भगवद्गीता 18.42 — ब्राह्मण के स्वभावज कर्म: शम, दम, तप, शौच आदि
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ १८.४२ ॥
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मन का शान्त रहना, इन्द्रिय-संयम, तप, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता—ये ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| शमः | मन का शान्त रहना |
| दमः | इन्द्रियों का संयम |
| तपः | तप, अनुशासन |
| शौचम् | पवित्रता |
| क्षान्तिः | क्षमा, सहनशीलता |
| आर्जवम् | सरलता |
| एव च | और भी |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| ज्ञानम् | शास्त्र-ज्ञान |
| विज्ञानम् | अनुभवजन्य ज्ञान |
| आस्तिक्यम् | ईश्वर और धर्म में श्रद्धा |
| ब्रह्मकर्म | ब्राह्मण के कर्म |
| स्वभावजम् | स्वभाव से उत्पन्न |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| शमः | मन का शान्त रहना | ज्ञानम् | शास्त्र-ज्ञान |
| दमः | इन्द्रियों का संयम | विज्ञानम् | अनुभवजन्य ज्ञान |
| तपः | तप, अनुशासन | आस्तिक्यम् | ईश्वर और धर्म में श्रद्धा |
| शौचम् | पवित्रता | ब्रह्मकर्म | ब्राह्मण के कर्म |
| क्षान्तिः | क्षमा, सहनशीलता | स्वभावजम् | स्वभाव से उत्पन्न |
| आर्जवम् | सरलता | ||
| एव च | और भी | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में श्रीकृष्ण ब्राह्मण-स्वभाव से उत्पन्न कर्मों की सूची देते हैं: शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता।
भावार्थ
नौ गुण: ज्ञान-मार्ग का स्वभाव
श्रीकृष्ण उस स्वभाव के नौ गुण गिनाते हैं जो चिंतन, अध्ययन और अध्यात्म की ओर झुकाव रखता है। इस सूची की विशेषता यह है कि इसमें किसी बाहरी पद या अधिकार का उल्लेख नहीं, केवल आंतरिक गुणों की बात है।
शम (Calmness of mind): मन की शांति, विचारों की चंचलता पर नियंत्रण।
दम (Self-restraint): इंद्रियों का संयम, अर्थात इच्छाओं के पीछे भागने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण।
तप (Austerity and discipline): शरीर, वाणी और मन का अनुशासन, जैसा सत्रहवें अध्याय में विस्तार से बताया गया है।
शौच (Purity): बाहरी स्वच्छता और भीतरी पवित्रता, दोनों।
क्षान्ति (Forgiveness and patience): दूसरों की त्रुटि को सहन करना और प्रतिशोध की भावना न रखना।
आर्जव (Straightforwardness): मन, वाणी और कर्म में सरलता, कपट का अभाव।
ज्ञान (Knowledge): शास्त्र और तत्त्व की बौद्धिक समझ।
विज्ञान (Realized wisdom): ज्ञान का अनुभव में उतरना, अर्थात केवल जानना नहीं, जीना भी।
आस्तिक्य (Faith): ईश्वर, धर्म और सत्य में श्रद्धा।
इन गुणों की विशेषता
यह सूची दिखाती है कि इस स्वभाव की पहचान अधिकार या विशेषाधिकार से नहीं, बल्कि आंतरिक संयम और सेवा-भाव से है। ये गुण केवल किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं, बल्कि हर साधक के लिए आदर्श हैं। इनका अभ्यास कोई भी कर सकता है और करना चाहिए।
सात्त्विक स्वभाव का चित्र
इस सूची में सत्त्व गुण की प्रधानता झलकती है। शांति, संयम, पवित्रता, क्षमा और ज्ञान सभी सात्त्विक गुण हैं। ऐसा स्वभाव अध्ययन, अध्यापन, मार्गदर्शन और साधना में स्वाभाविक रूप से रमता है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
