भगवद्गीता 10.14 — भगवान् के वचन सत्य—देवता-दानव भी स्वरूप नहीं जानते
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥ १०.१४ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
हे केशव! आप मुझसे जो कुछ कहते हैं, उस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपके प्रकट स्वरूप को न देवता जानते हैं और न दानव।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सर्वम् | सब |
| एतत् | यह |
| ऋतम् | सत्य |
| मन्ये | मानता हूँ |
| यत् | जो |
| माम् | मुझसे |
| वदसि | आप कहते हैं |
| केशव | हे केशव |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| न | नहीं |
| हि | क्योंकि |
| ते | आपके |
| भगवन् | हे भगवन् |
| व्यक्तिम् | प्रकट स्वरूप को |
| विदुः | जानते |
| देवाः | देवता |
| न | न |
| दानवाः | दानव |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सर्वम् | सब | न | नहीं |
| एतत् | यह | हि | क्योंकि |
| ऋतम् | सत्य | ते | आपके |
| मन्ये | मानता हूँ | भगवन् | हे भगवन् |
| यत् | जो | व्यक्तिम् | प्रकट स्वरूप को |
| माम् | मुझसे | विदुः | जानते |
| वदसि | आप कहते हैं | देवाः | देवता |
| केशव | हे केशव | न | न |
| दानवाः | दानव | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
अर्जुन अपनी स्तुति और प्रमाण के बाद इस श्लोक में निष्कर्ष प्रस्तुत करता है. वह भगवान के प्रत्येक वचन को सत्य स्वीकार करता है और स्पष्ट कहता है कि उनके वास्तविक स्वरूप को न देवता जानते हैं और न दानव.
भावार्थ
पूर्ण स्वीकृति और विनम्र बोध
यह श्लोक अर्जुन के भीतर आए परिवर्तन का सार है. जिस अर्जुन ने अध्याय एक में संशय और मोह से धनुष रख दिया था, वही अब पूर्ण श्रद्धा से भगवान की वाणी को सत्य मानता है.
सर्वमेतदृतं मन्ये — मैं यह सब सत्य मानता हूँ: 'ऋतम्' का अर्थ है सत्य और यथार्थ. अर्जुन कहता है कि हे केशव, आपने जो कुछ भी कहा है, मैं उसे पूर्ण सत्य मानता हूँ. यह स्वीकृति आधी-अधूरी नहीं है. उसमें संदेह के लिए स्थान नहीं बचा.
केशव — संबोधन की मधुरता: अर्जुन भगवान को 'केशव' कहकर पुकारता है. यह संबोधन उसके अपनत्व को दर्शाता है. जो परम ब्रह्म हैं, वही उसके सखा और सारथी भी हैं. भक्ति में ऐश्वर्य और माधुर्य साथ-साथ चलते हैं.
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः — आपके प्राकट्य को देवता और दानव नहीं जानते: यह वही बात है जो भगवान ने दूसरे श्लोक में कही थी और अर्जुन उसे अब अपने शब्दों में दोहराता है. 'व्यक्ति' का अर्थ है भगवान का प्राकट्य, उनकी वास्तविक महिमा और स्वरूप. देवता और दानव, अर्थात अच्छे और विपरीत स्वभाव वाले दोनों वर्ग, अपनी शक्ति के बावजूद उन्हें पूर्णतः नहीं जान पाते.
यह वाक्य अर्जुन की विनम्रता को भी दर्शाता है. वह यह दावा नहीं करता कि उसने सब कुछ समझ लिया है. वह स्वीकार करता है कि भगवान की महिमा बुद्धि से परे है और उसे केवल उनकी कृपा से ही जाना जा सकता है.
हमारे जीवन के लिए संदेश
संशय से श्रद्धा तक: जीवन में जब संदेह और भ्रम घेरें, तब अर्जुन का यह रूपांतरण आशा देता है कि सही मार्गदर्शन और खुला हृदय हमें भी स्पष्टता तक पहुँचा सकते हैं.
जानने की सीमा का स्वीकार: सच्चा ज्ञानी वह है जो अपनी समझ की सीमा को पहचानता है. यह विनम्रता सीखने के द्वार खुले रखती है.
