भगवद्गीता 14.25 — गुणातीत के लक्षण (४): मान-अपमान, मित्र-शत्रु में समता और सर्वारम्भ-त्याग

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ १४.२५ ॥

जो मान और अपमान में समान रहता है, मित्र और शत्रु के पक्ष में भी समान रहता है और सभी कर्मों के आरम्भ (कर्तापन के अभिमान) का त्यागी है, वह गुणातीत कहा जाता है।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

मानापमानयोः तुल्यः
तुल्यः मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी
गुणातीतः सः उच्यते ॥

शब्दार्थ

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संस्कृत शब्द अर्थ
मानापमानयोः मान और अपमान में
तुल्यः समान
मित्र-अरि-पक्षयोः मित्र और शत्रु के पक्ष में
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संस्कृत शब्द अर्थ
सर्वारम्भपरित्यागी सभी कर्मारम्भों, कर्तापन के अभिमान का त्यागी
गुणातीतः गुणों से परे
सः वह
उच्यते कहा जाता है
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
मानापमानयोः मान और अपमान में सर्वारम्भपरित्यागी सभी कर्मारम्भों, कर्तापन के अभिमान का त्यागी
तुल्यः समान गुणातीतः गुणों से परे
मित्र-अरि-पक्षयोः मित्र और शत्रु के पक्ष में सः वह
उच्यते कहा जाता है

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गुणातीत के लक्षणों को पूर्ण करते हुए बताते हैं कि वह मान-अपमान तथा मित्र-शत्रु के पक्ष में सम रहता है और सभी आरंभों का परित्याग करने वाला है, उसे ही गुणातीत कहा जाता है।

भावार्थ

गुणातीत के लक्षणों का समापन

पिछले श्लोक में भगवान ने समता के कई पक्ष बताए थे। इस श्लोक में वे दो और महत्त्वपूर्ण पक्ष जोड़ते हैं और फिर पूरे वर्णन को एक वाक्य में समेट देते हैं, 'गुणातीतः स उच्यते', अर्थात उसे ही गुणातीत कहा जाता है।

मानापमानयोः तुल्यः — मान-अपमान में समान: सम्मान मिलने पर वह फूलता नहीं और अपमान होने पर वह टूटता नहीं। अपमान की चोट अक्सर अहंकार पर लगती है। जिसका अहंकार शांत हो चुका है, उसे अपमान गहराई से नहीं छू पाता। इसी प्रकार सम्मान भी उसके अहंकार को पोषण नहीं देता।

तुल्यो मित्रारिपक्षयोः — मित्र और शत्रु के पक्ष में समान: मित्रों के प्रति उसका प्रेम और शत्रुओं के प्रति उसका द्वेष, दोनों में पक्षपात नहीं होता। वह सबके प्रति न्याय और करुणा का भाव रखता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह विवेक छोड़ देता है। वह उचित व्यवहार करता है, पर किसी के प्रति शत्रुता का भाव नहीं पालता।

सर्वारम्भपरित्यागी — सभी आरंभों का त्यागी: यह शब्द सबसे गहरा है। 'आरंभ' का अर्थ है स्वार्थ और कर्तापन के भाव से शुरू की गई योजनाएँ। गुणातीत कर्म को नहीं छोड़ता, क्योंकि गीता का पूरा संदेश ही निष्काम कर्म है। वह कर्तापन का अभिमान, फल की महत्त्वाकांक्षा और अपने लिए कुछ सिद्ध करने की भावना छोड़ देता है। उसके कर्म सहज, सेवा और कर्तव्य भाव से होते हैं।

गुणातीतः स उच्यते — वही गुणातीत कहलाता है: भगवान इस पूरी अवस्था का सार देते हैं कि ऐसा व्यक्ति ही वास्तव में गुणों से परे कहा जाता है।

गहरे भाव और आंतरिक संदेश

इन तीन श्लोकों (22 से 25) में गुणातीत का जो चित्र उभरता है, वह कोई संसार-त्यागी वैरागी नहीं, बल्कि एक संतुलित, शांत, सहज और प्रेममय व्यक्ति है, जो जीवन में पूर्ण रूप से सक्रिय है, पर भीतर से मुक्त है। यह चित्र हर साधक के लिए एक आदर्श और कसौटी दोनों है।

हमारे जीवन के लिए संदेश

कसौटी के रूप में उपयोग: इन लक्षणों को दूसरों को परखने के लिए नहीं, स्वयं की प्रगति देखने के लिए उपयोग करें। पूछें कि क्या मान-अपमान आज मुझे कम हिलाते हैं।

शत्रुता से मुक्ति: जिन लोगों के प्रति हमारे मन में कटुता है, उनके प्रति द्वेष को धीरे-धीरे शिथिल करने का प्रयास हमारे अपने मन को हल्का करता है।

आगे का विषय

अर्जुन के पहले दो प्रश्नों, लक्षण और आचरण, का उत्तर पूर्ण हो गया। अब उनका तीसरा और सबसे व्यावहारिक प्रश्न शेष है कि इन गुणों को पार कैसे किया जाए। अगले श्लोक में भगवान उसका उत्तर देते हैं।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

आध्यात्मिक
गुणातीत अहंकार-शून्यता
कर्मयोग
कर्तापन-त्याग निष्काम कर्म
मनोवैज्ञानिक
मान-अपमान से मुक्त आत्म-मूल्य की स्थिरता
साधना-दृष्टि
समत्व संन्यास-भाव
आन्तरिक संन्यास
आरम्भ-त्याग फलासक्ति-त्याग
ज्ञानयोग
अकर्ता-बोध
दार्शनिक
द्वन्द्वातीत
नैतिक
निष्पक्षता
शैक्षिक
गुणातीत का सार
व्यावहारिक
सम्बन्धों में निष्पक्ष व्यवहार
नेतृत्व
निष्पक्ष और निःस्वार्थ नेतृत्व
प्रबन्धन
महत्त्वाकांक्षा-मुक्त कार्य
सामाजिक
शत्रुता से ऊपर उठना
भक्ति-दृष्टि
सब कर्म ईश्वरार्पण

सूत्र

जिसकी शान्ति सम्मान पर टिकी है, वह अपमान में टूटेगा।

निष्पक्षता का अर्थ है सबके प्रति सद्भाव, पक्षपात किसी का नहीं।

'मैं यह करूँगा' का अभिमान छोड़ना ही सर्वारम्भ-त्याग है।

कर्म का त्याग नहीं, कर्तापन का त्याग गुणातीतता है।

अहंकार जितना घटता है, समता उतनी बढ़ती है।

बाहरी सम्मान से मुक्त होना भीतर की स्वतन्त्रता है।

वास्तविक संन्यास भीतर की अनासक्ति है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'सर्वारम्भपरित्यागी' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है सभी कर्मों के आरम्भ का, यानी 'मैं करने वाला हूँ' इस कर्तृत्व-अभिमान और फल की कामना का त्याग। कर्तव्य-कर्म का त्याग नहीं।
क्या गुणातीत व्यक्ति मित्र और शत्रु में भेद नहीं करता?
वह व्यवहार में विवेक रखता है, परन्तु मन में राग-द्वेष से मुक्त रहता है और सबके प्रति समभाव रखता है।
मान-अपमान में समता कैसे सम्भव है?
जब व्यक्ति अपने को शरीर और प्रतिष्ठा से अलग साक्षी जानता है, तब मान-अपमान उसकी आन्तरिक शान्ति को प्रभावित नहीं कर पाते।
यह श्लोक पिछले श्लोकों से कैसे जुड़ा है?
श्लोक 22 से 25 तक गुणातीत के लक्षण बताए गए हैं। यह श्लोक उन लक्षणों का समापन करता है और स्पष्ट घोषणा करता है कि ऐसा व्यक्ति गुणातीत कहा जाता है।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
सबके साथ निष्पक्ष रहो और कर्म करते हुए भी कर्तापन तथा फल के अभिमान को छोड़ो।

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