गीता में दैवी और आसुरी प्रकृति मनुष्य के भीतर के दो स्वभावों का वर्णन है: एक जो उसे शुद्धता, निर्भयता और करुणा की ओर ले जाता है, और दूसरा जो अहंकार, लालच और क्रोध की ओर खींचता है। हर व्यक्ति में दोनों के संकेत हो सकते हैं, इसलिए यह किसी को लेबल लगाने के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर की प्रवृत्तियों को पहचानने और सुधारने के लिए है।
गीता 16.1, 16.2 और 16.3 दैवी सम्पदा के गुण बताती हैं: निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धता, ज्ञान, दान, इन्द्रिय-संयम, अहिंसा, सत्य, दया, तेज, क्षमा, धैर्य और अभिमान-रहित जीवन। गीता 16.5 कहती है कि दैवी सम्पदा मोक्ष की ओर और आसुरी सम्पदा बंधन की ओर ले जाती है, इसलिए गुणों की ओर देखकर आत्मविश्वास रखें और दोषों से निराश न हों।
गीता 16.4 आसुरी प्रकृति के लक्षण दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर व्यवहार और अज्ञान बताती है, और गीता 16.8 भोगवादी, ईश्वर-रहित दृष्टि को आसुरी कहती है। गीता 16.21 काम, क्रोध और लोभ को पतन के तीन द्वार बताती है, और गीता 16.22 के अनुसार इन तीनों से मुक्त मनुष्य अपने श्रेय का आचरण करता है और परम गति पाता है। इसके लिए आत्मसंयम, सत्संग और नियमित साधना को दैनिक अभ्यास बनाएँ।