मृत्यु का भय इंसान के सबसे गहरे भयों में है, क्योंकि वह अज्ञात है और हर किसी के सामने एक दिन आना है। इसी भय से हम उसके बारे में सोचने से बचते हैं, पर बचने से डर घटता नहीं, मन के कोने में बना रहता है। गीता इस विषय से भागने के बजाय उसे समझने की दिशा देती है, ताकि भय की जगह स्वीकृति और स्पष्टता आ सके।
गीता 2.27 कहती है कि जन्म और मृत्यु का चक्र अटल है, और जो अपरिहार्य है उसके लिए शोक करना ज्ञानी का लक्षण नहीं, इसलिए उसे जीवन की स्वाभाविक व्यवस्था मानकर स्वीकार करें। गीता 2.22 और 2.13 में मृत्यु वस्त्र बदलने जैसा परिवर्तन है और आत्मा वही रहती है, और गीता 10.34 में मृत्यु और स्मृति, धैर्य तथा क्षमा जैसे सद्गुण, दोनों भगवान् की विभूतियाँ हैं।
गीता 1.44 में अर्जुन भय से उपजी आशंका को सुनी हुई मान्यता से पुष्ट करते हैं, इसलिए भय के आधार पर निर्णय लेने से पहले उनकी वास्तविकता परखें। गीता 8.5 अंतकाल के स्मरण को परम गति से जोड़ती है, पर इसे आज के जीवन में दोहराकर स्वभाव बनाने की सलाह है, और गीता 8.15 में भगवान् को पाने वाले महात्मा दुःखमय अस्थायी पुनर्जन्म में नहीं लौटते। गीता 11.32 कहती है कि जगत् के उत्थान-विनाश का नियमन भगवान् के हाथ में है, इसलिए नियंत्रण का अहंकार छोड़ें।