर्भर रखने के बजाय भीतर के संतोष और आत्मिक स्थिरता की ओर मोड़ें।
स्थितप्रज्ञ दुःख में विचलित और सुख में लालायित नहीं होता तथा राग, भय और क्रोध से मुक्त रहता है।
जीवन में उपयोग: सुख और दुःख दोनों में भावनात्मक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करें तथा राग, भय और क्रोध की प्रवृत्ति पर निगरानी रखें।
जो पुरुष द्वन्द्वों में विचलित नहीं होता और सुख-दुःख में समान रहता है, वही अमृतत्व अर्थात् मोक्ष का पात्र बनता है।
जीवन में उपयोग: सफलता-असफलता और प्रशंसा-निंदा में भावनात्मक संतुलन का अभ्यास करें, ताकि परिस्थितियाँ आपकी आंतरिक शांति न छीन सकें।
स्थितप्रज्ञ के गुण
कामनाओं से मुक्त मन अपने भीतर ही तृप्त हो जाता है।
स्थितप्रज्ञ के गुण
राग, भय और क्रोध से मुक्त मन ही स्थिर मन है।
स्थितप्रज्ञ के गुण
जो द्वन्द्वों में अडिग रहता है, वही अमरत्व का पात्र है।
स्थितप्रज्ञ के गुण
आदर्श को पहचानने से ही आदर्श की ओर यात्रा शुरू होती है।
स्थितप्रज्ञ के गुण
साक्षीभाव में स्थित व्यक्ति गुणों की हलचल से विचलित नहीं होता।
विषय
जीवन-क्षेत्र
गुण
आधुनिक संदर्भ
चुनौतियाँ