भगवद्गीता 11.27 — तेज गति से दंष्ट्राओं वाले भयानक मुखों में प्रवेश

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ ११.२७ ॥

वे सब शीघ्रता से आपके दाढ़ों से विकराल और भयानक मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। उनमें से कुछ दाँतों के बीच फँसे हुए, चूर-चूर हुए सिरों के साथ दिखाई दे रहे हैं।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

वक्त्राणि ते त्वरमाणाः विशन्ति
दंष्ट्रा-करालानि भयानकानि ।
केचित् विलग्नाः दशन-अन्तरेषु
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैः उत्तमाङ्गैः ॥

शब्दार्थ

पंक्ति 1
संस्कृत शब्द अर्थ
वक्त्राणि मुखों में
ते आपके
त्वरमाणाः शीघ्रता से
विशन्ति प्रवेश करते हैं
दंष्ट्राकरालानि दाढ़ों से विकराल
भयानकानि भयानक
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
केचित् कुछ
विलग्नाः फँसे हुए
दशनान्तरेषु दाँतों के बीच
सन्दृश्यन्ते दिखाई देते हैं
चूर्णितैः चूर-चूर हुए
उत्तमाङ्गैः सिरों के साथ
पंक्ति 1 पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
वक्त्राणि मुखों में केचित् कुछ
ते आपके विलग्नाः फँसे हुए
त्वरमाणाः शीघ्रता से दशनान्तरेषु दाँतों के बीच
विशन्ति प्रवेश करते हैं सन्दृश्यन्ते दिखाई देते हैं
दंष्ट्राकरालानि दाढ़ों से विकराल चूर्णितैः चूर-चूर हुए
भयानकानि भयानक उत्तमाङ्गैः सिरों के साथ

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में अर्जुन उन योद्धाओं की स्थिति का और अधिक भयावह वर्णन करते हैं जो तेजी से भगवान के विकराल मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। यह दृश्य समय की अनिवार्य और निर्मम गति को दिखाता है।

भावार्थ

काल के मुखों में प्रवेश

अर्जुन कहते हैं कि वे सब वीर तेजी से आपके भयानक और दाढ़ों से विकराल मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ तो दाँतों के बीच फँसे दिखाई दे रहे हैं और उनके सिर चूर्ण हो चुके हैं।

त्वरमाणा विशन्ति — शीघ्रता से प्रवेश करते हैं: योद्धा स्वयं भी जैसे अपने अंत की ओर दौड़ रहे हैं। यह दर्शाता है कि काल की गति में कोई ठहराव नहीं, और मनुष्य अपनी अनजान तीव्रता में उस ओर बढ़ता चला जाता है।

दंष्ट्राकरालानि भयानकानि — भयंकर और विकराल दाढ़ों वाले: दाढ़ें यहाँ काल की निर्ममता का प्रतीक हैं, जहाँ किसी की शक्ति या पद का कोई विशेष महत्त्व नहीं रह जाता।

केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु — कुछ दाँतों के बीच फँसे: यह चित्र अत्यंत कठोर है, परंतु इसका उद्देश्य भयभीत करना नहीं, जीवन की क्षणभंगुरता का बोध कराना है। गीता इसे दिखाकर अर्जुन के भीतर के मोह को तोड़ती है, जो स्वजनों के मरने के भय से उत्पन्न हुआ था।

गहरे भाव और आंतरिक संदेश

मोह की जड़ पर प्रहार: अर्जुन का विषाद इस विचार से उपजा था कि वे इन लोगों को मार देंगे। यहाँ उन्हें दिखाया जाता है कि समय स्वयं सबको ले जाने की प्रक्रिया में है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जीवन-मृत्यु का नियंता कोई और है, और हम कर्तव्य के निमित्त मात्र हैं।

जीवन के प्रति दृष्टि: यह बोध हमें अनित्य चीजों से अत्यधिक आसक्ति से बचाता है और सत्य, सेवा तथा कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा देता है।

आगे का विषय

इस भयावह चित्र के बाद अर्जुन दो सुंदर उपमाओं से इस प्रवाह को समझने का प्रयास करते हैं। अगले श्लोक में वे नदियों के समुद्र की ओर बहने का दृष्टांत देते हैं।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

दार्शनिक
काल का ग्रास अपरिहार्य अन्त
आध्यात्मिक
संहार शक्ति
मनोवैज्ञानिक
भय मृत्यु-बोध
ज्ञानयोग
नश्वरता का बोध
नैतिक
कर्म और परिणाम
प्रतीक-दृष्टि
मुख = काल दंष्ट्रा = संहार
कर्मयोग
निमित्त-भाव
भक्ति-दृष्टि
परम सत्ता के अधीन
साधना-दृष्टि
वैराग्य का जागरण
शैक्षिक
जीवन की क्षणभंगुरता
सामाजिक
युद्ध का परिणाम
मानवता
हिंसा के प्रति करुणा
नेतृत्व
निर्णय की गम्भीरता
समन्वय-दृष्टि
सृजन और संहार का चक्र

सूत्र

मृत्यु का दर्शन जीवन को गम्भीर और सार्थक बनाता है।

काल की गति से कोई बच नहीं सकता, केवल समझ सकता है।

सब कुछ तेजी से काल की ओर बढ़ रहा है; इसलिए अवसर को व्यर्थ न खोएँ।

सृष्टि के साथ संहार भी उसी विधान का भाग है।

नश्वरता का बोध आसक्ति की पकड़ ढीली करता है।

भय का यथार्थ दर्शन विनय और विवेक को जन्म देता है।

हर कर्म का परिणाम काल के प्रवाह में घटित होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि सब योद्धा बड़ी तेजी से भगवान् के मुखों में प्रवेश कर रहे हैं, जो काल की अपरिहार्य गति का प्रतीक है।
'दंष्ट्राकरालानि भयानकानि' का क्या संकेत है?
मुख दाढ़ों से अत्यन्त विकराल हैं। यह काल की भयंकर और ग्रसने वाली शक्ति को दर्शाता है।
'चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है चूर-चूर हुए सिर। यह मृत्यु के अन्तिम परिणाम का भयानक चित्रण है, जिसका उद्देश्य नश्वरता का बोध कराना है।
क्या यह दृश्य वास्तविक युद्ध का भविष्य है?
यह दृश्य काल की उस शक्ति को दर्शाता है जिसके सामने युद्ध का परिणाम पहले से निश्चित है और सब नश्वर हैं।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
जीवन अस्थायी है, इसलिए समय का सदुपयोग करें और धर्मपूर्वक कर्म करते हुए आसक्ति को शिथिल रखें।

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