भगवद्गीता 11.14 — विस्मय, रोमाञ्च और अर्जुन का कृताञ्जलि प्रणाम

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ ११.१४ ॥

तब आश्चर्य से भरे हुए और रोमाञ्चित अर्जुन ने भगवान् को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोलने लगे।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

ततः सः विस्मय-आविष्टः
हृष्ट-रोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवम्
कृत-अञ्जलिः अभाषत ॥

शब्दार्थ

पंक्ति 1
संस्कृत शब्द अर्थ
ततः तब
सः वह
विस्मयाविष्टः आश्चर्य से भरा हुआ
हृष्टरोमा रोमाञ्चित
धनञ्जयः अर्जुन
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
प्रणम्य प्रणाम करके
शिरसा सिर से
देवम् भगवान् को
कृताञ्जलिः हाथ जोड़े हुए
अभाषत बोले
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
ततः तब प्रणम्य प्रणाम करके
सः वह शिरसा सिर से
विस्मयाविष्टः आश्चर्य से भरा हुआ देवम् भगवान् को
हृष्टरोमा रोमाञ्चित कृताञ्जलिः हाथ जोड़े हुए
धनञ्जयः अर्जुन अभाषत बोले

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में विश्वरूप दर्शन का अर्जुन के हृदय पर पड़ने वाला प्रभाव दिखाया गया है। विस्मय, रोमांच और श्रद्धा से भरकर वे हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम करते हैं और बोलना आरंभ करते हैं।

भावार्थ

विस्मय से श्रद्धा तक

संजय कहते हैं कि तब धनंजय अर्जुन विस्मय से भर गए, उनके रोम-रोम खड़े हो गए। उन्होंने सिर झुकाकर भगवान को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले। यह श्लोक दर्शन के बाद की आंतरिक अवस्था का बहुत सुंदर चित्र है।

विस्मयाविष्टः — विस्मय से भरे हुए: अर्जुन वही योद्धा हैं जो बड़े से बड़े शत्रु के सामने भी नहीं डगमगाए, पर यहाँ वे पूरी तरह अभिभूत हैं। विराट सत्य के सामने बड़े से बड़ा पराक्रम भी विनम्र हो जाता है।

हृष्टरोमा — रोमांचित: यह शारीरिक प्रतिक्रिया भावों की गहराई का प्रमाण है। जब आश्चर्य, भय और प्रेम एक साथ उठते हैं, तब शरीर भी उसे व्यक्त करता है।

प्रणम्य शिरसा देवम् — सिर झुकाकर प्रणाम: अब तक अर्जुन भगवान को सखा के रूप में देखते थे। इस दर्शन के बाद उनके भीतर सखा के प्रेम के साथ परमेश्वर के प्रति श्रद्धा और आदर भी जाग उठता है।

कृताञ्जलिः — हाथ जोड़े हुए: जुड़े हुए हाथ समर्पण का प्रतीक हैं। अर्जुन अब प्रश्नकर्ता नहीं, शरणागत भक्त की मुद्रा में हैं।

हमारे जीवन के लिए संदेश (विराटता के आगे समर्पण)

सच्चा अनुभव हमें झुकाता है: जो ज्ञान या अनुभव हमें अधिक अहंकारी बनाता है, वह अधूरा है। जब हम जीवन, प्रकृति या किसी महान सत्य की विशालता का अनुभव करते हैं, तो भीतर स्वाभाविक रूप से विनम्रता उठती है। यही अर्जुन की स्थिति है।

भाव को व्यक्त करना: अर्जुन अपने भावों को दबाते नहीं, वे प्रणाम और वाणी से उन्हें प्रकट करते हैं। हमारे जीवन में भी कृतज्ञता, श्रद्धा और प्रेम को समय पर व्यक्त करना संबंधों और साधना, दोनों को समृद्ध करता है।

आगे का विषय

श्रद्धा और विस्मय से भरे अर्जुन अब चुप नहीं रहते। अगले श्लोक से वे अपने देखे हुए दृश्य का वर्णन भगवान के सामने करना आरंभ करते हैं, जिसमें उन्हें देवता, ऋषि और समस्त प्राणी दिखाई देते हैं।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

भक्ति-दृष्टि
प्रणाम समर्पण
मनोवैज्ञानिक
विस्मय रोमाञ्च
आध्यात्मिक
दर्शन का प्रभाव अहंकार-विलय
साधना-दृष्टि
विनम्र प्रणति श्रद्धा
नैतिक
आदर विनय
ज्ञानयोग
अनुभव से बोध
दार्शनिक
विराट् के आगे लघु मनुष्य
प्रतीक-दृष्टि
कृताञ्जलि नतशिर
शैक्षिक
शिष्य का आचरण
जिज्ञासा-दृष्टि
आगे का संवाद
मानवता
विनम्रता और सौम्यता
सामाजिक
आदर की संस्कृति
कर्मयोग
कर्तव्य से पहले समर्पण
समन्वय-दृष्टि
भय, प्रेम और श्रद्धा का मेल

सूत्र

जब सत्य सामने आता है तो मन पहले मौन और फिर नम्र होता है।

शरीर का रोमाञ्च हृदय की गहराई से उठी श्रद्धा की भाषा है।

सिर झुकना अहंकार के झुकने का बाहरी रूप है।

जुड़े हाथ बताते हैं कि अब कहने से पहले सुनने का समय है।

जिसने संसार का धन जीता, वह भी परम के आगे नतमस्तक होता है।

भक्ति तब पूर्ण होती है जब ज्ञान विनय में बदल जाए।

सच्चा शिष्य दर्शन के बाद प्रश्न नहीं, प्रार्थना करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'विस्मयाविष्टः' से क्या अभिप्राय है?
इसका अर्थ है आश्चर्य से भर जाना। अर्जुन विराट् रूप देखकर विस्मय में डूब गए, जो उनकी सच्ची मानवीय प्रतिक्रिया थी।
'हृष्टरोमा' शब्द क्या दर्शाता है?
यह शारीरिक रोमाञ्च का सूचक है, जो अत्यधिक भावनात्मक और आध्यात्मिक उत्तेजना में होता है।
'धनञ्जय' सम्बोधन का क्या अर्थ है?
धनञ्जय का अर्थ है धन को जीतने वाला। यह अर्जुन का एक नाम है, जो उनके पराक्रम और प्रसिद्धि का सूचक है।
अर्जुन ने प्रणाम क्यों किया?
विराट् रूप देखकर उनका अहंकार और संशय मिट गया। प्रणाम उनकी श्रद्धा, विनय और समर्पण का सहज प्रकटीकरण है।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
सच्चा बोध मनुष्य को विनम्र बनाता है; जब सत्य का अनुभव होता है तब सिर अपने-आप झुकता है और हृदय श्रद्धा से भर जाता है।

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