सम्बन्ध में अपनत्व: श्रद्धा का अर्थ दूरी नहीं है. ईश्वर के प्रति भाव में आदर के साथ आत्मीयता का होना साधना को जीवंत बनाता है.
पूर्ण स्वीकृति और विनम्र बोध
यह श्लोक अर्जुन के भीतर आए परिवर्तन का सार है. जिस अर्जुन ने अध्याय एक में संशय और मोह से धनुष रख दिया था, वही अब पूर्ण श्रद्धा से भगवान की वाणी को सत्य मानता है.
सर्वमेतदृतं मन्ये — मैं यह सब सत्य मानता हूँ: 'ऋतम्' का अर्थ है सत्य और यथार्थ. अर्जुन कहता है कि हे केशव, आपने जो कुछ भी कहा है, मैं उसे पूर्ण सत्य मानता हूँ. यह स्वीकृति आधी-अधूरी नहीं है. उसमें संदेह के लिए स्थान नहीं बचा.
केशव — संबोधन की मधुरता: अर्जुन भगवान को 'केशव' कहकर पुकारता है. यह संबोधन उसके अपनत्व को दर्शाता है. जो परम ब्रह्म हैं, वही उसके सखा और सारथी भी हैं. भक्ति में ऐश्वर्य और माधुर्य साथ-साथ चलते हैं.
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः — आपके प्राकट्य को देवता और दानव नहीं जानते: यह वही बात है जो भगवान ने दूसरे श्लोक में कही थी और अर्जुन उसे अब अपने शब्दों में दोहराता है. 'व्यक्ति' का अर्थ है भगवान का प्राकट्य, उनकी वास्तविक महिमा और स्वरूप. देवता और दानव, अर्थात अच्छे और विपरीत स्वभाव वाले दोनों वर्ग, अपनी शक्ति के बावजूद उन्हें पूर्णतः नहीं जान पाते.
यह वाक्य अर्जुन की विनम्रता को भी दर्शाता है. वह यह दावा नहीं करता कि उसने सब कुछ समझ लिया है. वह स्वीकार करता है कि भगवान की महिमा बुद्धि से परे है और उसे केवल उनकी कृपा से ही जाना जा सकता है.
हमारे जीवन के लिए संदेश
संशय से श्रद्धा तक: जीवन में जब संदेह और भ्रम घेरें, तब अर्जुन का यह रूपांतरण आशा देता है कि सही मार्गदर्शन और खुला हृदय हमें भी स्पष्टता तक पहुँचा सकते हैं.
जानने की सीमा का स्वीकार: सच्चा ज्ञानी वह है जो अपनी समझ की सीमा को पहचानता है. यह विनम्रता सीखने के द्वार खुले रखती है.
सम्बन्ध में अपनत्व: श्रद्धा का अर्थ दूरी नहीं है. ईश्वर के प्रति भाव में आदर के साथ आत्मीयता का होना साधना को जीवंत बनाता है.
आगे का विषय
अर्जुन ने भगवान की वाणी को पूर्ण सत्य स्वीकार किया और उनकी महिमा की अनंतता को माना. अब वह इसी भाव में आगे कहता है कि स्वयं को केवल भगवान ही जानते हैं. इसी के साथ अर्जुन अगला प्रश्न रखेगा कि भगवान अपनी किन विभूतियों के माध्यम से सम्पूर्ण लोकों में व्याप्त हैं.
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
सत्य को सुनना ही नहीं, उसे सत्य मानकर अपनाना भी आवश्यक है।
गुरु-वचन में दृढ़ विश्वास साधना की नींव है।
ईश्वर का स्वरूप बुद्धि से पूरा पकड़ में नहीं आता।
श्रेष्ठता या विरोध—कोई भी सीमित दृष्टि परमात्मा को पूर्ण नहीं जान सकती।
जो सबके हृदय का स्वामी है, वही सच्चा मार्गदर्शक है।
प्रश्न शान्त होने पर स्वीकार का सुख आता है।
जो जितना जानता है, उसे उतना ही अपनी सीमा दिखाई देती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'ऋतम्' का क्या अर्थ है?
'केशव' सम्बोधन का क्या महत्त्व है?
'व्यक्तिम्' का क्या अर्थ है?
देवता और दानव भी भगवान् को क्यों नहीं जानते?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: