भगवद्गीता 10.15 — भगवान् को स्वयं भगवान् ही जानते हैं
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १०.१५ ॥
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हे पुरुषोत्तम! हे प्राणियों को उत्पन्न करने वाले, प्राणियों के स्वामी, देवों के देव और जगत् के पति! आप अपने स्वरूप को स्वयं ही जानते हैं।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| स्वयम् | आप स्वयं |
| एव | ही |
| आत्मना | अपने द्वारा |
| आत्मानम् | अपने स्वरूप को |
| वेत्थ | जानते हैं |
| त्वम् | आप |
| पुरुषोत्तम | हे पुरुषोत्तम |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| भूतभावन | हे प्राणियों को उत्पन्न करने वाले |
| भूतेश | हे प्राणियों के स्वामी |
| देवदेव | हे देवों के देव |
| जगत्पते | हे जगत् के स्वामी |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| स्वयम् | आप स्वयं | भूतभावन | हे प्राणियों को उत्पन्न करने वाले |
| एव | ही | भूतेश | हे प्राणियों के स्वामी |
| आत्मना | अपने द्वारा | देवदेव | हे देवों के देव |
| आत्मानम् | अपने स्वरूप को | जगत्पते | हे जगत् के स्वामी |
| वेत्थ | जानते हैं | ||
| त्वम् | आप | ||
| पुरुषोत्तम | हे पुरुषोत्तम | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
पिछले श्लोक में अर्जुन ने कहा कि भगवान के प्राकट्य को देवता और दानव भी नहीं जानते. इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए वह इस श्लोक में स्पष्ट कहता है कि भगवान को केवल भगवान ही पूर्ण रूप से जान सकते हैं, और फिर उन्हें अनेक विशेष संबोधनों से पुकारता है.
भावार्थ
जो स्वयं को स्वयं ही जानता है
अर्जुन की स्तुति अब अपने शिखर की ओर बढ़ती है. वह यह स्वीकार करता है कि असीम को जानने वाला कोई बाहरी नहीं हो सकता. जिस प्रकार दीपक को देखने के लिए दूसरे दीपक की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार परमात्मा को पूर्ण रूप से जानने वाला केवल परमात्मा ही है.
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वम् — आप स्वयं ही अपने द्वारा अपने को जानते हैं: यहाँ जानने वाला भी वही है और जाना जाने वाला भी वही. इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान को जाना ही नहीं जा सकता. अर्थ यह है कि उनके पूर्ण स्वरूप को जानने की क्षमता उनके अपने भीतर ही है, और जो उन्हें जान पाता है, वह उनकी कृपा से ही जान पाता है.
पुरुषोत्तम — पुरुषों में उत्तम: भगवान जीवों में भी श्रेष्ठ हैं और उनसे परे भी. वे सर्वोच्च पुरुष हैं.
भूतभावन — प्राणियों को उत्पन्न करने वाले: सभी जीवों की उत्पत्ति और पोषण उन्हीं से होता है.
भूतेश — प्राणियों के स्वामी: वे केवल रचने वाले ही नहीं, सब जीवों के नियंता और आश्रय भी हैं.
देवदेव — देवताओं के भी देवता: जिन देवताओं की हम उपासना करते हैं, उनके भी आराध्य वही हैं.
जगत्पते — जगत के पति: सम्पूर्ण संसार के पालनकर्ता और अधिपति.
संबोधनों के पीछे का भाव
जब हृदय भाव से भर जाता है, तब मनुष्य एक ही नाम से संतुष्ट नहीं होता. अर्जुन एक के बाद एक संबोधन देता है, क्योंकि प्रत्येक नाम भगवान के एक पक्ष को छूता है. यह भक्ति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है, जहाँ शब्द कम पड़ने लगते हैं और प्रेम बहने लगता है.
हमारे जीवन के लिए संदेश
सीमित बुद्धि की विनम्र स्वीकृति: जब हम मान लेते हैं कि कुछ सत्य हमारी बुद्धि की पकड़ से बड़े हैं, तब हमारे भीतर श्रद्धा और सीखने की जगह बनती है.
कृपा से जानना: सबसे गहरी समझ केवल परिश्रम से नहीं मिलती, उसमें विनम्रता और समर्पण का भी भाग होता है.
