विकर्म पर भगवद्गीता

23 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

विकर्म पर भगवद्गीता के श्लोक 23 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

विकर्म का अर्थ है ऐसा कर्म जो नैतिक रूप से अनुचित हो और स्वयं तथा दूसरों के लिए हानिकारक बने: झूठ, छल, क्रूरता, शोषण या किसी को आहत करने वाला व्यवहार। कभी हम इन्हें परिस्थितियों का बहाना देकर सही ठहरा लेते हैं, पर बार-बार दोहराने से यही आदत स्वभाव बन जाती है। इसलिए गीता कर्म को बाहरी रूप से नहीं, उसकी भावना और परिणाम से परखना सिखाती है।

गीता 4.16 और 4.17 कहती हैं कि कर्म, अकर्म और विकर्म का भेद समझना आध्यात्मिक प्रगति के लिए ज़रूरी है, यानी निर्णय लेते समय केवल यह न देखें कि क्या किया जा रहा है, बल्कि यह भी कि वह उचित है या नहीं। गीता 16.4 में दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर व्यवहार और अज्ञान आसुरी प्रकृति के लक्षण हैं, और गीता 16.9 में गलत जीवन-दृष्टि वाले लोग उग्र कर्मों से स्वयं तथा संसार के अहित का कारण बनते हैं।

गीता 16.10 बताती है कि अतृप्त कामना, दम्भ और मद से भरे लोग मोह के कारण दूषित आग्रह पकड़ लेते हैं, और गीता 16.16 में भोगों में आसक्त और मोह-जाल में बँधे लोग दुःखदायी अवस्था को पहुँचते हैं। गीता 16.19 और 16.20 चेताती हैं कि द्वेष और क्रूरता का फल अधोगति है और गलत प्रवृत्तियों को न बदलने पर पतन की गति बढ़ती जाती है। आज का आचरण कल की प्रवृत्ति बनता है, इसलिए सुधार समय रहते करें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विकर्म का क्या अर्थ है और यह कर्म तथा अकर्म से कैसे अलग है?
गीता 4.17 के अनुसार सही कर्म, निषिद्ध कर्म (विकर्म) और बंधन से रहित कर्म के बीच का अंतर समझना आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य है। निर्णय लेते समय केवल यह न देखें कि क्या किया जा रहा है, बल्कि यह भी देखें कि वह उचित या अनुचित है और आत्मोन्नति के अनुकूल है या नहीं।
गीता 16.10 में अतृप्त कामना और अहंकार विकर्म की ओर कैसे ले जाते हैं?
गीता 16.10 के अनुसार अतृप्त कामना का सहारा लेकर, दम्भ, मान और मद से भरे आसुरी लोग मोह के कारण दूषित आग्रह पकड़ते हैं और अपवित्र नियमों के साथ कर्म करते हैं। इसलिए अपनी अतृप्त इच्छाओं को पहचानें, उनके पीछे के अहंकार और मोह को समझें और उन पर संयम रखने का अभ्यास करें।
गीता 16.16 में भोगासक्ति और मोह-जाल का क्या परिणाम बताया गया है?
गीता 16.16 के अनुसार भोगों में अत्यन्त आसक्त, अनेक विचारों से भ्रमित और मोह-जाल में बँधे लोग अंततः अशुभ और दुःखदायी अवस्था को प्राप्त होते हैं। मन को विषयों की ओर भटकने से रोकने के लिए सत्संग, स्वाध्याय और संयम का सहारा लें, ताकि मोह का जाल गहरा न हो।
गीता 16.19 में द्वेष और क्रूरता के परिणाम की क्या चेतावनी है?
गीता 16.19 कहती है कि द्वेष रखने वाले, क्रूर और अशुभ कर्म करने वाले मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार बार-बार आसुरी योनियों में जन्म लेते हैं, जो कर्मफल की न्यायपूर्ण व्यवस्था है। इसलिए अपने कर्मों के परिणाम की गंभीरता समझें और द्वेष तथा क्रूरता को स्वभाव में पनपने से पहले रोकें।
गीता 16.20 के अनुसार गलत प्रवृत्तियों को न बदलने से क्या होता है?
गीता 16.20 के अनुसार आसुरी योनियों में बार-बार जन्म लेने से मूढ़ता बढ़ती जाती है, मनुष्य परमात्मा को प्राप्त नहीं कर पाता और धीरे-धीरे और अधिक अधम गति को पहुँचता है। इसलिए आज का आचरण कल की प्रवृत्ति बनता है; आत्मोन्नति के अवसरों का उपयोग समय रहते करें। गलत प्रवृत्तियों को न बदलने पर पतन की गति बढ़ती जाती है।

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