भगवद्गीता 9.27 — जो करो, खाओ, हवन करो, दान दो, तप करो: सब मुझे अर्पण करो

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ ९.२७ ॥

हे कुन्तीपुत्र! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है—वह सब मुझे अर्पण करने के भाव से कर।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

यत् करोषि यत् अश्नासि
यत् जुहोषि ददासि यत् ।
यत् तपस्यसि कौन्तेय
तत् कुरुष्व मदर्पणम् ॥

शब्दार्थ

पंक्ति 1
संस्कृत शब्द अर्थ
यत् जो
करोषि करते हो
अश्नासि खाते हो
जुहोषि हवन करते हो
ददासि दान देते हो
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
तपस्यसि तप करते हो
कौन्तेय हे कुन्तीपुत्र
तत् उसे
कुरुष्व कर
मदर्पणम् मुझे अर्पण के रूप में
पंक्ति 1 पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
यत् जो तपस्यसि तप करते हो
करोषि करते हो कौन्तेय हे कुन्तीपुत्र
अश्नासि खाते हो तत् उसे
जुहोषि हवन करते हो कुरुष्व कर
ददासि दान देते हो मदर्पणम् मुझे अर्पण के रूप में

विस्तृत विवरण

परिचय

पत्र-पुष्प के अर्पण की बात से भगवान श्रीकृष्ण अब एक बहुत बड़ा सूत्र देते हैं। वे अर्जुन को बताते हैं कि जीवन के हर कर्म को अर्पण का रूप कैसे दिया जा सकता है।

भावार्थ

श्लोक का भाव: सब कुछ मुझे अर्पित कर

भगवान कहते हैं कि हे कौन्तेय! तू जो कुछ करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मुझे अर्पण करने वाला बन। यह श्लोक गीता के कर्मयोग और भक्तियोग का संगम है और इसे इस अध्याय का हृदय माना जाता है।

मुख्य शब्दों का मर्म

यत्करोषि — जो कुछ भी करता है: यह शब्द जीवन के सभी कर्मों को समेट लेता है, चाहे वे बड़े हों या छोटे, व्यावसायिक हों या पारिवारिक। भगवान किसी कर्म को अलग नहीं करते कि यह आध्यात्मिक है और वह सांसारिक।

यदश्नासि — जो कुछ खाता है: भोजन जैसा साधारण कार्य भी अर्पण का रूप ले सकता है। जब भोजन को प्रसाद की भावना से, कृतज्ञता के साथ ग्रहण किया जाता है, तो वह शरीर के साथ मन को भी पोषण देता है।

यज्जुहोषि ददासि यत् — जो हवन करता है और जो दान देता है: यज्ञ और दान, ये दोनों पुण्य कर्म हैं, पर इन्हें भी फल की इच्छा से नहीं, भगवान को अर्पित भाव से करना है। इससे पुण्य कर्म भी बंधन की बजाय मुक्ति का साधन बनते हैं।

यत्तपस्यसि — जो तप करता है: तप में संयम, परिश्रम और अनुशासन आते हैं, जैसे पढ़ाई में लगन या किसी कठिन कार्य का निर्वाह। इन्हें भी अर्पण-भाव से करने पर वे अहंकार को बढ़ाने की बजाय विनम्रता को बढ़ाते हैं।

तत्कुरुष्व मदर्पणम् — उसे मुझे अर्पण करने वाला बना: इसका अर्थ है कि कर्म का फल, उसका श्रेय और उसकी आसक्ति, सब भगवान को समर्पित हो। कर्म वही रहता है, पर कर्ता की दृष्टि बदल जाती है। यही दृष्टि कर्म को पूजा में बदल देती है।

गहरे भाव और आंतरिक संदेश

जीवन और साधना का एकत्व: इस श्लोक का सबसे बड़ा संदेश यह है कि साधना के लिए जीवन से अलग होने की आवश्यकता नहीं। हर कर्म, चाहे वह घर का हो, दफ्तर का हो या समाज का, यदि समर्पण-भाव से किया जाए तो साधना बन जाता है।

अहंकार का रूपांतरण: जब हम हर कार्य को अर्पित मानकर करते हैं, तो 'मैंने किया' का अहंकार धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगता है। सफलता में अभिमान नहीं आता और असफलता में निराशा गहरी नहीं होती।

