भगवद्गीता 5.28 — इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त मुनि
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ ५.२८ ॥
जिस मननशील साधक की इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि संयमित हैं, जो मोक्ष को ही अपना परम लक्ष्य मानता है तथा जो इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त हो गया है, वह वास्तव में सदैव मुक्त ही है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| यतेन्द्रियमनोबुद्धिः | जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि संयमित हैं |
| मुनिः | मननशील साधक |
| मोक्षपरायणः | मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानने वाला |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| विगतेच्छाभयक्रोधः | इच्छा, भय और क्रोध से रहित |
| यः | जो |
| सदा | सदैव |
| मुक्तः | मुक्त |
| एव | ही |
| सः | वह |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| यतेन्द्रियमनोबुद्धिः | जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि संयमित हैं | विगतेच्छाभयक्रोधः | इच्छा, भय और क्रोध से रहित |
| मुनिः | मननशील साधक | यः | जो |
| मोक्षपरायणः | मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानने वाला | सदा | सदैव |
| मुक्तः | मुक्त | ||
| एव | ही | ||
| सः | वह | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ध्यान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए साधक की आंतरिक अवस्था का वर्णन करते हैं, जहाँ मन, इंद्रियाँ और श्वास संतुलित हो जाते हैं।
भावार्थ
ध्यान की आंतरिक स्थिरता
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ उस साधक का चित्र प्रस्तुत करते हैं जिसने अपनी चेतना को बाहरी आकर्षणों से हटाकर भीतर स्थापित करना शुरू कर दिया है।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिः: साधक अपनी इंद्रियों, मन और बुद्धि को अनुशासित करने का प्रयास करता है। वे अब अनियंत्रित रूप से विषयों की ओर नहीं भागते।
मुनिर्मोक्षपरायणः: उसका लक्ष्य केवल क्षणिक सुख नहीं, बल्कि आंतरिक स्वतंत्रता और मोक्ष होता है। इसी कारण उसकी साधना स्थिर और उद्देश्यपूर्ण बनती है।
विगतेच्छाभयक्रोधः: इच्छा, भय और क्रोध मन की अशांति के तीन प्रमुख कारण हैं। ध्यान और आत्मज्ञान के प्रभाव से साधक इनसे धीरे-धीरे मुक्त होने लगता है।
सदा मुक्त एव सः: ऐसी अवस्था में व्यक्ति केवल भविष्य में मुक्ति पाने की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि वर्तमान में ही स्वतंत्रता और शांति का अनुभव करने लगता है।
उसकी चेतना बाहरी परिस्थितियों की दास नहीं रहती। वह अपने भीतर एक ऐसी स्थिरता का अनुभव करता है जिसे संसार के उतार-चढ़ाव आसानी से प्रभावित नहीं कर पाते।
हमारे जीवन के लिए संदेश
यह श्लोक बताता है कि वास्तविक स्वतंत्रता केवल बाहरी बंधनों से मुक्त होने का नाम नहीं है।
आंतरिक बंधनों से मुक्ति: इच्छाएँ, भय और क्रोध ही मनुष्य के सबसे बड़े आंतरिक बंधन हैं।
जागरूक जीवन: जब व्यक्ति अपने मन को समझना और उसे संतुलित करना सीखता है, तब जीवन में अधिक स्पष्टता, साहस और शांति का अनुभव होने लगता है।
आगे का विषय
भगवान श्रीकृष्ण ने ध्यानयोगी की आंतरिक अवस्था का वर्णन किया। अब अध्याय के अंतिम श्लोक में वे उस परम सत्य का उद्घाटन करेंगे जिसकी अनुभूति से साधक को पूर्ण शांति प्राप्त होती है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
इन्द्रियों, मन और बुद्धि का संयम आन्तरिक शक्ति का आधार है।
मुक्ति केवल मृत्यु के बाद की अवस्था नहीं, चेतना की वर्तमान स्थिति भी है।
अनियंत्रित इच्छाएँ मन को बाँधती हैं।
जहाँ आसक्ति कम होती है, वहाँ भय भी घटता है।
क्रोध पर विजय आत्मविजय का महत्वपूर्ण चरण है।
जिसका लक्ष्य सर्वोच्च है, उसका जीवन भी ऊँचा उठता है।
सच्चा मुनि केवल सोचता नहीं, सत्य पर मनन करके उसे जीता है।