प्रेम की भाषा: जिससे हम सच्चा प्रेम करते हैं, उसे हम अलग-अलग भावों और नामों से पुकारते हैं. साधना में भी यही स्वाभाविक प्रेम जीवित रहना चाहिए.
जो स्वयं को स्वयं ही जानता है
अर्जुन की स्तुति अब अपने शिखर की ओर बढ़ती है. वह यह स्वीकार करता है कि असीम को जानने वाला कोई बाहरी नहीं हो सकता. जिस प्रकार दीपक को देखने के लिए दूसरे दीपक की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार परमात्मा को पूर्ण रूप से जानने वाला केवल परमात्मा ही है.
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वम् — आप स्वयं ही अपने द्वारा अपने को जानते हैं: यहाँ जानने वाला भी वही है और जाना जाने वाला भी वही. इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान को जाना ही नहीं जा सकता. अर्थ यह है कि उनके पूर्ण स्वरूप को जानने की क्षमता उनके अपने भीतर ही है, और जो उन्हें जान पाता है, वह उनकी कृपा से ही जान पाता है.
पुरुषोत्तम — पुरुषों में उत्तम: भगवान जीवों में भी श्रेष्ठ हैं और उनसे परे भी. वे सर्वोच्च पुरुष हैं.
भूतभावन — प्राणियों को उत्पन्न करने वाले: सभी जीवों की उत्पत्ति और पोषण उन्हीं से होता है.
भूतेश — प्राणियों के स्वामी: वे केवल रचने वाले ही नहीं, सब जीवों के नियंता और आश्रय भी हैं.
देवदेव — देवताओं के भी देवता: जिन देवताओं की हम उपासना करते हैं, उनके भी आराध्य वही हैं.
जगत्पते — जगत के पति: सम्पूर्ण संसार के पालनकर्ता और अधिपति.
संबोधनों के पीछे का भाव
जब हृदय भाव से भर जाता है, तब मनुष्य एक ही नाम से संतुष्ट नहीं होता. अर्जुन एक के बाद एक संबोधन देता है, क्योंकि प्रत्येक नाम भगवान के एक पक्ष को छूता है. यह भक्ति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है, जहाँ शब्द कम पड़ने लगते हैं और प्रेम बहने लगता है.
हमारे जीवन के लिए संदेश
सीमित बुद्धि की विनम्र स्वीकृति: जब हम मान लेते हैं कि कुछ सत्य हमारी बुद्धि की पकड़ से बड़े हैं, तब हमारे भीतर श्रद्धा और सीखने की जगह बनती है.
कृपा से जानना: सबसे गहरी समझ केवल परिश्रम से नहीं मिलती, उसमें विनम्रता और समर्पण का भी भाग होता है.
प्रेम की भाषा: जिससे हम सच्चा प्रेम करते हैं, उसे हम अलग-अलग भावों और नामों से पुकारते हैं. साधना में भी यही स्वाभाविक प्रेम जीवित रहना चाहिए.
आगे का विषय
अर्जुन ने भगवान को अनेक नामों से पुकारकर अपनी श्रद्धा प्रकट की. अब उसके हृदय में एक सुंदर जिज्ञासा जन्म लेती है कि जब भगवान स्वयं ही अपने को जानते हैं, तो वही अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करें. अगले श्लोक में अर्जुन यही निवेदन करता है.
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
परम सत्य का पूर्ण ज्ञान स्वयं परम सत्य को ही है।
शिष्य जब अपनी सीमा जान लेता है, तब वह सही प्रश्न कर पाता है।
हर सम्बोधन ईश्वर के किसी न किसी गुण को याद दिलाता है।
जो सबसे श्रेष्ठ पुरुष है, वही सबका अन्तिम आश्रय है।
सबको उत्पन्न करने वाला सबकी चिन्ता भी करता है।
जो जगत् का स्वामी है, उसी से जगत् का सच्चा ज्ञान मिलता है।
सत्य जानना हो तो उसी से पूछो, जो उसे जानता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'पुरुषोत्तम' का क्या अर्थ है?
'स्वयमेवात्मनात्मानं' का क्या भाव है?
अर्जुन ने इतने सम्बोधन क्यों किए?
'भूतभावन' और 'भूतेश' में क्या अन्तर है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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