कर्म का रूपांतरण: निष्काम कर्म की कुंजी

इस श्लोक का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह कर्म को बदलने के लिए नहीं कहता, बल्कि कर्म को देखने के दृष्टिकोण को बदलने के लिए कहता है। एक ही कार्य, जैसे भोजन बनाना या दफ्तर का काम, जब स्वार्थ से किया जाए तो साधारण है, और जब अर्पण-भाव से किया जाए तो साधना बन जाता है। इसलिए जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन बाहर की परिस्थितियाँ बदलने से नहीं, भीतर की दृष्टि बदलने से आता है।

चार कर्मों का क्रम: करना, खाना, हवन-दान और तप, ये चारों जीवन के दैनिक, शारीरिक, धार्मिक और अनुशासनात्मक पक्षों को समेट लेते हैं। इसलिए यह श्लोक जीवन के हर क्षेत्र को स्पर्श करता है।

हमारे जीवन के लिए संदेश

कार्य को अर्पण बनाने का अभ्यास: दिन का कोई भी कार्य आरंभ करने से पहले मन में एक क्षण के लिए यह भाव रखें कि यह कार्य ईश्वर को अर्पित है। इससे कार्य की गुणवत्ता बढ़ती है और मन भी शांत रहता है।

भोजन और सेवा में कृतज्ञता: भोजन से पहले कृतज्ञता का एक छोटा-सा स्मरण और दिन के अंत में दिन के कर्मों को समर्पित करने का भाव, ये दोनों सरल अभ्यास जीवन को गहरा अर्थ देते हैं।

आगे का विषय

भगवान ने सब कर्मों को अर्पण करने का मार्ग बताया। अब वे इसका फल बताते हैं, कि ऐसा करने वाला कर्मों के बंधन से मुक्त होकर उन्हें प्राप्त होता है।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

कर्मयोग
सब कर्म अर्पण
भक्ति-दृष्टि
मदर्पण
आध्यात्मिक
जीवन ही पूजा
साधना-दृष्टि
दैनिक अर्पण
मनोवैज्ञानिक
कर्तापन का विलय
दार्शनिक
कर्म और यज्ञ
शैक्षिक
अध्याय का सारगर्भित श्लोक
नैतिक
फलासक्ति से मुक्ति
व्यावहारिक
हर क्रिया में अर्पण
आत्मशुद्धि
अहंकार-त्याग
समन्वय-दृष्टि
कर्म भोजन हवन दान तप का एकीकरण
प्रतीक-दृष्टि
मदर्पण
प्रबन्धन
काम में अनासक्ति
सामाजिक
सेवा-भाव

सूत्र

जो भी कर्म करो, उसे अर्पण की दृष्टि से करो।

भोजन भी पूजा बन सकता है, यदि कृतज्ञता और संयम से किया जाए।

जो भी विशेष अनुष्ठान या आहुति दो, उसमें भाव अर्पण का रहे।

दान में कर्तापन का अहंकार नहीं, देने की कृतज्ञता हो।

तप भी स्वयं के प्रदर्शन के लिए नहीं, परमात्मा के प्रति अर्पित हो।

हर क्रिया का अन्तिम उद्देश्य परमात्मा को अर्पित हो जाना है।

जब सब कर्म अर्पित होते हैं, तब अलग से पूजा की आवश्यकता नहीं रहती—जीवन ही पूजा बन जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'मदर्पणम्' का क्या अर्थ है?
मुझे अर्पण के रूप में, अर्थात् सब कर्मों को भगवान् को समर्पित करना।
इस श्लोक में कौन-कौन से कर्म गिनाए गए हैं?
करना (सामान्य कर्म), खाना, हवन, दान और तप।
क्या इसका अर्थ है कि कर्म छोड़ दें?
नहीं; कर्म करते रहना है, पर कर्तापन और फल का भाव भगवान् को अर्पित करना है।
यह श्लोक गीता में क्यों प्रसिद्ध है?
क्योंकि यह जीवन के सभी कर्मों को साधना बनाने का सरल सूत्र देता है।
इस श्लोक का व्यावहारिक सन्देश एक वाक्य में क्या है?
दिन भर के कर्म, भोजन, दान और तप को अर्पण-भाव से करो और परिणाम भगवान् पर छोड़ो।

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