भगवद्गीता 14.24 — गुणातीत के लक्षण (३): सुख-दुःख, स्तुति-निन्दा और प्रिय-अप्रिय में समता

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ १४.२४ ॥

जो सुख-दुःख में सम है, अपने स्वरूप में स्थित है, मिट्टी, पत्थर और सोने को समान समझता है, प्रिय और अप्रिय में तुल्य रहता है, धैर्यवान् है तथा निन्दा और अपनी स्तुति में समान रहता है, वह गुणातीत है।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

समदुःखसुखः स्वस्थः
समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियः धीरः
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥

शब्दार्थ

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संस्कृत शब्द अर्थ
समदुःखसुखः सुख-दुःख में समान
स्वस्थः अपने स्वरूप में स्थित
सम समान दृष्टि वाला
लोष्ट-अश्म-काञ्चनः मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने में
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संस्कृत शब्द अर्थ
तुल्यप्रियाप्रियः प्रिय-अप्रिय में समान
धीरः धैर्यवान्
तुल्य-निन्दा-आत्मसंस्तुतिः निन्दा और अपनी प्रशंसा में समान
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
समदुःखसुखः सुख-दुःख में समान तुल्यप्रियाप्रियः प्रिय-अप्रिय में समान
स्वस्थः अपने स्वरूप में स्थित धीरः धैर्यवान्
सम समान दृष्टि वाला तुल्य-निन्दा-आत्मसंस्तुतिः निन्दा और अपनी प्रशंसा में समान
लोष्ट-अश्म-काञ्चनः मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने में

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गुणातीत के आचरण का वर्णन करते हैं कि वह सुख-दुःख में सम, अपने स्वरूप में स्थित, मिट्टी-पत्थर-सोने में समान दृष्टि वाला, प्रिय-अप्रिय तथा निंदा-स्तुति में तुल्य और धैर्यवान होता है।

भावार्थ

गुणातीत का आचरण: समता का जीवन

अर्जुन ने पूछा था कि गुणातीत का आचरण कैसा होता है। इस और अगले श्लोक में भगवान उसी का उत्तर देते हैं। यहाँ समता को केंद्र में रखकर कई लक्षण गिनाए गए हैं। ये सभी एक ही मूल अवस्था के अलग-अलग पहलू हैं।

समदुःखसुखः — सुख-दुःख में सम: जीवन में सुख और दुःख आते रहते हैं। गुणातीत दोनों में संतुलित रहता है। वह सुख में उछलता नहीं और दुःख में टूटता नहीं। इसका अर्थ भावनाहीन होना नहीं, बल्कि भावनाओं में बह न जाना है।

स्वस्थः — अपने में स्थित: 'स्वस्थ' का वास्तविक अर्थ है स्वयं में स्थित। उसकी प्रसन्नता बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं करती। वह अपने केंद्र में टिका हुआ है, इसलिए परिस्थितियाँ उसे भीतर से हिला नहीं पातीं।

समलोष्टाश्मकाञ्चनः — मिट्टी, पत्थर और सोने में समान: उसकी दृष्टि में वस्तुओं का मूल्य उसकी आंतरिक शांति को नहीं बदलता। वह सोने को पाकर अभिमान नहीं करता और मिट्टी के ढेले को देखकर तुच्छता नहीं मानता। वह वस्तुओं का उपयोग करता है, पर उनका गुलाम नहीं बनता।

तुल्यप्रियाप्रियः — प्रिय-अप्रिय में तुल्य: किसी प्रिय व्यक्ति या घटना को पाकर वह अति प्रसन्न नहीं होता और अप्रिय के आने पर विचलित नहीं होता। उसके भीतर राग और द्वेष की पकड़ ढीली हो गई है।

धीरः — धैर्यवान: धीर वह है जिसकी बुद्धि स्थिर रहती है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वह विवेक नहीं खोता।

तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः — निंदा और स्तुति में समान: प्रशंसा और आलोचना दोनों को वह समान भाव से सुनता है। प्रशंसा उसे फुलाती नहीं और निंदा उसे गिराती नहीं। वह दोनों में से जो सत्य हो उसे स्वीकार करता है और शेष को छोड़ देता है।

हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश

बाहरी मान्यता पर निर्भरता घटाना: आज हमारी प्रसन्नता का बड़ा भाग दूसरों की प्रतिक्रिया पर टिका है, जैसे प्रशंसा, लाइक या पहचान। यह श्लोक हमें भीतर से स्थिर होने की प्रेरणा देता है।

समता का अभ्यास: रोज़ किसी एक परिस्थिति में, चाहे वह प्रशंसा हो या आलोचना, स्वयं को देखने का प्रयास करें कि मेरे भीतर क्या हो रहा है, और उसे साक्षी भाव से देखें।

आगे का विषय

भगवान ने समता के अनेक रूप गिनाए। अब वे इस सूची को पूर्ण करते हुए गुणातीत की अंतिम पहचान और उसके कर्म के स्वरूप को बताते हैं।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

आध्यात्मिक
स्वस्थ स्थितप्रज्ञता समत्व
मनोवैज्ञानिक
भावनात्मक सन्तुलन आत्म-सम्मान की स्थिरता
ज्ञानयोग
समदर्शिता
साधना-दृष्टि
द्वन्द्वातीत साधना
नैतिक
धैर्य संयम
कर्मयोग
निष्काम दृष्टि
दार्शनिक
द्वैत से परे
शैक्षिक
गुणातीत के लक्षण
व्यावहारिक
सफलता-असफलता में सन्तुलन
प्रबन्धन
प्रतिक्रिया-नियन्त्रण भावनात्मक परिपक्वता
नेतृत्व
प्रशंसा-आलोचना में स्थिरता
सामाजिक
सम-व्यवहार
भक्ति-दृष्टि
भगवान् की इच्छा में सन्तोष
आत्मशुद्धि
अहंकार का शमन

सूत्र

स्वस्थ का अर्थ है अपने भीतर टिका हुआ होना।

सुख-दुःख में सम होना कठोर होना नहीं, गहराई में स्थिर होना है।

मिट्टी और सोने को समान देखना वस्तुओं की सीमा का बोध है।

निन्दा और स्तुति दोनों दूसरों की धारणा हैं, हमारा स्वरूप नहीं।

धैर्य वह शक्ति है जो भीतर की शान्ति को बाहर की हलचल से बचाती है।

पसन्द और नापसन्द से ऊपर उठने पर निर्णय स्पष्ट होते हैं।

भावनात्मक परिपक्वता वही है जो परिस्थिति से नहीं, स्वरूप से संचालित हो।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'स्वस्थ' का यहाँ क्या अर्थ है?
यहाँ स्वस्थ का अर्थ है अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहना, अर्थात् जो परिस्थितियों से नहीं, भीतर के स्थिर केन्द्र से जीता है।
मिट्टी, पत्थर और सोने को समान देखने का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ यह नहीं कि वह वस्तुओं का मूल्य नहीं जानता, बल्कि वह किसी वस्तु से आसक्त नहीं होता और उसकी शान्ति बाह्य धन पर निर्भर नहीं है।
निन्दा और स्तुति में समान रहने का क्या तात्पर्य है?
इसका तात्पर्य है कि दूसरों की प्रशंसा या आलोचना से उसकी आन्तरिक स्थिति नहीं डगमगाती, क्योंकि वह स्वयं को शरीर या प्रतिष्ठा से अलग जानता है।
'धीरः' शब्द का क्या महत्त्व है?
धीर का अर्थ है धैर्यवान् और स्थिर बुद्धि वाला। गुणातीत की यह समता हर परिस्थिति में स्थिर बनी रहती है।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
सुख-दुःख, मान-अपमान और पसन्द-नापसन्द में सन्तुलित रहने का अभ्यास करो, ताकि तुम्हारी शान्ति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर न रहे।

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