इन नौ गुणों में से हर एक हमारे लिए एक अभ्यास-सूची बन सकता है। कभी हम शांति का अभ्यास करें, कभी क्षमा का, कभी सरलता का। चाहे हमारा पेशा कुछ भी हो, ये गुण हमें बेहतर शिक्षक, सहकर्मी, माता-पिता और नागरिक बनाते हैं। जो इन्हें अपनाता है, उसके आचरण में स्वाभाविक गरिमा आ जाती है।
नौ गुण: ज्ञान-मार्ग का स्वभाव
श्रीकृष्ण उस स्वभाव के नौ गुण गिनाते हैं जो चिंतन, अध्ययन और अध्यात्म की ओर झुकाव रखता है। इस सूची की विशेषता यह है कि इसमें किसी बाहरी पद या अधिकार का उल्लेख नहीं, केवल आंतरिक गुणों की बात है।
शम (Calmness of mind): मन की शांति, विचारों की चंचलता पर नियंत्रण।
दम (Self-restraint): इंद्रियों का संयम, अर्थात इच्छाओं के पीछे भागने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण।
तप (Austerity and discipline): शरीर, वाणी और मन का अनुशासन, जैसा सत्रहवें अध्याय में विस्तार से बताया गया है।
शौच (Purity): बाहरी स्वच्छता और भीतरी पवित्रता, दोनों।
क्षान्ति (Forgiveness and patience): दूसरों की त्रुटि को सहन करना और प्रतिशोध की भावना न रखना।
आर्जव (Straightforwardness): मन, वाणी और कर्म में सरलता, कपट का अभाव।
ज्ञान (Knowledge): शास्त्र और तत्त्व की बौद्धिक समझ।
विज्ञान (Realized wisdom): ज्ञान का अनुभव में उतरना, अर्थात केवल जानना नहीं, जीना भी।
आस्तिक्य (Faith): ईश्वर, धर्म और सत्य में श्रद्धा।
इन गुणों की विशेषता
यह सूची दिखाती है कि इस स्वभाव की पहचान अधिकार या विशेषाधिकार से नहीं, बल्कि आंतरिक संयम और सेवा-भाव से है। ये गुण केवल किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं, बल्कि हर साधक के लिए आदर्श हैं। इनका अभ्यास कोई भी कर सकता है और करना चाहिए।
सात्त्विक स्वभाव का चित्र
इस सूची में सत्त्व गुण की प्रधानता झलकती है। शांति, संयम, पवित्रता, क्षमा और ज्ञान सभी सात्त्विक गुण हैं। ऐसा स्वभाव अध्ययन, अध्यापन, मार्गदर्शन और साधना में स्वाभाविक रूप से रमता है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
इन नौ गुणों में से हर एक हमारे लिए एक अभ्यास-सूची बन सकता है। कभी हम शांति का अभ्यास करें, कभी क्षमा का, कभी सरलता का। चाहे हमारा पेशा कुछ भी हो, ये गुण हमें बेहतर शिक्षक, सहकर्मी, माता-पिता और नागरिक बनाते हैं। जो इन्हें अपनाता है, उसके आचरण में स्वाभाविक गरिमा आ जाती है।
आगे का विषय
चिंतनशील स्वभाव के गुण स्पष्ट हुए। अब श्रीकृष्ण उन गुणों का वर्णन करते हैं जो नेतृत्व, रक्षा और साहस के स्वभाव में स्वाभाविक रूप से प्रकट होते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
शान्त मन सभी सद्गुणों की भूमि है।
इन्द्रिय-संयम जीवन को दिशा और शक्ति देता है।
अनुशासन से ही आन्तरिक तेज निखरता है।
विचार, वाणी और आचरण की पवित्रता चरित्र का आधार है।
क्षमा शक्ति का लक्षण है, दुर्बलता का नहीं।
सैद्धान्तिक ज्ञान अनुभव से मिलकर पूर्ण होता है।
ये गुण किसी वर्ग तक सीमित नहीं, हर साधक के लिए अपनाने योग्य हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस श्लोक में कितने गुण गिनाए गए हैं?
'शम' और 'दम' में क्या अन्तर है?
'ज्ञान' और 'विज्ञान' में क्या भेद है?
क्या ये गुण केवल एक वर्ग के लिए हैं?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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